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मधुकर भावे का ब्लॉगः पहले के वो 24 वर्ष..और बाद के यह 24 वर्ष

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: November 26, 2021 10:01 IST

मैंने जिन 24 वर्षो में बाबूजी को देखा, उन्हीं 24 वर्ष में लोकमत समूह का वटवृक्ष की तरह विस्तार हुआ। उसकी शाखाएं पूरे महाराष्ट्र में फैल गईं।

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देखते-देखते 24 बरस गुजर गए। बाबूजी के 24वें स्मृति दिवस पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक उनके सान्निध्य में रहने के 24 बरस याद आते हैं। बाबूजी कितने बड़े व्यक्ति थे, यह उनके साथ बिताए 24 बरस में हर दिन बेहद आसानी से समझ में आता चला गया। की गई मदद का उन्होंने कभी भी बखान नहीं किया, लेकिन उनकी मदद पाने वाले सैकड़ों लोग आज मौजूद हैं। उनके कारण ही घरकुल पाने वाले न जाने कितने लोग हैं। उनकी ही वजह से बॉम्बे हॉस्पिटल जैसे स्तरीय अस्पताल में इलाज करवाकर ठीक होने वाले भी अनगिनत हैं। बाबूजी की खासियत थी कि उन्होंने कभी किसी को की गई मदद का किसी को पता नहीं चलने दिया। बाबूजी की इस महानता को उनके जीवन के अंतिम दिन तक मैंने देखा है। विनोबा कहा करते थे, हर किसी को एक दिन जाना ही पड़ता है। मृत्यु एक महोत्सव है। बाबूजी इसका ही उच्चर करते थे।

मैंने जिन 24 वर्षो में बाबूजी को देखा, उन्हीं 24 वर्ष में लोकमत समूह का वटवृक्ष की तरह विस्तार हुआ। उसकी शाखाएं पूरे महाराष्ट्र में फैल गईं। उस दौर में उनके द्वारा किए गए कामों की सूची इतनी लंबी है कि आज वैसा संभव नहीं है। आज कोई कार्यकर्ता के कंधे पर हाथ नहीं रखता, फिर बिना पार्टी देखे मदद की तो बात ही दूर है। बाबूजी ने न कभी जाति का विचार किया, न पार्टी का, उन्होंने तो केवल और केवल काम का ही विचार किया।

स्वतंत्रता आंदोलन में इस महान व्यक्ति ने 18 महीने जेल में बिताए थे। उसी स्वतंत्रता सेनानी को विधानसभा में स्वतंत्रता सेनानी नहीं होने की विषैली आलोचना का सामना करना पड़ा था। आजादी के लिए जेल में रहने के त्याग से भी ज्यादा जहरीली टिप्पणी को शांति के साथ सहन करने के लिए स्थितप्रज्ञता बेहद जरूरी है। यह आसान काम नहीं। बाबूजी के इस एक वाक्य से सभागृह अवाक रह गया था, ‘सामने की बेंच पर बैठे जिन साथियों ने स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी तरह से हिस्सा नहीं लिया, उन्हें यह बताने की जरूरत नहीं समझता कि मैंने 18 माह जेल में बिताए हैं।’ अगले दिन जब संबंधित विधायक गलत जानकारी के आधार पर आरोप लगाने के लिए माफी मांगने आए तो कल की बातों को भूलकर उनका हाथ पकड़कर साथ में नाश्ते के लिए बैठा लेने वाले बाबूजी को भी मैंने देखा है। जिन लोगों ने आलोचना की, उनके नाम याद नहीं रहे, बाबूजी का त्याग याद रहा।

यह आजादी किसके लिए..वर्ष 1947 की 15 अगस्त को ‘नवे जग’ पत्रिका के लिए लिखा गया पहला ही अग्रलेख बाबूजी की महान सोच का खुलासा कर गया। उन्हीं बाबूजी का 15 अगस्त 1997, यानी आजादी की50वीं सालगिरह पर लिखा गया अग्रलेख उनके सामाजिक कद का प्रमाण है। दुर्भाग्य से महाराष्ट्र को बाबूजी का सामाजिक, वैचारिक कद पूरी तरह से समझ नहीं आया और न ही उनकी वैचारिक प्रकृति का पता चला।

आज बाबूजी नहीं हैं। 74 वर्ष की उम्र कोई जाने की उम्र नहीं है। यह बातें किसी के हाथ में नहीं होतीं, यह भी सच है। पिछले 23 साल से हर 25 नवंबर को मैं यवतमाल के प्रेरणास्थल पर जाता हूं। समाधिस्थल पर जाने का यह 24वां वर्ष है। इन 24 वर्षो के दौरान समाधिस्थल पर, प्रेरणास्थल पर महाराष्ट्र के कोने-कोने से हर साल लोग उमड़ते रहे, आदरांजलि देते रहे, बाबूजी की महानता को प्रणाम करते रहे।

तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत, नारायण दत्त तिवारी, अशोक गहलोत, नितिन गडकरी, मनोहर जोशी, सुधाकर राव नाईक, विलासराव देशमुख, देवेंद्र फडणवीस, अरुण गुजराथी, दिग्विजय सिंह, नरपत भंडारी, अजित जोगी, सुब्बारामी रेड्डी आदि राजनीतिक हस्तियां.. गौतम सिंघानिया, तत्कालीन नौसेना प्रमुख विष्णु भागवत, विख्यात वैज्ञानिक रघुनाथराव माशेलकर, पत्रकार कुमार केतकर जैसे मान्यवर आए..पंडित जसराज, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित राजन-साजन मिश्र, उस्ताद राशिद खान, निलाद्री कुमार, पंडित विश्वमोहन भट्ट जैसे कलाकार आए।

इस वर्ष महाराष्ट्र के महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, हमेशा प्रसन्नचित्त रहने वाले सुशील कुमार शिंदे का आगमन हुआ है। अपने दो अंगूठे की ऊर्जा से हजारों मरीजों को नया जीवन देने वाले धन्वंतरि डॉ. गोवर्धनलाल पाराशर पधारे हैं। बाबूजी के साथ गुजारे 24 वर्ष आंखों के सामने हैं। लगता है मानो बाबूजी सामने ही खड़े हों। उनके जाने के बाद के 24 वर्ष..जिंदगी के यह 48 वर्ष कुछ अलग ही रहे हैं।

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