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कृपाशंकर चौबे का ब्लॉग: ममता बनर्जी- हवाई चप्पल, साधारण साड़ी और लड़ाकू छवि

By कृपाशंकर चौबे | Updated: May 4, 2021 10:24 IST

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. इसके बावजूद ममता बनर्जी की क्षमता के आगे वे कहीं टिक नहीं सके. राष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका असर जरूर नजर आएगा. 

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पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने भाजपा को नहीं, तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी को अपने भरोसे का साथी माना है. ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर धार्मिक ध्रुवीकरण करने की रणनीति भी बेअसर रही. जो दो सौ सीटों पर जीत के साथ बंगाल की सत्ता पर काबिज होने का दावा कर रहे थे और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जिन्होंने अपनी संपूर्ण शक्ति लगा दी थी, वे ममता बनर्जी की क्षमता के आगे टिक नहीं सके. 

इस क्षमता के कारण ही ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ संपूर्ण विपक्ष का बड़ा चेहरा बनकर उभरी हैं. अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, संजय राऊत, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत अनेक विपक्षी नेताओं ने दीदी को जिस आवेग के साथ जीत की बधाई दी है, उसमें यह अपेक्षा अंतर्निहित है कि राष्ट्रीय राजनीति में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं.

बंगाल के चुनाव नतीजे का असर राष्ट्रीय राजनीति में पड़ना स्वाभाविक दिख रहा है. बंगाल में हैट्रिक लगाकर ममता ने एक बार फिर अपनी लड़ाकू छवि को सिद्ध कर दिया है. सड़क से लेकर संसद तक समझौताविहीन लड़ाई के कारण ही ममता को बंगाल की अग्निकन्या कहा जाता है. 

भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद व्यक्तिगत जीवन में ममता ईमानदार रही हैं. उनकी सादगी का आलम यह है कि आज भी वे हवाईचप्पल पहनती हैं. साधारण साड़ी पहनती हैं. 

ममता बनर्जी की स्वच्छ छवि और गरीबों के लिए उनके समझौताविहीन संग्राम के कारण ही प. बंगाल में दस साल पहले सत्ता में परिवर्तन आया था और परिवर्तन की सरकार ने ममता के नेतृत्व में पिछले एक दशक में बंगाल में विकास के बहुत काम किए हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.  

भारत के कई राज्यों में माओवादी संगठन राजनीतिक तौर पर भले चुनौती नहीं बन पाए हों, सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं. इस चुनौती का ममता सरकार ने जिस सकारात्मक दृष्टि के साथ मुकाबला किया, उसका लाभ भी इस चुनाव में मिला और वह माओवाद प्रभावित बाकी राज्यों के लिए एक उदाहरण भी है. 

ममता ने पुलिस और अर्धसैनिक बल के बल पर माओवादी आंदोलन से निपटने के बजाय शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की अवधारणा को आजमाया. दस साल पहले मुख्यमंत्नी बनते ही ममता ने माओवादियों के मध्यस्थों से शांति वार्ता की थी और यह भी स्वीकार किया था कि माओवादियों की हिंसा कानून और व्यवस्था का जितना मामला है, उससे कहीं ज्यादा विकास की गलत नीतियों का मामला है. 

ममता बनर्जी ने पिछले दस वर्षो के अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में आदिवासीबहुल इलाकों में लगभग उसी तरह का विकास सुनिश्चित किया, जिस तरह का विकास माओवादी चाहते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो ममता ने विकास के मॉडल को बदल डाला. 

उन्होंने जनजातियों के जीवन संसाधन की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए स्थायी तथा टिकाऊ विकास की परियोजनाएं शुरू कर माओवादी समस्या को लगभग हल कर लिया. अब बंगाल में मां-माटी-मानुष की सरकार की हैट्रिक के साथ ही ममता के सामने कोरोना महामारी से निपटने और सरकार में कट मनी, तोलाबाजी जैसे आरोपों को सख्ती से खत्म करने की चुनौती है.

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