Dr S S Mantha Opinion piece on University and higher education | विश्वविद्यालय अपनी मेहनत से बनें प्रतिष्ठित
विश्वविद्यालय अपनी मेहनत से बनें प्रतिष्ठित

डॉ. एस.एस. मंठा

यूनिवर्सिटी का मोटे तौर पर मतलब होता है ‘शिक्षकों और छात्रों का समुदाय’। इस शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन से हुई है। इसके पीछे की भावना यह है कि शिक्षकों और छात्रों को यूनिवर्सिटी पोषित और संरक्षित करती है। इसके अलावा, यूनिवर्सिटी का एक महत्वपूर्ण तत्व होता है शैक्षिक स्वतंत्रता की भावना, जो छात्रों के शिक्षा के हित में कहीं भी आने-जाने के अधिकार को सुनिश्चित करती है। इसे सबसे पहले 1158 में बोलोना यूनिवर्सिटी ने अपनाया था। कुछ मायनों में प्रारंभिक विश्वविद्यालयों ने मानविकी, लिबरल आर्ट्स, सामाजिक विज्ञान, बुनियादी विज्ञान और अप्लाइड साइंस सहित शिक्षा के सभी पहलुओं को पोषित किया। अप्लाइड साइंस और उसके अनुप्रयोगों में लगभग क्रांतिकारी वृद्धि हुई, क्योंकि यह समाज की जरूरतों और जीवन को आरामदेह बनाने के साथ निकटता से जुड़ी हुई थी। यदि कोई चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान और भौतिकी के विद्वानों पर मानवता के प्रभाव की जांच करना चाहे तो उसे पता चलेगा कि मानवता और विश्वविद्यालय वैज्ञानिक क्रांति के लिए एक मजबूत प्रेरणा थे। 

कई देशों के माध्यम से, विश्वविद्यालयों की अनेक वर्षो की यात्र का अपने नागरिकों को सर्वश्रेष्ठ प्रदान करने की कोशिशों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। अमेरिका में विश्वविद्यालयों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई एकीकृत परिभाषा नहीं है, हालांकि इस शब्द का पारंपरिक रूप से शोध संस्थानों को नामित करने के लिए उपयोग किया गया है, और एक समय तो यह शब्द डॉक्टरेट प्रदान करने वाले शोध संस्थानों के लिए आरक्षित था। कुछ राज्यों, जैसे कि मैसाच्युसेट्स में केवल उन्हीं स्कूलों को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाता है जो कम से कम दो डॉक्टरेट डिग्री प्रदान करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में, तृतीय शिक्षा गुणवत्ता और मानक एजेंसी उच्च शिक्षा क्षेत्र की स्वतंत्र राष्ट्रीय नियामक है। विश्वविद्यालयों में छात्रों के अधिकारों को भी विदेशी छात्र अधिनियम के द्वारा संरक्षित किया जाता है। यूके में उच्च शिक्षा अधिनियम 1992 के तहत किसी संस्थान को यूनिवर्सिटी शब्द के उपयोग का अधिकार प्रिवी काउंसिल देती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इसी कार्य का भारत में निर्वहन करता है।

पारंपरिक रूप से, विभिन्न देशों में वित्त पोषण की पद्धति काफी अलग-अलग है। कुछ देशों में विश्वविद्यालयों का वित्त पोषण सरकार द्वारा किया जाता है, जबकि कुछ जगहों पर पैसा या तो दानदाताओं की तरफ से आता है या विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों से शुल्क के रूप में वसूला जाता है। कुछ देशों के विश्वविद्यालयों में अधिकांश छात्र स्थानीय शहर के ही होते हैं जबकि कुछ देशों के विश्वविद्यालयों में दुनिया भर से छात्र आकर्षित होते हैं। भारत ने मुख्य रूप से सरकार से वित्त पोषण पैटर्न पर अपने विश्वविद्यालयों का गठन किया, या केंद्रीय विश्वविद्यालय की तर्ज पर, जिसका वित्त पोषण केंद्र सरकार करती है। हालांकि विश्वविद्यालयों और अन्य संगठनों के बीच मुख्य भेद स्वायत्तता की सीमा है, जिसमें वे कार्य करते हैं।

एक शैक्षणिक संस्थान के लिए, स्वायत्तता सरकार या किसी अन्य नियामक तंत्र द्वारा निर्देशित होने से मुक्ति के संदर्भ में है, ताकि वह सार्वजनिक हित में अपने मनमुताबिक कार्य कर सके। हालांकि हमारे विश्वविद्यालय नियमों की भूलभुलैया से चिपके रहते हैं जो उनकी प्रभावशीलता को व्यर्थ कर देता है। कोई भी यूनिवर्सिटी एक्ट पढ़ लीजिए। उसमें व्यर्थता स्पष्ट नजर आएगी। समस्या जटिल है क्योंकि एक यूनिवर्सिटी सिर्फ एक विशाल प्रशासकीय तंत्र ही नहीं है, बल्कि शैक्षणिक दृष्टि से युवाओं के भविष्य को आकार देने की भी उसकी जिम्मेदारी होती है। लेकिन वर्षो से, हमारे विश्वविद्यालयों ने डिग्री और डिप्लोमा के अलावा और क्या दिया है? शिक्षकों के पदों की रिक्तियां, विभागों और प्राध्यापकों के बीच तुच्छ मुद्दों पर होने वाले झगड़ों, दूसरों पर हावी होने की आदत और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं ने हमारे विश्वविद्यालयों को पंगु बनाकर रख दिया है। कई पाठ्यक्रम बहुत कमजोर हैं और यहां तक कि उनमें से कुछ के लिए लेक्चरर भी नहीं हैं। 
भारत में उच्च शिक्षा के लिए डीम्ड विश्वविद्यालय के नाम से एक नया पदनाम बनाया गया है, जो विश्वविद्यालय नहीं हैं, लेकिन उनसे शिक्षा के एक विशिष्ट क्षेत्र में बहुत ही उच्च मापदंडों पर काम करने की उम्मीद की जाती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सलाह पर केंद्र सरकार इस तरह की संस्थाओं की ‘डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ के रूप में घोषणा करती है। वे अकादमिक स्थिति व विश्वविद्यालय के सभी विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं। लेकिन यह समझ से परे है कि जब विश्वविद्यालय की तरह कार्य करने के लिए स्थापित संस्थान के सभी व्यावहारिक उद्देश्य विश्वविद्यालयों के ही समान हैं तो फिर उन्हें पूर्ण विश्वविद्यालय का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता।

ऐसे परिदृश्य में, जबकि शिक्षा क्षेत्र पहले से ही शोचनीय अवस्था में है, सरकार द्वारा ‘इंस्टीटय़ूट ऑफ एमिनेंस’ जैसी एक और इकाई को लाना कितना उचित है? आखिर एमिनेंस (प्रतिष्ठा) का पैमाना क्या है? किसी भी प्रतिष्ठित व्यक्ति के पीछे उसकी वर्षो की मेहनत होती है। प्रतिष्ठा कमाई जाती है, उसे थोपा नहीं जा सकता। शिक्षा क्षेत्र को अन्य क्षेत्रों की तरह ही विघटित किया जाना चाहिए। देश में पीएचडी के लिए हर साल अनेक रिसर्च पेपर प्रकाशित होते हैं, लेकिन गुणवत्ता नहीं होने से वे भीड़ में खोकर रह जाते हैं।

हमें अपने विश्वविद्यालयों में बुनियादी शोध पर जोर देने की जरूरत है। संकाय का मूल्यांकन किया जाए और यदि उसे बदलने की जरूरत हो तो वह भी किया जाए। इससे न केवल भारतीय उत्पाद की पहचान बनेगी बल्कि नया बाजार और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में भी मदद मिलेगी।

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