Add the feeling of self respect with Hindi diwas 2019 | गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: हिंदी के साथ जोड़ें स्वाभिमान की भावना
फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया

Highlightsदूसरी ओर  कोर्ट-कचहरी, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और बैंक आदि स्थानों पर हिंदी और अंग्रेजी भाषाएं प्रतिष्ठा, प्रामाणिकता और उपलब्धता के पैमानों पर अलग पायदानों पर खड़ी दिखती हैं.जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयोग के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है. अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर अच्छी नौकरी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. सरकारी दस्तावेज मूलत: अंग्रेजी में होते हैं और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला है. 

हिंदी भारत की जन-भाषा है और हजार-बारह सौ साल से भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से को अभिव्यक्ति का अवसर देती आ रही है. एक अर्थ में भारतीय मानस हिंदी के साथ ओतप्रोत हो चुका है और साहित्य, संगीत, कला आदि में हमारी उपलब्धियों को अर्थात संस्कृति के प्रमुख अंशों को संजोए हुए है. व्यापार, बाजार और मनोरंजन की दुनिया में हिंदी के बिना आज कोई गति नहीं है. उसकी दुनिया का विस्तार हुआ है और वह कई पगडंडियों व राजमार्गो से होती हुई आगे बढ़ी है. हिंदी का एक वृहत्तर रूप भी है जो अपने भीतर भोजपुरी, अवधी, ब्रज, कुमायूंनी, राजस्थानी आदि अनेक लोक भाषाओं को समाविष्ट किए हुए है. लोक-गीत, लोक-गाथा, लोक-नृत्य आदि में हिंदी के अनेक रंग और छटाएं देखी जा सकती हैं.

 वैश्वीकरण के दौर में  बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के साथ व्यापार बढ़ा रही हैं. चूंकि उपभोक्ता या ग्राहक हिंदी क्षेत्न में अधिक हैं अत: अर्थ तंत्न  में हिंदी की स्थिति मजबूत हुई है. इस बीच सरकारी और निजी दुनिया में कम्प्यूटर की बढ़ती पैठ से कार्य के परिवेश और कार्य पद्धति में एक अनिवार्य बदलाव आ रहा है. हिंदी भाषा की क्षमता को कई तरह से देखा  जाता है. उसके बोलने वालों का बढ़ता संख्या बल, साहित्य-सृजन की मात्ना और उसके प्रकाशन का विस्तार, हिंदी की बढ़ती शब्द-संपदा, हिंदी का लचीला भाषिक स्वरूप, जन-संचार माध्यमों में हिंदी की बढ़ती उपस्थिति, भाषांतर या अनुवाद की व्यवस्था (यांत्रिक भी), पारिभाषिक शब्दावली का विकास आदि को ध्यान में रख कर हिंदी की व्यापक भूमिका को अक्सर रेखांकित किया जाता है.

दूसरी ओर  कोर्ट-कचहरी, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और बैंक आदि स्थानों पर हिंदी और अंग्रेजी भाषाएं प्रतिष्ठा, प्रामाणिकता और उपलब्धता के पैमानों पर अलग पायदानों पर खड़ी दिखती हैं. अंग्रेजी की स्वीकार्यता निश्चित रूप से अधिक है और वह कुछ अतिरिक्त मोह के साथ भारतीय मानस पर चढ़ी हुई है. यह तब है जब पूरे भारत में अंग्रेजीदां की संख्या महज 10 से 15 प्रतिशत के करीब है.

स्मरणीय है कि प्रयोग और संदर्भ के अनुसार ही कोई भाषा विकसित होती है. जिस भाषा का प्रयोग-क्षेत्र जितना ही विस्तृत होता है वह उतनी ही सबल होती है. जब भाषा के प्रयोग को समाज में सम्मान मिलता है तो उसकी स्वीकृति बढ़ती है. कोई भाषा उतनी ही सीखी जाती है जितनी उसकी उपयोगिता होती है. भाषा के प्रयोग से ही उसका अस्तित्व होता है और प्रयोक्ताओं की आवश्यकता से उसकी दक्षता निर्धारित होती है. जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयोग के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है. अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर अच्छी नौकरी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. साथ ही सरकारी दस्तावेज मूलत: अंग्रेजी में होते हैं और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला है. 

इसी तरह प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्न में भी अंग्रेजी की उपस्थिति प्रमुखता से देखी जा सकती है. ऐसे में अंग्रेजी के जानकार व्यक्ति को समाज में अधिक आदर और सम्मान मिलता है. अनुमान है कि जीवन में करणीय लगभग 85 प्रतिशत कार्यो में अंग्रेजी का वर्चस्व है. स्वतंत्रता मिलने के बाद विदेशी भाषा की उपयोगिता और उससे जुड़ा सम्मान भाव कम नहीं हुआ है. फलत: आज गरीब लोग भी लाख मुसीबतें ङोल कर महंगे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में ही अपने बच्चे को पढ़ाते हैं. सरकारी रवैया भी ऐसा ही है. 

हालांकि मातृभाषा ही शिक्षा का प्रभावी माध्यम है, यह वैज्ञानिक अध्ययनों से पुष्ट है, पर अंग्रेजी का भूत ऐसा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी की घुसपैठ बढ़ती जा रही है. लोग अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए बिना जरूरत के भी अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करते हुए दिखाई देते हैं.

भाषाओं के अध्येता इन दिनों भाषाओं के विस्तार और संकुचन का जो मानचित्र बना रहे हैं उसमें निकट भविष्य में हजारों भाषाओं के लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है परंतु हिंदी की स्थिति की सुदृढ़ता का संकेत मिलता है. आज भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए बहुभाषिक कम्प्यूटर और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है. शब्दकोश और विश्वकोश की संख्या बढ़ रही है. हिंदी के व्याकरण पर कार्य हो रहा है, ई-पुस्तकालय और ई-बुक का भी निर्माण हो रहा है. इससे हिंदी की गति को ऊर्जा मिल रही  है.  हिंदी के प्रयोग का क्षेत्न भी बढ़ा है. आज चार करोड़ प्रवासी भारतीय सभी महाद्वीपों में विद्यमान हैं जिनमें अधिकांश हिंदी भाषी हैं.

हिंदी की प्रगति के लिए यह जरूरी होगा कि औपचारिक क्षेत्नों में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए. अपनी भाषा में सोचने, पढ़ने और लिखने से सर्जनात्मकता को भी बल मिलेगा. भाषा का सामाजिक जीवन के सभी अंगों से गहरा रिश्ता है और सामथ्र्यवान समाज के निर्माण के लिए भाषा की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए.


Web Title: Add the feeling of self respect with Hindi diwas 2019
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