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अवधेश कुमार का ब्लॉगः समुचित नियोजन से बाढ़ के कहर में लाई जा सकती है कमी

By अवधेश कुमार | Updated: October 13, 2019 07:15 IST

Bihar flood: यह साफ हो गया था कि पटना की नालियां गंदगी और कूड़े से भर गई हैं. अन्य शहरों की तरह वहां भी पिछले दो दशक से ज्यादा समय में इतने आवासीय एवं व्यावसायिक भवनों का बेतरतीब तरीके से निर्माण हुआ है कि उनके लिए पर्याप्त नागरिक सुविधा विकसित कर पाना नगर निगम तो छोड़िए, किसी के वश की बात नहीं. 

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भारत के जो राज्य हर वर्ष बाढ़ का कहर झेलते हैं उनमें बिहार का स्थान सबसे ऊपर है. हालांकि 1975 के बाद कभी इसकी राजधानी पटना को जलप्लावित होते नहीं देखा गया था. वैसे तो देश के 14 से ज्यादा राज्यों में बाढ़ ने अपना कहर दिखाया. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनियाभर में बाढ़ के सर्वाधिक विनाश का शिकार होने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल है. हर वर्ष औसत 1600 लोग बाढ़ के कारण जान गंवाते हैं. इस आंकड़े को यदि ध्यान में लाएं तो पहला निष्कर्ष यह आएगा कि जब हर वर्ष बाढ़ कहर मचाती ही है तो फिर इतनी हाय तौबा क्यों?

केवल पटना ही नहीं बिहार के कई शहरों और सैकड़ों गांवों को इसी तरह की त्रसदी का शिकार होना पड़ा. अगर केंद्र एवं प्रदेश सरकारें पटना जल त्रसदी को सबक के रूप में लेंतो इसकी भयावहता को भविष्य में काफी हद तक कम किया जा सकता है. पटना को हमारे यहां शहरों में जल निकासी, कूड़ा निस्तारण प्रबंधन के चरमरा जाने तथा अनियोजित बस्तियों के लगातार बढ़ते जाने का प्रतीक मानना होगा. 

यह साफ हो गया था कि पटना की नालियां गंदगी और कूड़े से भर गई हैं. अन्य शहरों की तरह वहां भी पिछले दो दशक से ज्यादा समय में इतने आवासीय एवं व्यावसायिक भवनों का बेतरतीब तरीके से निर्माण हुआ है कि उनके लिए पर्याप्त नागरिक सुविधा विकसित कर पाना नगर निगम तो छोड़िए, किसी के वश की बात नहीं. 

यही नहीं, बिहार के ज्यादातर शहरों में सीवर की कोई योजना ही नहीं है. निर्माणों का एक बड़ा भाग वास्तव में विनाश को आमंत्रण देने वाला है. भारी बारिश में यदि जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त हो तो ऐसे मारक जमाव की स्थिति पैदा नहीं होगी. यह ठीक है कि पानी निकलने में समय लगेगा लेकिन अगर नदी का स्तर शहर की सतह से नीचे है तो पानी निकलता रहेगा. यहां तो ऐसा दृश्य था मानो जल निकासी के लिए बने सारे नालों में दरवाजा बंद कर दिया गया हो. यह स्थिति इसलिए पैदा हुई क्योंकि नालों की पर्याप्त सफाई बरसों से नहीं हुई है. 

समय के साथ जल निकासी व्यवस्था तथा कूड़ा प्रबंधन का जैसा ढांचा विकसित होना चाहिए, वैसा हुआ ही नहीं. इसमें नागरिक चेतना का विकास भी जरूरी है. हमारी जिम्मेवारी भी है कि हम कूड़ा कहां और कैसे फेंकते हैं, इसका ध्यान रखें. उसको जल निकासी पथ में डालेंगे तो यह हमारे लिए एक दिन डुबा देने का कारण बनेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान की लगातार अपील, इस पर किए जा रहे खर्च और व्यापक जन जागरण के बावजूद हमारे देश के बड़े वर्ग का कूड़ा निस्तारण का शर्मनाक आचरण नहीं बदल रहा. यह सब केवल पटना की स्थिति नहीं है, कुछेक अपवादों को छोड़कर पूरे भारत की मोटा-मोटी तस्वीर ऐसी ही है.

प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जल बचाव का आह्वान किया है और उस पर सरकार योजना बनाकर खर्च भी कर रही है. खूब प्रचार हो रहा है लेकिन पटना में देखा गया कि लोग बारिश के पानी को बचाने के प्रति भी सतर्क नहीं थे, अन्यथा बड़े भाग को पीने के पानी का संकट नहीं होता. 

पिछले वर्ष केरल में आई भयानक बाढ़ में भारत का आपदा प्रबंधन विश्व स्तर का दिखा था और उसकी प्रशंसा हुई थी. किंतु पटना में जितने व्यापक पैमाने पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन, राज्य आपदा प्रबंधन से लेकर स्थानीय विभागों एवं वायुसेना का संसाधन झांेका जाना चाहिए वह नदारद था.   कुल मिलाकर कहने की आवश्यकता यह है कि पटना की जल त्रसदी से केंद्र व राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और आम नागरिकों को सबक लेकर भविष्य के लिए अपने आचरण में व्यापक बदलाव करना होगा.

टॅग्स :बाढ़बिहारपटना
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