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लाल आतंक का ऐसे हुआ अंत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 19, 2026 11:03 IST

साथ ही उन्हें आधुनिक हथियार और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करवाए गए। यही नहीं विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल को बढ़ाए जाने से नक्सलियों के बारे में रियल टाइम जानकारी मिलने लगी जिससे ऑपरेशन की सफलता बढ़ गई।

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संजीव शर्मा

भारत के जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक की आवाज ही कानून हुआ करती थी, आज वहां विकास की गूंज सुनाई दे रही है। दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माने जाने वाले नक्सलवाद का अब अंत हो चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सुनियोजित रणनीति, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और जमीनी स्तर पर समन्वित प्रयासों का परिणाम है।नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से जमींदारों के विरोध में हुई थी। धीरे-धीरे यह

आंदोलन देश के कई राज्यों में फैल गया और 2000 के दशक तक इसने भारत के 17 प्रतिशत भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया जिसे रेड कॉरिडोर कहा जाने लगा। लगभग 12 करोड़ लोग माओवादी हिंसा की चपेट में आ गए। 2004 में विभिन्न नक्सली गुटों के एकजुट होकर सीपीआई (माओवादी) बनने के बाद यह आंदोलन और संगठित हो गया।

इसका नतीजा यह हुआ कि 2010 के आसपास देश के 96 जिले माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित थे और 126 जिलों को नक्सल प्रभावित माना जाता था। मगर आज यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। यह सिर्फ भौगोलिक सिकुड़न नहीं है, बल्कि एक विचारधारा और हिंसक तंत्र के पतन की कहानी है।

नक्सलवाद के अंत की असली शुरुआत 2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद देखने को मिली, जब पहली बार केंद्र सरकार ने इसके खात्मे के लिए एक एकीकृत और स्पष्ट नीति अपनाई। 2015 में वामपंथी उग्रवाद से निपटने की राष्ट्रीय नीति लाई गई जिसमें सुरक्षा, विकास और पुनर्वास तीनों को एक साथ जोड़ा गया। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता थी एक टीम, एक लक्ष्य का दृष्टिकोण, केंद्र एवं राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और खुफिया जानकारी का रीयल-टाइम साझा करना।

पहले जहां सुरक्षा बलों की कार्रवाई प्रतिक्रियात्मक होती थी, इस नीति के बाद सरकार ने पहल अपने हाथ में ले ली। इस नीति के तहत सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई। हथियार छोड़ समर्पण करने और मुख्यधारा में शामिल होने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास एवं सम्मान और हिंसा जारी रखने वालों के लिए सख्त कार्रवाई की नीति सरकार ने अपनाई। यानी गोली का जवाब गोली से और बोली का जवाब बोली से। 

समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए आर्थिक पैकेज, रोजगार, आवास और प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं दी गईं। इसका असर यह हुआ कि बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में लौटने लगे। वहीं दूसरी ओर, सुरक्षा बलों को पूरी छूट दी गई कि वे हिंसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें। इस स्पष्ट नीति ने भ्रम खत्म किया और सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाया।

पिछले एक दशक में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के परिणाम बेहद प्रभावशाली रहे और यह नासूर अब मिट चुका है। इस नीति की बदौलत हाल के वर्षों में एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। मुठभेड़ में मारे गए नक्सलियों से कहीं ज्यादा ने आत्मसमर्पण किया। 

नक्सली संगठनों की रीढ़ उसके शीर्ष नेतृत्व में होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों के व्यापक अभियान से यह बिखर गया। इन अभियानों में शीर्ष नेताओं का सफाया या गिरफ्तारी, सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव से आत्मसर्पण में आई तेजी से संगठन छोटे-छोटे समूहों में बंट कर रह गया। जो नेता कभी क्रांतिकारी जोन बनाने का सपना देखते थे, वे जंगलों में छिपकर अस्तित्व बचाने की कोशिश करने लगे। 

नक्सलवाद के अंत की असली कुंजी सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास रहा। इन क्षेत्रों में 14 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों का जाल बिछाया गया, हजारों मोबाइल टावर लगाए, बैंकिंग और डिजिटल सेवाएं गांव-गांव तक पहुंचाई गई और स्कूल, आईटीआई एवं स्वास्थ्य केंद्र खोले गए। जिन क्षेत्रों में कभी सरकारी तंत्र का नामोनिशान नहीं था, वहां आज बैंक, इंटरनेट और पक्के घर उपलब्ध हैं। छत्तीसगढ़ की “नियाद नेल्ला नार” जैसी योजनाओं ने गांवों में सीधे विकास पहुंचाया, जिससे लोगों का भरोसा सरकार पर बढ़ा और नक्सलियों का प्रभाव घटा।नक्सलवाद की कमर तोड़ने के लिए अपनाई गई नई नीति में सुरक्षा अभियानों में भी बड़ा बदलाव आया।

तकनीक के माध्यम से ड्रोन और सैटेलाइट निगरानी को बढ़ाया गया जिससे सुरक्षा बलों को नक्सलियों की सटीक जानकारी मिलने लगी। साथ ही उन्हें आधुनिक हथियार और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करवाए गए। यही नहीं विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल को बढ़ाए जाने से नक्सलियों के बारे में रियल टाइम जानकारी मिलने लगी जिससे ऑपरेशन की सफलता बढ़ गई। इसके साथ ही एनआईए और ईडी जैसी राष्ट्रीय एजेंसियों ने नक्सलियों की फंडिंग पर भी करारा प्रहार किया, जिससे उनकी आर्थिक रीढ़ टूट गई।

नक्सलवाद सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं था, बल्कि शहरों में भी इसका एक वैचारिक और लॉजिस्टिक नेटवर्क मौजूद था। सरकार ने इस अर्बन इकोसिस्टम को तोड़ने के लिए भी कार्रवाई शुरू की। यह कार्रवाई इसलिए जरूरी था क्योंकि बिना इस नेटवर्क को खत्म किए नक्सलवाद का पूरी तरह से अंत संभव नहीं था। अब नक्सलवाद उस स्थिति में पहुंच चुका है जहां से उसका पनपना लगभग असंभव दिखता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन इलाकों में कभी बंदूक का राज था, वहां अब जनता खुद विकास की भागीदार बन रही है। यह सिर्फ नक्सलवाद के अंत की नहीं, बल्कि उस विश्वास की जीत है कि जब नीति स्पष्ट हो, नीयत मजबूत हो और प्रयास समन्वित हों, तो कठिन से कठिन चुनौती से भी पार पाया जा सकता है। 

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