देवेंद्र फडणवीस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उन्हें भाजपा के सबसे तेज राजनीतिक रणनीतिकारों में से एक क्यों माना जाता है. उन्होंने संकट की घड़ी में भी तेजी, दूरदर्शिता और सटीकता से काम लिया. अजित पवार के शोक संतप्त परिवार से औपचारिक रूप से संपर्क करने से बहुत पहले ही, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने दिल्ली स्थित पार्टी आला-कमान को स्थिति से अवगत करा दिया था. बताया जाता है कि उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी बात की और अजित पवार के अचानक निधन से उत्पन्न जोखिमों और अवसरों, दोनों को स्पष्ट किया.
फडणवीस समझते थे कि समय ही सबसे महत्वपूर्ण कारक है. सुनेत्रा पवार को सरकार में शामिल करने में किसी भी प्रकार की देरी शरद पवार के लिए राजनीतिक दांव-पेंच का रास्ता खोल सकती थी, जो 2023 में विभाजित हुई राकांपा के दो गुटों के विलय को आगे बढ़ाने के इच्छुक थे. यदि अजित पवार के उत्तराधिकारी के राजनीतिक रूप से तय होने से पहले ऐसा विलय हो जाता,
तो महायुति के भीतर समीकरण बदल सकते थे और भाजपा का प्रभाव कम हो सकता था. सूत्रों के अनुसार, फडणवीस विलय वार्ता जारी रखने के विरोध में नहीं थे, लेकिन एक बात पर वे स्पष्ट थे: उत्तराधिकार का मुद्दा पहले सुलझाना होगा. अजित पवार के गुट के नेतृत्व को किसी भी व्यापक पुनर्गठन से पहले एक स्पष्ट और सशक्त चेहरे की आवश्यकता थी.
हरी झंडी मिलने के बाद, फडणवीस ने राकांपा नेतृत्व द्वारा उत्तराधिकार पर शीघ्र निर्णय लेने का इंतजार किया. अंतिम संस्कार के बाद, राकांपा नेतृत्व ने बैठक की और फडणवीस को अपना निर्णय बताया. जिस तेजी से उन्होंने निर्णय लिया, उससे सुनेत्रा पवार का दृढ़ संकल्प स्पष्ट हो गया और भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं बची.
शरद पवार से परामर्श किए बिना उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर, उन्होंने निर्णायक रूप से राजनीतिक शून्य को भर दिया. ऐसा करके, उन्होंने न केवल अपने दिवंगत पति की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित किया, बल्कि वरिष्ठ पवार की सुनियोजित योजनाओं को भी ध्वस्त कर दिया. वरिष्ठ पवार इतने नाराज थे कि उन्होंने सुनेत्रा को उपमुख्यमंत्री बनने पर बधाई तक नहीं दी,
जो महाराष्ट्र के इतिहास में पहली बार हुआ. इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति के एक महत्वपूर्ण सत्य को रेखांकित किया : समय ही शक्ति है. और इस मौके पर, देवेंद्र फडणवीस ने दिखाया कि उन्हें ठीक-ठीक पता था कि कब और कैसे कार्य करना है. सुनेत्रा ने भी यह साबित कर दिया कि वे भी कोई नौसिखिया नहीं हैं.
सोनिया की सलाह और राहुल की स्पष्टवादिता
संसद के गलियारों में हुई यह संक्षिप्त, लगभग अनौपचारिक बातचीत थी, लेकिन इसमें कई गहरे अर्थ छिपे थे. एक वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री से राहुल गांधी शिष्टाचारवश बातचीत करते हुए अचानक एक निजी बात कह बैठे. उन्होंने कहा, ‘मेरी मां ने मुझे निजी जेट में यात्रा करने से बचने के लिए कहा है,’ और फिर एक सचेत विराम के साथ अपनी बात अधूरी छोड़ दी.
यह टिप्पणी हल्की-फुल्की और बातचीत जैसी लग रही थी, लेकिन इसमें सिर्फ पारिवारिक चिंता से कहीं अधिक बातें छिपी थीं. सोनिया गांधी की सलाह, हर लिहाज से, प्रतीकात्मकता से ज्यादा सावधानी पर आधारित थी. निजी जेट दुर्घटनाएं, हालांकि दुर्लभ हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक स्मृति को झकझोरती रही हैं.
विभिन्न देशों और दशकों में, वरिष्ठ नेताओं ने अचानक हवाई हादसों में अपनी जान गंवाई है, जिससे सामान्य यात्राएं भी राष्ट्र को स्तब्ध कर देने वाली घटनाएं बन गई हैं. सोनिया गांधी जैसी शख्सियत के लिए, जिन्होंने व्यक्तिगत क्षति और लंबे राजनीतिक अनुभव से खुद को ढाला है, यह चेतावनी इस बात की गहरी समझ को दर्शाती है कि सत्ता और जीवन किस तरह अचानक एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं.
राहुल का इस सलाह को सार्वजनिक रूप से साझा करने का निर्णय, भले संक्षेप में ही सही, उतना ही महत्वपूर्ण था. इससे उस माहौल में उनकी मानवीयता का परिचय मिला, जहां आमतौर पर पूर्वनिर्धारित बयानबाजी और पक्षपातपूर्ण बहसें हावी रहती हैं. साथ ही, इससे जनता की राय के प्रति उनकी संवेदनशीलता का भी सूक्ष्म संकेत मिलता है.
ऐसे युग में जब इरादे के साथ-साथ दिखावट भी मायने रखती है, निजी जेट से परहेज करना एक व्यापक राजनीतिक संदेश के अनुरूप है - अभिजात वर्ग के विशेषाधिकार से दूरी और संयम की ओर इशारा. कोई बड़ी घोषणा नहीं, कोई नैतिक आडंबर नहीं. बस एक बेटे ने अपनी मां की चिंता को स्वीकार किया. नेता चुनाव प्रचार की योजना बनाते हैं, कहानियां गढ़ते हैं और गति हासिल करने की कोशिश करते हैं,
लेकिन वे इतिहास से गढ़े गए अदृश्य भय को भी अपने साथ लिए घूमते हैं. उस सहज टिप्पणी में, राहुल गांधी ने सार्वजनिक जीवन के पीछे छिपी व्यक्तिगत भावनाओं की एक झलक पेश की - जहां घर पर फुसफुसाकर दी गई सलाह संसद की चकाचौंध में लिए गए निर्णयों को चुपचाप प्रभावित कर सकती है.
शॉटगन, कीर्ति और नबीन में कौन सी बात समान है?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अचानक बिहारी रंग उभर आया है और भाजपा इसका भरपूर फायदा उठा रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने अपने पहले बड़े राजनीतिक अभियान की शुरुआत चुनाव वाले राज्यों के गहन दौरे से की है, और उन्होंने पश्चिम बंगाल को अपने पहले पड़ाव के रूप में चुना है.
सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि इसके पश्चिमी हिस्से - बर्धमान और आसनसोल - जहां बिहार और झारखंड की सीमाएं आपस में मिल जाती हैं और हिंदी भाषा पराई नहीं लगती. भौगोलिक स्थिति का यह चुनाव संयोगवश नहीं है. इन जिलों में बिहारी और गैर-बंगाली आबादी काफी अधिक है, जो एक ऐसा सामाजिक वर्ग है जो चुपचाप लेकिन निर्णायक रूप से चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है.
इसमें कायस्थ समुदाय को भी जोड़ दें - जो प्रभावशाली, राजनीतिक रूप से जागरूक और संयोग से नितिन नबीन का अपना समुदाय है - तो भाजपा की रणनीति बिल्कुल सटीक बैठती है. लेकिन इसमें एक छोटी सी पेचीदगी है. इस क्षेत्र में पहले से ही दो बड़े बिहारी नेता मौजूद हैं. आसनसोल में बॉलीवुड के सदाबहार हीरो शत्रुघ्न सिन्हा का दबदबा है,
जबकि बर्धमान का प्रतिनिधित्व पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद कर रहे हैं. कायस्थ समुदाय में सिन्हा की लोकप्रियता आज भी काफी मजबूत है, जिससे भाजपा के लिए इस सामाजिक क्षेत्र में पैठ बनाना एक जटिल चुनौती बन गया है. फिर भी, पार्टी का हौसला पस्त नहीं हुआ है. नितिन नबीन के जरिये भाजपा राजनीतिक निष्ठाओं को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रही है और यह जताने का प्रयास कर रही है कि कायस्थ और बिहारी मतदाताओं को प्रतिनिधित्व के लिए भगवा खेमे से बाहर देखने की जरूरत नहीं है.
बड़ी उम्मीद यह है कि ममता बनर्जी उन्हें ‘बाहरी’ कहकर खारिज करने में नाकाम रहेंगी. बंगाल की एक चौथाई से अधिक आबादी हिंदी भाषी मतदाताओं की है, ऐसे में भाजपा का मानना है कि आंकड़े - और शायद राजनीतिक माहौल भी - आखिरकार उसके पक्ष में झुक रहे हैं.