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पुण्य प्रसून बाजपेयी का ब्लॉग: कॉर्पोरेट फंडिंग के आसरे महंगा होता लोकतंत्र

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: July 31, 2018 04:25 IST

सत्ता कॉर्पोरेट को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट टैक्स में रियायत दे देती है 60 खरब 54 अरब 48 करोड़ की तो आप क्या कहेंगे। 

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कार्पोरेट देश चलाता है या कॉर्पोरेट से साठगांठ के बगैर देश चल नहीं सकता, या फिर सत्ता में आना हो तो कॉर्पोरेट की जरूरत पड़ेगी ही। कॉर्पोरेट को सत्ता से लाभ मिले तो फिर कॉर्पोरेट भी सत्ता के लिए अपना खजाना खोल देता है। ये सारे सवाल हैं और सवालों से पहले एक हकीकत तो यही है कि 2015-17 के बीच कॉर्पोरेट फंडिंग होती है 6 अरब 36 करोड़ 88 लाख रुपए की। सत्ता कॉर्पोरेट को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट टैक्स में रियायत दे देती है 60 खरब 54 अरब 48 करोड़ की तो आप क्या कहेंगे। 

जरा सिलसिलेवार तरीके से कॉर्पोरेट फंडिंग को समङों। जब नरेंद्र मोदी का नाम भाजपा पीएम पद के लिए रखती है, झटके में कॉर्पोरेट में बहार आ जाती है क्योंकि मनमोहन सिंह सरकार के घोटालों को लेकर 2011-12 में तो खुलकर कॉर्पोरेट सीधे मनमोहन सरकार पर चोट करने से कतरा नहीं रहा था तो 2013-14 में कॉर्पोरेट फंडिंग 85 करोड़ 37 लाख रुपए की होती है। 2014-15 में ऐन चुनाव के वक्त या तुरंत बाद 1 अरब 77 करोड़ 65 लाख रुपए की कॉर्पोरेट फंडिंग होती है।

चुनाव के बाद इसमें दो तिहाई की कमी आती है और सिर्फ 47 करोड़ 50 लाख की कॉर्पोरेट फंडिंग होती है। तो पिछले बरस फिर उसमें खासी तेजी आ जाती है और कॉर्पोरेट फंडिंग अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा 5 अरब 89 करोड़ 38 लाख रु। होती है। 

यानी 2013 से 2017 के बीच कॉर्पोरेट जितना रुपया राजनीतिक दलों को देता है उसे मिला दीजिएगा तो ये 8 अरब 99 करोड़ 65 लाख रुपए होता है। पर बीते बरस अज्ञात सोर्स से भी पॉलिटिकल फंडिंग होती है जो कि अपने आप में रिकार्ड है।

सात अरब 10 करोड़ 80 लाख रुपए की फंडिंग होती है और चुनाव आयोग को कोई जानकारी दी ही नहीं जाती कि ये रु पया किसने दिया। यानी 16 अरब 10 करोड़ 45 लाख रुपए कारपोरेट राजनीतिक दलों को अगर देता है तो जाहिर है सिर्फ लोकतंत्र मजबूत करने के नाम पर तो नहीं ही देता होगा। 

तो सवाल कई हैं। मसलन, क्या कॉर्पोरेट की पॉलिटिकल फंडिंग देश के लोकतंत्र को जिंदा रखती है। क्या कॉर्पोरेट की फंडिंग और सत्ता की मेहरबानी ही देश का इकोनॉमिक मॉडल है। क्या कॉर्पोरेट को वाकई इतना मुनाफा होता है कि वह फंडिंग करे या फंडिंग करने के बाद मुनाफा होता है। क्योंकि सिर्फ बीते बरस में जो सबसे ज्यादा फंडिंग 5 अरब 89 करोड़ 38 लाख रुपए की होती है उसमें सबसे ज्यादा सत्ताधारी पार्टी के पास 5 अरब 32 करोड़ 27 लाख 40 हजार रुपए जाता है। 

दूसरे नंबर पर विपक्ष की भूमिका निभाती कांग्रेस के पास महज 41 करोड़ 90 लाख 70 हजार रुपये जाते हैं तो कॉर्पोरेट सत्ताधारी पार्टी को ही फंड करेगा ये तो साफ है। पर राजनीति जब सत्ता पाने के लिए होती है तो फिर कोई भी राजनीतिक दल रहे, वह उन फंड के बारे में जानकारी देना नहीं चाहता जो छुपाकर फंडिंग करता है।

उसी का असर है कि पिछले बरस इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हुए 166 पॉलिटिकल फंडिंग करने वालों के पैन नंबर की जानकारी पार्टियां दे नहीं पाईं। कॉर्पोरेट जितनी रकम पॉलिटिकल पार्टी को देते हैं, उससे कम रकम सरकार किसानों की कर्जमाफी के लिए देती है। या कहें कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार जितने बजट का ऐलान करती है उससे ज्यादा कॉर्पोरेट पॉलिटिकल पार्टी को फंड दे देता है। 

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने पॉलिटिकल फंडिंग को लेकर लकीर खींची और उसके बाद चुनाव आयोग सक्रिय हुआ और देश में कॉर्पोरेट फंडिंग को कानूनी जामा पहनाते हुए साफ कर दिया गया कि आखिर राजनीतिक दलों को चलना तो कॉर्पोरेट फंड से ही है तो फिर ट्रस्ट बने। यानी ट्रस्ट के जरिए राजनीतिक दलों को फंड दिया जाता है। 

अगला सवाल ये भी है कि जब चुनावी फंडिंग को ही ट्रस्ट बनाकर कानूनी तौर पर वैध कराया गया तो फिर परेशानी क्या है। यानी खुले तौर पर ट्रस्ट पॉलिटिकल फंड देते हैं और खुले तौर पर सरकार रियायत देती है। 

दरअसल, देश के इकोनॉमी मॉडल की यही खूबसूरती लोकतंत्र के उस राग को ही हड़प लेती है जहां ये बात कही जाती है कि जनता सरकार चुनती है और सरकारें जनता के लिए काम करती हैं क्योंकि कॉर्पोरेट मॉडल को मुनाफा पहुंचाना सरकार की जरूरत है। कॉर्पोरेट फंडिंग से चुनाव को महंगा करना राजनीतिक दल की जरूरत है। फिर महंगा चुनाव लोकतंत्र न होकर बिजनेस में तब्दील होता है। बिजनेस चुनावी जीत की बिसात तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

यानी कॉर्पोरेट एक तरह से राजनीतिक दलों को फंडिंग कर अपने मुनाफे को बढ़ाता भी है और दूसरी तरफ फंडिंग कर अपने बिजनेस के रास्ते कोई नुकसान न आने देने की स्थिति बनाने के लिए भी करता है।

तो सवाल कॉर्पोरेट का है या सवाल उस राजनीति का है जिसे लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं। सिर्फ हर हालात को सत्ता तले कैसे निर्भर बना दिया जाए और पूरा देश चुनावी जीत-हार में फंसे। कॉर्पोरेट सबसे बड़ा खिलाड़ी रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का यही अनूठा सच हो चला है।

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