Assembly Elections 2026: कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी वाड्रा को असम कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाने का निर्णय 2022 में उत्तर प्रदेश में महासचिव के रूप में उनके बहुचर्चित लेकिन निराशाजनक कार्यकाल के बाद उनकी पहली महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारी है. इस बार बहाने की गुंजाइश नहीं होगी. असम कोई आसान जगह नहीं है और कांग्रेस यह बात बखूबी जानती है.
2016 से सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस 2026 के विधानसभा चुनावों को वापसी के अवसर के रूप में भुनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है. उसने राज्य की 126 सीटों में से 100 पर चुनाव लड़ने की योजना की घोषणा की है और रायजोर दल, असम जातीय परिषद, सीपीआई और सीपीआई (एम) जैसी पार्टियों के साथ गैर-भाजपा गठबंधन बनाने का फैसला किया है.
गौरतलब है कि पार्टी ने अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (एयूआईडीएफ) के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार कर दिया है और इसे ‘सांप्रदायिक’ करार दिया है. यह 2021 के चुनावों से बिलकुल उलट है, जब कांग्रेस-एयूआईडीएफ के बीच गठबंधन था, हालांकि वह भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में नाकाम रहा था.
आंकड़े एक गंभीर कहानी बयां करते हैं. 2021 में, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 75 सीटों के साथ सत्ता बरकरार रखी. कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 50 सीटें मिलीं, जिनमें से अकेले एआईयूडीएफ ने 16 सीटें जीतीं. हालांकि, दोनों गुटों के वोट शेयर में अंतर केवल 1.6 प्रतिशत था. प्रियंका गांधी के सामने दोहरी चुनौती है.
स्क्रीनिंग कमेटी की प्रमुख होने के नाते, उन्हें गुटबाजी पर अंकुश लगाना होगा और टिकट वितरण में सुरक्षित, जाने-पहचाने नामों के प्रलोभन से बचना होगा. असम की राजनीति- जो जातीयता, पहचान और भाजपा की निरंतर लामबंदी से आकार लेती है- में भावनात्मकता नहीं, बल्कि सटीकता की आवश्यकता है.
भाजपा ने 2021 में 75 सीटें जीतने के बाद 103 सीटों का साहसिक लक्ष्य रखा है. यह जिम्मेदारी इस बात की परीक्षा होगी कि क्या प्रियंका गांधी केवल सुर्खियां बटोरने के बजाय ठोस राजनीतिक निर्णय भी ले सकती हैं. असम में प्रतीकात्मकता का कोई महत्व नहीं है. परिणाम ही सब कुछ होंगे.
राज्यसभा में पवार के लिए सूर्यास्त?
महाराष्ट्र के सबसे बड़े नेताओं में शुमार शरद पवार ने कुछ समय पहले सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का संकेत दिया था. लेकिन राजनेताओं के ऐसे बयानों का कोई खास महत्व नहीं होता. जब उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ना बंद किया तो बारामती सीट अपनी बेटी सुप्रिया सुले को सौंप दी, जिन्होंने तब से लगातार चार बार यह सीट जीती है. इसके बाद पवार राज्यसभा में चले गए.
लेकिन इस बार उनकी पार्टी ने विधानसभा की सिर्फ 10 सीटें जीती हैं. अब पवार राज्यसभा में वापसी कैसे करेंगे? महाविकास आघाड़ी (एमवीए) - शिवसेना (उद्धव), कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) - के पास कुल 51 विधायक हैं: उद्धव की शिवसेना के 20, कांग्रेस के 16, पवार की पार्टी के 10 और कुछ सहयोगी एक राज्यसभा सीट जीत सकते हैं.
राज्य में खाली हो रही सात सीटों में से दो पवार के गुट की हैं, और एक-एक उद्धव सेना और कांग्रेस की. अगर एमवीए के दल सहमत होते हैं तो वे शरद पवार को राज्यसभा में वापस भेज सकते हैं. लेकिन क्या वे ऐसा करेंगे? पवार खेमा आशावादी है क्योंकि स्थानीय निकाय चुनावों में दलों ने गठबंधन बदले थे.
वे राज्यसभा चुनावों में भी उनके साथ आ सकते हैं क्योंकि राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता - केवल स्थायी हित होते हैं. इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा का लंबा संसदीय सफर भी अब समाप्त होता दिख रहा है. 92 वर्षीय देवेगौड़ा लगातार किसी न किसी सदन के सदस्य रहे हैं. उन्होंने अपनी लोकसभा सीट अपने पोते को सौंप दी थी.
अब उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो रहा है. मात्र 19 विधायकों के साथ उनकी पार्टी अकेले दम पर एक भी सीट नहीं जीत सकती. राज्यसभा की चार सीटें खाली होने के साथ, भाजपा को एक सीट मिलने की संभावना है. देवेगौड़ा राज्यसभा में तभी लौट सकते हैं जब भाजपा अपनी सीट जद(एस) को दे दे. चूंकि भाजपा के दो सांसद सेवानिवृत्त हो रहे हैं और पार्टी को एक सीट मिलने की उम्मीद है, इसलिए यह संदेहजनक है कि भाजपा देवेगौड़ा के लिए यह सीट छोड़ेगी. लेकिन जद(एस) ने उम्मीद नहीं छोड़ी है.
शशि थरूर अपना रुख क्यों बदल रहे हैं?
कई हफ्तों तक शशि थरूर अप्रत्याशित रूप से सुलह का रुख अपनाते नजर आए. कांग्रेस सांसद को सरकार की कई पहलों का समर्थन करते देखा गया, जिससे दिल्ली में कानाफूसी शुरू हो गई: क्या थरूर भाजपा के करीब आ रहे थे, या कम से कम कांग्रेस की आक्रामक नीति से दूर जा रहे थे? अब यह धारणा कमजोर पड़ती जा रही है.
पिछले कुछ दिनों में, थरूर ने अपनी रणनीति में स्पष्ट बदलाव किया है और संसद के शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार के सबसे सुनियोजित और ठोस आलोचकों में से एक बनकर उभरे हैं. उन्होंने मनरेगा में किए गए बदलावों का विरोध किया और जी राम जी कहे जाने पर यह कहते हुए कड़ी आपत्ति जताई कि ‘राम का नाम बदनाम न करो’.
कई कांग्रेसी नेताओं को आश्चर्य हुआ कि जब थरूर खुलेआम भाजपा के साथ मेलजोल रख रहे थे, तब भी पार्टी ने उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की. थरूर ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने वाले विवादास्पद विधेयक पर भी सरकार की आलोचना की और तर्क दिया कि रणनीतिक क्षेत्रों को कॉरपोरेट जोखिम लेने के हवाले नहीं किया जा सकता.
निर्णायक मोड़ तब आया जब थरूर ने एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक में तीखे शब्दों में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने सरकार पर संसद को ‘रबर स्टैंप’ में तब्दील करने का आरोप लगाया. यह किसी तटस्थ व्यक्ति की बयानबाजी नहीं थी, बल्कि कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप और विधायिका की अनदेखी से बेहद चिंतित एक सांसद का बयान था.
तो फिर कांग्रेस से उनके बाहर निकलने की अटकलें क्यों जारी हैं? आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि थरूर पार्टी की मुखर लेकिन लचर विरोध शैली के अनुरूप चलने से इनकार करते हैं. उनकी आलोचना व्यवस्थित, नीति-उन्मुख और संवैधानिक भाषा पर आधारित है- ये ऐसे गुण हैं जिन्हें आज के अति-पक्षपातपूर्ण माहौल में अक्सर नरमी समझा जाता है. अगर कुछ है तो, थरूर का ‘बदलता रुख’ वैचारिक विचलन के बारे में कम और अनुशासित असहमति के प्रति पार्टी की असहजता के बारे में अधिक बताता है जो दैनिक आक्रोश में लिपटी नहीं होती.
और अंत में
साधना सिंह तब हमेशा सुर्खियों में रहती थीं जब शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उन्हें अक्सर ‘आधा मुख्यमंत्री’ कहा जाता था. लेकिन चौहान के दिल्ली स्थानांतरित होने और केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद से साधना सिंह शायद ही कभी नजर आती हैं.