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नरेंद्रकौर छाबड़ा का ब्लॉग: सुख-समृद्धि की नींव होते हैं संयुक्त परिवार

By नरेंद्र कौर छाबड़ा | Updated: May 18, 2020 13:46 IST

मौजूदा परिस्थिति ने एक बार फिर संयुक्त परिवार के महत्व को सिद्ध किया है. लॉकडाउन के चलते कुछ परिवारों के सदस्य दूसरे शहरों में अटक गए हैं. उनकी मानसिक स्थिति का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है. जहां परिवार एकल हैं, दो-तीन सदस्य ही हैं उनकी बनिस्बत संयुक्त परिवारों की स्थिति बेहतर है.

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बदलते समय के साथ परिवार संस्था के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है और उसके मूल्यों में भी परिवर्तन हुआ, लेकिन उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता. हम चाहे कितनी भी आधुनिक विचारधारा में पल रहे हों, लेकिन अंत में अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़ परिवार में परिवर्तित करने में ही विश्वास रखते हैं तथा इसमें संतुष्टि और संपूर्णता का अनुभव करते हैं.

संयुक्त परिवार में रहने के अनेक लाभ हैं. प्रत्येक सदस्य की स्वास्थ्य समस्या, आर्थिक समस्या, सुरक्षा समस्या पूरे परिवार की होती है. कोई सदस्य अगर किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो तो परिवार के सभी सदस्य अपने सहयोग, व्यवहार से उसे बीमारी से  छुटकारा दिलाने में सहायता करते हैं. सुरक्षा की दृष्टि से संयुक्त परिवार में सभी स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं. इसी प्रकार परिवार के कार्यो की जिम्मेदारी भी आपस में बांट ली जाती है, जिससे किसी एक पर बोझ नहीं पड़ता और सब खुशी से एक-दूसरे को सहयोग देते हैं. इसके साथ ही बच्चों को माता-पिता के साथ-साथ अन्य परिवारजनों का, दादा-दादी का प्यार, सहयोग भी प्राप्त होता है, जिससे उनके चारित्रिक विकास में मदद मिलती है.

मौजूदा परिस्थिति ने एक बार फिर संयुक्त परिवार के महत्व को सिद्ध किया है. लॉकडाउन के चलते कुछ परिवारों के सदस्य दूसरे शहरों में अटक गए हैं. उनकी मानसिक स्थिति का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है. जहां परिवार एकल हैं, दो-तीन सदस्य ही हैं उनकी बनिस्बत संयुक्त परिवारों की स्थिति बेहतर है. सभी सदस्य मिल-जुलकर कार्य कर रहे हैं, गपशप करते हैं, वृद्धजन भी कुछ हद तक संतुष्ट हैं. उनके साथ बैठने, बतियाने का समय परिवार के सदस्यों को मिला है. अपनी मानसिक स्थिति को सकारात्मक बनाते हुए ये परिवार सहजता से इस मुश्किल घड़ी को गुजार लेंगे.

यह विडंबना ही है कि आज विश्व में एकल परिवार की लहर फैल रही है. कभी नौकरी के नाम पर तो कभी आजादी, स्पेस के नाम पर आजकल के युवा अकेला रहना पसंद करने लगे हैं. एकल परिवार में पति-प}ी की सोच होती है कि वे अपने बच्चों की परवरिश बेहतर ढंग से कर सकते हैं. कुछ हद तक यह सही भी है, लेकिन संस्कारों का पाठ एकल परिवारों में पढ़ा पाना मुश्किल होता है. उपभोक्तावादी संस्कृति, अपरिपक्वता, व्यक्तिगत आकांक्षा, स्वार्थ, लोभी मानसिकता, आपसी मनमुटाव के कारण संयुक्त परिवार की संस्कृति के छिन्न-भिन्न होने का खतरा गहराता जा रहा है. देश में बढ़ते वृद्धाश्रमों की संख्या इशारा कर रही है कि भारत में संयुक्त परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ, सामाजिक परिप्रेक्ष्य की बहुत आवश्यकता है.

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