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हर्षवर्धन आर्य का ब्लॉगः भाजपा और कांग्रेस दोनों को सबक मिला

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: October 25, 2019 11:26 IST

महाराष्ट्र चुनावः गठबंधन किए बिना 2014 में भाजपा तथा शिवसेना दोनों ने बेहतर प्रदर्शन किया था. अप्रैल-मई में इस साल हुए लोकसभा चुनाव में दोनों ने फिर गठबंधन किया और 48 में से 42 सीटें जीत लीं. उन्हें लगभग 200 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी. महाराष्ट्र विधानसभा  के चुनाव में राष्ट्रवाद से बात बनी नहीं. 

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ठळक मुद्देमहाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए तगड़ा सबक हैं. भाजपा-शिवसेना गठबंधन 200 पार के नारे के साथ लड़ रहा था लेकिन वह अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गया.

हर्षवर्धन आर्यमहाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए तगड़ा सबक हैं. भाजपा-शिवसेना गठबंधन 200 पार के नारे के साथ लड़ रहा था लेकिन वह अपने लक्ष्य से काफी पीछे रह गया. कांग्रेस का प्रदर्शन राष्ट्रवादी कांग्रेस के मुकाबले फीका रहा और अब वह छोटे भाई की भूमिका में आ गई.

गठबंधन किए बिना 2014 में भाजपा तथा शिवसेना दोनों ने बेहतर प्रदर्शन किया था. अप्रैल-मई में इस साल हुए लोकसभा चुनाव में दोनों ने फिर गठबंधन किया और 48 में से 42 सीटें जीत लीं. उन्हें लगभग 200 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल थी. महाराष्ट्र विधानसभा  के चुनाव में राष्ट्रवाद से बात बनी नहीं. 

भाजपा के लिए ताजा नतीजों से संदेश साफ है कि राष्ट्रवाद का मुद्दा ज्यादा दिन नहीं चल सकता और स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा करने की बड़ी महंगी कीमत चुकानी पड़ती है. यदि भाजपा और शिवसेना ने विधानसभा चुनाव में हाथ नहीं मिलाया होता तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में आक्रामक साझा प्रचार नहीं किया होता तो महाराष्ट्र में नतीजे अप्रत्याशित भी हो सकते थे.

कांग्रेस के लिए भी मतदाताओं का संदेश साफ है. उसका परंपरागत मतदाता उसकी ओर लौट रहा है. अगर उसने अपना संगठन मजबूत नहीं किया, स्थानीय स्तर पर सक्षम नेतृत्व खड़ा नहीं किया तो महाराष्ट्र के अपने पुराने गढ़ को वह दुबारा हासिल नहीं कर सकेगी. चुनाव नतीजों से यह भी साबित हो गया कि मतदाता मजबूत विपक्ष चाहता है. यदि भाजपा-शिवसेना की तरह कांग्रेस-राकांपा ने भी मिलकर रैलियां की होतीं तो महाराष्ट्र में भी टक्कर बराबरी की हो सकती थी.

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने राज्य की राजनीति विशेषकर पश्चिम महाराष्ट्र में अपनी पकड़ फिर साबित कर दी है. भाजपा ने महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या, पीएमसी बैंक घोटाला, सूखा, बाढ़, अर्थव्यवस्था में सुस्ती, नोटबंदी तथा जीएसटी से उपजी  समस्याओं की पूरी तरह उपेक्षा कर दी. वह अति आत्मविश्वास में नजर आ रही थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता एवं राष्ट्रवाद पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रही. 2014 में दोनों अलग-अलग लड़े थे. भाजपा ने 122 और शिवसेना ने 63 सीट जीती थीं. इस मर्तबा गठबंधन के बावजूद भाजपा घाटे में रही और शिवसेना 2014 के प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई.

चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र का मतदाता विधानसभा में तगड़ा विपक्ष चाहता है. इसीलिए एकजुटता के बावजूद उसने भगवा महायुति को एकतरफा बहुमत नहीं दिया व कांग्रेस-राकांपा की स्थिति को 2014 के मुकाबले बेहतर किया.  

कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का बड़ा कारण यह भी था कि हवा का रुख भांपते हुए उसके कई प्रभावशाली नेता भाजपा और शिवसेना में चले गए. कांग्रेस  ने उसे कमजोर करने की भगवा गठबंधन की रणनीति को विफल करने के लिए जवाबी रणनीति नहीं बनाई.  

भाजपा-शिवसेना गठबंधन को घेरने के लिए विपक्ष के पास मुद्दों  की कोई कमी नहीं थी मगर चुनाव प्रचार आक्रामक नहीं था. कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा कर ऐसे राष्ट्रीय मसलों को विधानसभा चुनाव में हथियार बनाया जो महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में बिल्कुल प्रासंगिक नहीं थे. मुंबई तथा प. महाराष्ट्र में बाढ़ से निपटने में राज्य सरकार की विफलता, गत वर्ष कम वर्षा के कारण फसल गंवाने वाले किसानों की बड़ी संख्या में आत्महत्या, फसल बीमा योजना तथा किसान सम्मान निधि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में विफलता, किसानों को कर्ज आवंटन में बैंकों की आनाकानी, नोटबंदी तथा जीएसटी के दुष्परिणाम, बढ़ती बेरोजगारी, पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक घोटाला जैसे ज्वलंत मुद्दे कांग्रेस के प्रचार से गायब रहे.

राज्य में राकांपा प्रमुख शरद पवार तथा कांग्रेस के प्रचारक राहुल गांधी की एक भी साझा रैली नहीं हुई. इसके ठीक विपरीत भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सुनियोजित एवं आक्रामक प्रचार किया. विपक्ष के पास मुख्यमंत्री के रूप में कोई चेहरा नहीं था जबकि भाजपा ने मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को चेहरा बनाया. कांग्रेस-राकांपा के दिग्गज नेता अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चव्हाण, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहब थोरात, विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय वडेट्टीवार, जयंत पाटिल, पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार अपने-अपने इलाकों तक ही सीमित रहे.

भाजपा दिग्गज महाराष्ट्र में घूमे, कांग्रेस के नेता उतनी बड़ी संख्या में यहां नहीं दिखे. मुंबई से मिलिंद देवड़ा और संजय निरुपम आपसी गुटबाजी के चलते प्रचार से दूर रहे. महाराष्ट्र के कांग्रेसजनों को उम्मीद थी कि पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी-वाड्रा भी राज्य में प्रचार करेंगी. उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. अगर राहुल और प्रियंका महाराष्ट्र में प्रचार करते तो कांग्रेस-राकांपा की स्थिति बेहतर हो सकती थी. कांग्रेस-राकांपा बहुजन वंचित आघाड़ी का साथ लेते तो उन्हें 15-20 सीट और मिल सकती थी.

कुल मिलाकर ठोस रणनीति के अभाव, स्थानीय मुद्दों को उठाने में विफलता, कमजोर चुनाव प्रचार तथा सर्वमान्य नेतृत्व की कमी, गुटबाजी तथा समन्वय के ध्वस्त हो जाने तथा जमीनी स्तर पर संगठन का अस्तित्व लगभग खत्म हो जाने का खामियाजा कांग्रेस-राकांपा को भुगतना पड़ा. इसके बावजूद इस गठबंधन ने अगर बेहतर प्रदर्शन किया है तो उसका पूरा श्रेय मतदाताओं के विवेक को है.

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