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ब्लॉग: मिशन-2024 की मजबूरी है गठबंधन

By राजकुमार सिंह | Updated: December 11, 2023 09:53 IST

पांचों राज्यों के मतदाता स्पष्ट जनादेश के लिए प्रशंसा के पात्र हैं, पर इससे अगले लोकसभा चुनाव की स्पष्ट तस्वीर नहीं उभरती है।

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ठळक मुद्देपांचों राज्यों के चुनाव में मिले जनादेश से अगले लोकसभा चुनाव की स्पष्ट तस्वीर नहीं उभरती है कांग्रेस को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ मेें हार और तेलंगाना में अप्रत्याशीत जीत मिली लेकिन तीन राज्यों में मिली जीत से भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव 2024 की चुनौती कम नहीं होगी

सत्ता के सेमीफाइनल के परिणामों ने फाइनल की पहेली और उलझा दी है। पांचों राज्यों के मतदाता स्पष्ट जनादेश के लिए प्रशंसा के पात्र हैं, पर इससे अगले लोकसभा चुनाव की स्पष्ट तस्वीर नहीं उभरती। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से कांग्रेस को काफी उम्मीदें थीं, पर निराशा ही हाथ लगी, जबकि तेलंगाना ने उसे अप्रत्याशित रूप से सत्ता सौंप दी।

पिछले विधानसभा चुनावों में जिस कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता भाजपा से छीन कर सबको चौंका दिया था, वह इस बार ढंग से मुकाबला भी करती नहीं दिखी। यह कांग्रेस के लिए बड़ी चिंता का सबब होना चाहिए क्योंकि अगले लोकसभा चुनाव बमुश्किल पांच महीने दूर हैं।

वैसे इन तीनों राज्यों में मिली जबर्दस्त जीत भाजपा की भी चिंताएं दूर नहीं करती क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में वह यहां अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर चुकी है। किसान आंदोलन के मुद्दे पर एनडीए छोड़ गई नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की पार्टी रालोपा के साथ मिल कर भाजपा ने राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटें जीती थीं। 24 उसके अपने हिस्से में आई थीं. उससे बेहतर प्रदर्शन अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा क्या कर सकती है?

मध्य प्रदेश में भी राज्य की सत्ता हार जाने के चंद महीने बाद भाजपा ने 58 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल करते हुए 29 में से 28 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। इसी तरह छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में मात्र 15 सीटों पर सिमट कर 15 साल पुरानी सत्ता गंवा देनेवाली भाजपा लोकसभा चुनाव में 11 में से नौ सीटें जीत गई थी।

इन तीन राज्यों की 65 लोकसभा सीटों में से 61 अकेलेदम भाजपा के पास हैं। क्या इससे बेहतर चुनावी प्रदर्शन संभव है? इसीलिए भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम की पुनरावृत्ति आसान नहीं मानी जा रही। सही गठबंधन ही अगले लोकसभा चुनाव में सफलता की निर्णायक कसौटी बनता दिख रहा है। इसीलिए जहां 26 विपक्षी दलों ने मिल कर इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस (इंडिया) बनाया तो भाजपा ने भी एनडीए को पुनर्जीवन देते हुए उसका भारी-भरकम विस्तार किया।

दक्षिण भारत में कांग्रेस ने जिस तरह पहले कर्नाटक और अब तेलंगाना की सत्ता हासिल कर ली है, वह भाजपा के लिए चुनावी चुनौती बढ़ाने वाला है, पर शायद इसी से नई राह भी निकलेगी। तेलंगाना में सत्ता गंवानेवाले केसीआर की पार्टी बीआरएस के रूप में भाजपा को दक्षिण में एक और दोस्त मिल सकता है।

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