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माफी से ज्यादा महत्वपूर्ण है जिंदगियां बचाना

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 7, 2026 05:53 IST

कैमरों में कैद यह शब्द देखते-देखते देशभर में चर्चा का विषय बन गया और जब मैंने सुना तो मुझे भी बहुत गुस्सा आया. क्योंकि कैलाश वर्गीय जी अश्विनी जी से मिलने कई बार घर आते थे.

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ठळक मुद्देशब्दों का चयन भी ठीक से करना चाहिए.जब सत्ता से सवाल पूछे जाते हैं तब लोकतंत्र जीवित रहता है.मैंने अपने परिवार में सच्ची पत्रकारिता देखी है. संयम और सम्मान. पत्रकारों से भी गलती होती है.

किरण चोपड़ा

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के बहुचर्चित मंत्री जी ने माफी मांगी. किसी हद तक माफी बहुत महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य है. नेता हमेशा जनता के सेवक होते हैं और पत्रकार जनता की आवाज.  सवाल पूछना उनका हक होता है. जिस दिन सवाल चुप हो जाएंगे उस दिन समझ लो कि जनता भी चुप हो जाएगी और अगर पत्रकार नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा. पत्रकारों के सवाल लोकतंत्र का मूल हिस्सा हैं.  किसी भी नेता को उनके जवाब संयम से देने चाहिए और जवाब देते वक्त शब्दों का चयन भी ठीक से करना चाहिए.जब सत्ता से सवाल पूछे जाते हैं तब लोकतंत्र जीवित रहता है.

जो सत्ता सवालों को सुन लेती है, वही मजबूत होती है. जब इंदौर में गंदे पानी से लोगों की जान गई, बच्चे मरे तो एक पत्रकार अनुराग द्वारी ने वही पूछा जो हर आदमी पूछ रहा था कि यह कैसे हुआ? किसकी जिम्मेदारी, आगे ऐसा न हो, इसके लिए क्या होगा? उसने कोई बदतमीजी नहीं की, न कोई निजी आरोप लगाया. उसने सिर्फ जनता की आवाज उठाई परंतु उसे जो जवाब मिला,

जो शब्द सुनने को मिले और जो अहंकार वाले भाव सामने आए वे न केवल उस पत्रकार को, बल्कि पूरे पत्रकारीय समाज को चुभने वाले थे. कैमरों में कैद यह शब्द देखते-देखते देशभर में चर्चा का विषय बन गया और जब मैंने सुना तो मुझे भी बहुत गुस्सा आया. क्योंकि कैलाश वर्गीय जी अश्विनी जी से मिलने कई बार घर आते थे.

मुझे तो यही मालूम था कि बड़े समझदार नेता हैं, क्योंकि मैंने अपने परिवार में सच्ची पत्रकारिता देखी है. अटल जी, आडवाणी जी, मोदी जी से अश्विनी जी स्पष्ट सीधे सवाल पूछते थे.  कभी किसी ने उल्टा जवाब नहीं दिया. मंत्री जी के अपशब्दों और व्यवहार को राष्ट्रीय मीडिया ने गम्भीरता से उठाया. अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया में नाराजगी जताई गई.

अंत में मंत्री जी को मीडिया से माफी मांगनी पड़ी, जो मेरी सोच में सही थी. अगर उनसे गुस्से में या हड़बड़ाहट में गलती हुई है तो माफी बनती है. सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते, परंतु माफी से ज्यादा जरूरी है भविष्य में संयम और सम्मान. पत्रकारों से भी गलती होती है,

तो उन्हें कोई अखबार में माफी की लाइन छापने को कहता है या किसी के बारे में गलत खबर लग जाए तो खेद प्रकट किया जाता है, इसलिए मंत्री जी ने भी अपनी गलती मानकर, माफी मांग कर सुधार किया जो स्वागत योग्य है और नेताओं को भी शिक्षा है कि वे जनता के लिए जनसेवक का उदाहरण बनें.  जनता का या पत्रकारों का अपमान न करें.

अब सबसे अधिक महत्वपूर्ण है मध्यप्रदेश में गंदे पानी का मामला. गंदा पानी पीकर लोग बीमार हो रहे हैं, कई लोग जीवन से हाथ धो बैठे हैं, कई बच्चों की मृत्यु हो गई है. तो सही समय है कि मंत्री जी इसका समाधान ढूंढ़ें और लोगों की जिंदगियां बचाएं, वही सच्ची माफी होगी.  

टॅग्स :मध्य प्रदेशIndore Municipal CorporationइंदौरIndore
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