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क्या हम लोगों को शुद्ध पानी भी नहीं पिला सकते?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 2, 2026 07:32 IST

हम इस बात पर गौर ही नहीं करते कि लगभग 70 फीसदी से ज्यादा मल-जल का उपचार नहीं होता और उसे नदी-नालों में बहा दिया जाता है.

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सवाल यह नहीं है कि देश के सबसे साफ-सुथरे शहर इंदौर की एक बस्ती भागीरथपुरा में दूषित पानी से कितने लोग मरे और कितने लोग अब भी स्वस्थ होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. असली सवाल तो ये है कि क्या हम अपने लोगों को शुद्ध पानी भी नहीं पिला सकते? शुद्ध पानी जीवन की सबसे पहली जरूरत है. खाना खाए बगैर हम कुछ दिनों तक जिंदा रह सकते हैं लेकिन शुद्ध पानी का अभाव जिंदगी में ऐसे जख्म घोलता है जो बहुत जल्दी जीवन को समाप्त कर सकता है. दूषित जल के कारण डायरिया, हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलती हैं.

इंदौर में दूषित पानी के कारण डायरिया फैला और उसने कहर मचा दिया. चूंकि इंदौर को देश का सबसे साफ-सुथरा शहर माना जाता है इसलिए इन मौतों का मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छा गया लेकिन क्या शुद्ध जल के अभाव की समस्या केवल इंदौर में है? देश का शायद ही ऐसा कोई शहर हो, जिसके बारे में यह दावा किया जा सके कि हर नागरिक को शुद्ध जल की आपूर्ति होती है.

बहुत विकसित देशों की बात छोड़ दें तो हकीकत यही है कि न केवल पिछड़े देशों बल्कि विकासशील देशों में भी जल जनित बीमारियां खूब होती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े कहते हैं कि दुनियाभर में करीब पौने दो अरब लोग दूषित पानी के उपयोग के लिए अभिशप्त हैं. दूषित पानी के कारण दुनियाभर में हर साल 50 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है.

स्थानीय निकायों से जो जल प्रदाय होता है, उसमें यह सौ फीसदी सुनिश्चित नहीं होता कि जो पानी घरों के नल तक पहुंच रहा है, वह कितना शुद्ध है. अपने घर में पहुंचने वाले पानी की जांच का तो हमारे देश में रिवाज ही नहीं है. जो लोग सक्षम हैं, वे वाटर फिल्टर लगा लेते हैं लेकिन निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब तबका वाटर फिल्टर का खर्च नहीं वहन कर सकता और यही कारण है कि दूषित जल उसकी जान ले लेता है. हम इस बात पर गौर ही नहीं करते कि लगभग 70 फीसदी से ज्यादा मल-जल का उपचार नहीं होता और उसे नदी-नालों में बहा दिया जाता है. नदी-नालों का यह पानी जमीन के भीतर जाता है और भूजल को प्रदूषित करता है. शहरों का सीवेज सिस्टम कितनी जगह से खराब हो चुका है, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है. जलप्रदाय का बुनियादी ढांचा ही बहुत कमजोर है.

इसका नतीजा है कि जल प्रदाय करने वाले सिस्टम से यदि शुद्ध पानी प्रदान भी किया जाता है तो लोगों के घरों तक पहुंचते-पहुंचते वह काफी हद तक प्रदूषित हो चुका होता है. सवाल यह है कि क्या ऐसी पुख्ता व्यवस्था नहीं की जा सकती कि लोगों के नलों से ऐसा पानी आए जिसे वे बिना किसी जोखिम के पी पाएं? इस मामले में सिंगापुर एक बड़ा उदाहरण है.

उस शहर के पास अपना पानी अत्यंत कम है. वह मलेशिया से पानी खरीदता है और कुछ बारिश का पानी सहेजता है. मल-जल का उपचार करने में उसने महारत हासिल कर रखी है और वहां के वाशरूम में जो जलप्रदाय होता है, उसे बड़ी सहजता से लोग पी सकते हैं क्योंकि वह पूरी तरह शुद्ध होता है. हमारे यहां सरकार के स्तर पर तो लोचा है ही, नागरिकों के स्तर पर भी पानी को लेकर जागरूकता नहीं है. क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि लोग अपनी टंकी की सफाई करते हैं या नहीं?

ऐसे हजारों घर मिल जाएंगे जिनकी टंकियां वर्षों से साफ नहीं की गई हैं. जब हालात इतने बुरे हों तो दूषित जल से मौत का शिकार होना लाजिमी है. हमें हर स्तर पर प्रयास करने होंगे. हमें सोचना होगा कि हम चांद पर किसी भारतीय को पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं और आने वाले  वर्षों में सफल भी हो जाएंगे लेकिन सवाल बना रहेगा कि अपने नागरिकों को हम पीने का शुद्ध पानी कब पहुंचा पाएंगे.

टॅग्स :इंदौरWater Resources and Public Health Engineering Department
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