इलाज के अभाव में बदतर न होने पाएं मानसिक रोग

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 6, 2026 07:09 IST2026-01-06T07:08:30+5:302026-01-06T07:09:42+5:30

फलस्वरूप कई लोग इस डर से भी इलाज करवाने से कतराते हैं कि कहीं समाज या परिवार में उन्हें अलग-थलग न कर दिया जाए या उनके साथ भेदभाव न होने लगे!

Mental illness should not worsen due to lack of treatment | इलाज के अभाव में बदतर न होने पाएं मानसिक रोग

इलाज के अभाव में बदतर न होने पाएं मानसिक रोग

इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी द्वारा किया जाने वाला यह खुलासा कि देश में 80-85 प्रतिशत मनोरोगियों को वक्त पर इलाज नहीं मिल पा रहा, वाकई गहरी चिंता का विषय है. अपने 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन से पूर्व एक कार्यक्रम में सोसायटी ने यह तथ्य उजागर किया कि सामान्य मानसिक विकारों से पीड़ित 85 प्रतिशत से अधिक लोग या तो उपचार करवा नहीं रहे हैं या उन्हें उपचार मिल नहीं रहा है. मनोरोग में डिप्रेशन (अवसाद), एंग्जायटी (चिंता), सिजोफ्रेनिया, ईटिंग डिसऑर्डर (खाने के विकार) शामिल हैं, जिनके लक्षणों में लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, नींद में बदलाव, भूख में परिवर्तन, सामाजिक अलगाव या वास्तविकता से दूरी (साइकोसिस) शामिल हो सकते हैं.

हालांकि इनका इलाज  थेरेपी (परामर्श) व दवाओं से संभव है लेकिन समस्या यह है कि अधिकांश मनोरोगी यह मानते ही नहीं हैं कि वे मनोरोग से ग्रस्त हैं. इसके अलावा मनोचिकित्सक के पास जाने को भी समाज में प्राय: अच्छी नजर से नहीं देखा जाता और इसे पागलपन से जोड़ लिया जाता है. फलस्वरूप कई लोग इस डर से भी इलाज करवाने से कतराते हैं कि कहीं समाज या परिवार में उन्हें अलग-थलग न कर दिया जाए या उनके साथ भेदभाव न होने लगे! कई लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि उनके या उनके परिजन में दिख रहे लक्षण मनोविकार का संकेत हैं, जिसके लिए मनोचिकित्सक के पास जाने की जरूरत है.

वे अक्सर इन लक्षणों को सामान्य तनाव या व्यक्तिगत कमी मान लेते हैं. मानसिक बीमारियों का इलाज शारीरिक बीमारियों की तरह आसान भी नहीं होता और इसके लिए लम्बे समय तक दवाइयां लेनी पड़ती हैं. चूंकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं अक्सर स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में पूरी तरह कवर भी नहीं हो पातीं और इलाज भी कई बार महंगा होता है, इसलिए जो लोग उपचार का खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं, वे कई बार इलाज अधूरा छोड़ देते हैं, जिससे बीमारी ठीक नहीं हो पाती.

बुजुर्गों को अगर मानसिक बीमारी हो जाए तब तो स्थितियां खास तौर पर बेहद दयनीय हो जाती हैं. पुराने जमाने के संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों का जीवन प्राय: आराम से कट जाता था लेकिन आज के एकल परिवार के दौर में बेटे-बहू अगर कामकाजी हों तो घर में बुजुर्गों की देखभाल के लिए भी कोई नहीं बचता. ऐसे में उन्हें अगर कोई मानसिक बीमारी हो जाए तब तो उनका जीवन जैसे नर्क ही बन जाता है. इसलिए इस दिशा में समाज और सरकार- दोनों को ध्यान देने की जरूरत है.

Web Title: Mental illness should not worsen due to lack of treatment

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