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BEST Election Results: नौ साल पुराना दबदबा समाप्त, नाम के बाद ‘ब्रांड’ की नई पहचान पर भी संकट

By Amitabh Shrivastava | Updated: August 23, 2025 05:13 IST

Mumbai Best Employees Cooperative Credit Society Election 2025 Result: मराठी भाषी और ‘बेस्ट’ कर्मचारियों के बीच अपने मूल वोट बैंक का लाभ मिलना था.

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ठळक मुद्देबृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों की नजर से इसे एक लिटमस टेस्ट के रूप में देखा गया.समर्थकों ने ठाकरे परिवार के प्रभाव को महाराष्ट्र में एक ‘ब्रांड’ की पहचान जैसा देखा.दोनों भाई एक हुए तो ठाकरे ‘ब्रांड’ को अधिक मजबूत मान लिया गया.

BEST Election Results: बृहन्मुंबई विद्युत आपूर्ति एवं परिवहन (बेस्ट) क्रेडिट सोसाइटी के चुनावों में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना का नौ साल पुराना दबदबा समाप्त हो गया. चालू सप्ताह में आए परिणामों में ठाकरे बंधुओं की ओर से समर्थित पैनल को 21 में से एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई है. कहने के लिए यह एक संस्था मात्र का चुनाव था, जिसे अधिक महत्व नहीं मिलना चाहिए. किंतु आगामी बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों की नजर से इसे एक लिटमस टेस्ट के रूप में देखा गया, जिसका उद्देश्य मराठी भाषी और ‘बेस्ट’ कर्मचारियों के बीच अपने मूल वोट बैंक का लाभ मिलना था.

मगर लगभग दो दशक बाद महाराष्ट्र की राजनीति में साथ आए ठाकरे बंधुओं को पहले ही चुनाव में बड़ा झटका लगा है. इस हार ने उनके जनाधार को एकजुट करने में चुनौतियों के गंभीर संकेत दिए तथा इस असफलता ने मुंबई मनपा चुनावों की रणनीति को प्रभावित करने की संभावना व्यक्त की, जहां लंबे समय से कब्जा है. सबसे चिंताजनक स्थिति उनके लिए पैदा हुई,

जो ठाकरे बंधुओं के एक मंच पर आने से उन्हें महाराष्ट्र के बड़े ‘ब्रांड’ का लाभ मान कर चल रहे थे. इस स्थिति में उनका अपने प्रचार-प्रसार पर दोबारा मंथन करना मजबूरी बन चला है. यदि ‘ब्रांड’ मराठी मानुष के बीच भी नहीं चल पाएगा तो आगे कहां चल पाएगा. दूसरी ओर अनुभवी यूनियन नेता शरद राव के बेटे शशांक राव का बेस्ट कर्मचारियों, ऑटो-रिक्शा चालकों और अन्य श्रमिक समूहों पर प्रभाव न केवल यूनियनों के अस्तित्व की गंभीरता की ओर संकेत देता है, बल्कि मराठी जनमानस की चिंताओं और समस्याओं को सही रूप से जानने वाले की पहचान करवाता है.

मार्केटिंग की दुनिया में ‘ब्रांड’ शब्द का उपयोग आम है. कमोबेश हर उत्पादक अपना नाम स्थापित कर एक ‘ब्रांड’ की पहचान पाना अपनी उपलब्धि मानता है. राजनीति में इसका उपयोग उत्साही नेता और कार्यकर्ता करते हैं, क्योंकि सार्वजनिक जीवन में कार्यों से ही कीर्तिमान स्थापित हो जाते हैं.

किंतु संकट के दौर से गुजरते हुए उद्धव ठाकरे की शिवसेना(यूबीटी) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(एमएनएस) का पहले एक मंच पर आना समर्थकों को समय की आवश्यकता लगी. कुछ को दो चचेरे भाइयों का साथ राजनीतिक मजबूती लगी. कुछ रणनीतिकार समर्थकों ने ठाकरे परिवार के प्रभाव को महाराष्ट्र में एक ‘ब्रांड’ की पहचान जैसा देखा.

जब दोनों भाई एक हुए तो ठाकरे ‘ब्रांड’ को अधिक मजबूत मान लिया गया. मगर जैसा बाजार में होता है कि अधिक पहचान के बावजूद पुराना ब्रांड कई बार नहीं चलता और नया या अनजान बाजार लूट लेता है, बेस्ट के परिणामों के बाद वैसा ही कुछ अब राजनीति में भी मानना होगा. चूंकि नेताओं को ‘ब्रांड’ बनने में कोई संकोच नहीं है, इसीलिए बाजार की तरह समय-समय पर उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा.

यद्यपि व्यवसाय में हर परिस्थिति की समीक्षा की जाती है और सुधार कर प्रतिस्पर्धा का सामना किया जाता है. इस दृष्टिकोण से राजनीति में वर्तमान परिस्थिति नेताओं और उनके समर्थकों के आगे बड़ी चुनौती है.नि:संकोच यह स्वीकार किया जा सकता है कि बेस्ट क्रेडिट सोसाइटी का चुनाव संस्थागत चुनाव है. उसमें ठाकरे बंधुओं के दलों की ओर से समर्थित ‘उत्कर्ष’ पैनल का हार जाना संस्था तक सीमित है.

लेकिन वहां के कर्मचारियों की मराठी पहचान और उनका यूनियन समर्थित पैनल की ओर झुकाव मतदाताओं के मन के संकेत उजागर करता है. मुंबई के प्रमुख ट्रेड यूनियन नेता शशांक राव के पैनल के 14 उम्मीदवारों का जीतना उनके कर्मचारियों के अधिकारों के लिए संघर्ष और समस्याओं के समाधान करने की प्रवृत्ति पर मुहर लगाता है. दूसरी ओर राजनीति में इन मुद्दों के अभाव का संकेत देता है.

बेस्ट क्रेडिट सोसाइटी के चुनाव में सात सीटें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक प्रसाद लाड, प्रवीण दरेकर, मंत्री नीतेश राणे और शिवसेना शिंदे गुट की किरण पावस्कर समर्थित सहकार समृद्धि पैनल ने भी जीतीं. किंतु उन्होंने चुनाव को शिवसेना विरुद्ध भाजपा बनाने से संकोच किया.

इसके विपरीत उत्साही शिवसेना(यूबीटी) नेताओं-कार्यकर्ताओं ने चुनाव को ठाकरे ब्रांड से मुकाबला दिखा कर पराजय का सारा बोझ उनके गले डाल दिया. यही कारण है कि चुनाव परिणाम ठाकरे बंधुओं के एकीकरण से मिले लाभ के पैमाने पर तौले जा रहे हैं. जिससे उनके आलोचकों को अवसर मिल चुका है.

ध्यान देने योग्य यह है कि वर्ष 2022 में सत्ता गंवाने और पार्टी में बड़ी फूट के बाद शिवसेना को भविष्य में अपनी संगठनात्मक ताकत को बढ़ाने के लिए ठोस तैयारी करनी चाहिए थी. केवल अपने नेता के नाम के सहारे आगे बढ़ने की आशा करना खतरनाक था. पूर्व में कांग्रेस के केवल गांधी परिवार के नाम पर चलने के नतीजे सामने थे.

मगर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के सहारे लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता ने शिवसेना का उसकी कमजोरियों से ध्यान बंटा दिया. जिससे विधानसभा चुनाव में खराब नतीजे सामने आए. जिन्हें स्वीकार किया जाए या ठुकरा दिया जाए, यह पार्टी का निजी विषय है. किंतु यह पार्टी की आंतरिक स्थिति समझने के लिए अवसर है.

यदि केवल नाम और ‘ब्रांड’ से सफलता मिलती तो सत्ता कई बार पार्टी के कदम चूम चुकी होती. लेकिन वैसा कभी हुआ नहीं. ताजा परिणाम भी चुनौतियों के कम होने के संकेत नहीं हैं. ‘ब्रांड’ सहज ही चलने की उम्मीद नहीं है. भाषा विवाद से लाभ मिलने का सपना साकार होता नहीं दिखता है.

दूसरी ओर यह स्थिति भविष्य में जनभावनाओं के साथ व्यापक और उदार ढंग से पेश आने के दृश्य को दिखाती है, जिसमें समस्याओं का समाधान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष अपेक्षित है. अब हवा-हवाई विचार और सतही राजनीति से मतदाताओं को समझाया नहीं जा सकता है.

परिणामों की अपेक्षा यदि नेताओं को है तो मतदाताओं को भी अपेक्षाएं कम नहीं हैं. जिनके पूरे नहीं होने पर हर स्थान पर संकेत मिलते हैं. जिन्हें स्वीकार करना होगा. जनमन के बीच काम से एक पहचान बनना होगा, क्योंकि बाजार में हर ‘ब्रांड’ का नाम हमेशा चलता नहीं और भरोसा लंबे समय तक टिकता नहीं.

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