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खतरा बनता बर्फबारी का बदलता मिजाज, 75 दिन बीते, एक बूंद भी बरसात नहीं?

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: January 21, 2026 05:50 IST

भारत सहित बहुत से देशों की जीवन रेखा कहे जाने वाले हिमालय के पहाड़ बर्फ न गिरने से भूरे दिख रहे हैं.

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ठळक मुद्देहिमाचल में इस साल ‘स्नो ड्राउट’ यानी बर्फीले-सूखे के हालात हैं. जनवरी 2026  तक ऊंचे इलाकों में बर्फ नहीं जमी.पश्चिमी विक्षोभ और ग्लोबल वॉर्मिंग से बर्फ तेजी से पिघल रही है.

लगभग 75 दिन बीत गए हैं, कश्मीर से लेकर उत्तरखंड और दिल्ली से लेकर समूचे मैदानी इलाके में एक बूंद भी बरसात हुई नहीं . सूखी सर्दी ने जनजीवन, खेती-किसानी और पर्यावरण को जो चोट पहुंचाई है, उसका असर दूरगामी होना है. सबसे बड़ी बात, जब हर साल गर्मी के दिन और तापमान बढ़ रहे हैं, भारत सहित बहुत से देशों की जीवन रेखा कहे जाने वाले हिमालय के पहाड़ बर्फ न गिरने से भूरे दिख रहे हैं.

हिमाचल में इस साल ‘स्नो ड्राउट’ यानी बर्फीले-सूखे के हालात हैं. उत्तर-पश्चिमी हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर) में 2025-26 की सर्दियों में बर्फ का गिरना सामान्य से 45 से 75 फीसदी कम रहा, खासकर नवंबर-दिसंबर में. उत्तराखंड में दिसंबर 2025 में 100 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई, और जनवरी 2026  तक ऊंचे इलाकों में बर्फ नहीं जमी.

बढ़ते तापमान, कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और ग्लोबल वॉर्मिंग से बर्फ तेजी से पिघल रही है. बीते पांच जाड़ों के मौसम में बर्फबारी में 25 फीसदी की गिरावट आई है. कम बर्फबारी के कारण अगर तापमान जल्दी ही बढ़ जाता है तो देर से होने वाली बर्फबारी और भी अधिक त्रासदीदायक होगी. इससे जीएलओएफ (हिमनद झील के फटने से होने वाली बाढ़) अचानक बाढ़ आएगी.

घरों, बागानों  और मवेशियों को बहा ले जाएगी. गर्मी से यदि ग्लेशियर अधिक पिघले तो आने वाले दिनों में पहाड़ी राज्यों में स्थापित सैकड़ों मेगावाट की जल विद्युत परियोजनाओं पर भी संकट आ सकता है. हालांकि यह भी कड़वा सच है कि पहाड़ों के मिजाज को बिगाड़ने में इन जल विद्युत परियोजनाओं की भूमिका कम संदिग्ध नहीं है.

पहाड़ों पर बर्फ का असर पंजाब की नदियों पर घहराई से होता है. लंबे समय तक सूखे के कारण झेलम और अन्य नदियों का जल स्तर अभी से नकारात्मक सीमा में है. जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने अब तक हुए शोधों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 1985 से 2000 तक हिमालय और ग्लेशियरों में बर्फ पिघलने की रफ्तार दो से तीन गुना बढ़ी है. 40 साल में हिमालयी क्षेत्रों में 440 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है.

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