International Museums Day on 18th May | राजेश कुमार यादव का ब्लॉगः इतिहास की गांठें खोलते संग्रहालय 
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राजेश कुमार यादव

पांडुलिपि का नाम आते ही प्राचीन साहित्य और इतिहास के बारे में तमाम तरह की जिज्ञासाएं लोगों के दिमाग में घर कर जाती हैं. पांडुलिपियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी, संस्कारों, ज्ञान और विश्व-बोध की संवाहक हैं. ये वर्तमान और प्राचीन संस्कारों को जोड़ने वाली वह अदृश्य तंतु हैं जो मानव विकास के साथ ही विकसित होती हैं और निरंतर उपयोग से समृद्ध होती हैं तथा इतिहास की नित नई गांठें खोलती हैं. हस्तलिखित ग्रंथ व पांडुलिपियां हमारे पूर्वजों की सुरक्षित निधि एवं बोलते अभिलेख हैं. इनके अध्ययन से हम अपनी विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रख सकते हैं.

18 मई को अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर संसार भर में संग्रहालयों की भूमिका के बारे में लोगों के प्रति जागरूकता पैदा करने के प्रयास किए जाते हैं. विदर्भ के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय में पांडुलिपियों का एक ऐसा अद्भुत संसार है, जहां 17वीं सदी से लेकर अब तक के कई प्रमुख लेखकों के पत्न, सैकड़ों दुर्लभ चित्न, ऐतिहासिक महत्व की  पत्रिकाओं के प्रवेशांक और प्रेमचंद, दिनकर, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह और सुमित्नानंदन पंत जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों की 3000 से ज्यादा पांडुलिपियां हैं. 

इस संग्रहालय में हिंदी के सबसे बड़े कवि निराला की सुप्रसिद्ध कविता ‘जूही की कली’ की मूल प्रति उन्हीं की हस्तलिपि में मौजूद है. यही नहीं संग्रहालय में हरिशंकर परसाई, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत, शेखर जोशी, नागार्जुन और मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कहानियों और कविताओं के फस्र्ट ड्राफ्ट मौजूद हैं. 

सैकड़ों साल पुरानी ये पांडुलिपियां अपने समय का इतिहास समेटे हैं. ये प्राचीन पांडुलिपियां हमारे प्राचीन विद्वानों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, कवियों, ऋषियों, राजाओं और चिकित्सकों के कृतित्व व दर्शन से हमें परिचित करा रही हैं. हमारी आज की ज्ञान की पुस्तकें इन्हीं पांडुलिपियों पर ही आधारित हैं. इनमें हमारा धर्म, शास्त्न, शिक्षा सब कुछ शामिल है. 


Web Title: International Museums Day on 18th May
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