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आपका बच्चा भी अकेलेपन का शिकार तो नहीं हो रहा ?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 6, 2026 05:44 IST

तीनों बहनों की उम्र 16, 14 और 12 साल थी. इस हृदय विदारक घटना के बाद पुलिस जांच में जुट गई है. मगर सवाल यह है कि यदि वास्तव में इस गेम के कारण ही तीनोंं बहनों ने आत्महत्या की है तो फिर इस तरह के गेम इंटरनेट पर उपलब्ध क्यों हैं?

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ठळक मुद्देहमारी सरकार ऐसे गेम्स को प्रतिबंधित क्यों नहीं करती है?पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. गेम में आत्महत्या का यह कोई पहला मामला नहीं है.

दिल्ली से सटे गाजियाबाद में तीन सगी बहनों ने नौवीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली. कहा जा रहा है कि उन्हें एक ऑनलाइन कोरियन गेम की लत लगी हुई थी. उस गेम में पहला पड़ाव खुद को अकेले कर लेने का था और अंतिम पड़ाव आत्महत्या का था. तीनों बहनों की उम्र 16, 14 और 12 साल थी. इस हृदय विदारक घटना के बाद पुलिस जांच में जुट गई है. मगर सवाल यह है कि यदि वास्तव में इस गेम के कारण ही तीनोंं बहनों ने आत्महत्या की है तो फिर इस तरह के गेम इंटरनेट पर उपलब्ध क्यों हैं? हमारी सरकार के पास इतना बड़ा साइबर सेल है जो हर चीज पर नजर रखता है तो क्या यह गेम उसकी नजर में नहीं आया? गेम में आत्महत्या का यह कोई पहला मामला नहीं है. पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. तो हमारी सरकार ऐसे गेम्स को प्रतिबंधित क्यों नहीं करती है?

और दूसरी सबसे प्रमुख बात कि परिवार इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखता कि उसके बच्चे कौन सा गेम खेल रहे हैं? अब गाजियाबाद की इस घटना का यदि विश्लेषण किया जाए तो कुछ बातें बहुत स्पष्ट हैं. मसलन इन बच्चियों के परिवार में शांति नहीं थी. पारिवारिक क्लेश की स्थिति थी. स्वाभाविक रूप से इसका सबसे बड़ा प्रभाव बच्चों पर ही पड़ता है और वे खुद को अलग-थलग महसूस करने लगते हैं.

 हो सकता है कि गेम के टास्क में उन्होंने खुद को अकेला किया हो लेकिन एक बात तो तय है कि यदि घर में शांति होती तो बच्चों के अकेलेपन पर किसी न किसी की नजर जरूर चली जाती! बच्चों के कमरे में यह लिखा हुआ भी मिला है कि हम बहुत-बहुत अकेले हैं. जहां तक अकेलेपन का सवाल है तो केवल इस घटना में ही नहीं, हमारे समाज में सबसे ज्यादा यदि कोई खतरे में है तो वह है बचपन!

जीवन पर तकनीक हावी होती जा रही है और मोबाइल तो जरूरत से ज्यादा लत मेंं तब्दील हो गया है. ज्यादातर माता-पिता कामकाजी हैं और जब वे शाम को घर पहुंचते हैं तो उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहीं होता. जो भी थोड़ा-बहुत समय होता है, वह भी मोबाइल की रील्स के हवाले हो जाता है.

आप यह दृश्य आमतौर पर कहीं भी देख सकते हैं कि यदि एक परिवार कहीं बैठा है तो सबके सब मोबाइल में तल्लीन होंगे. जब हालात इतने खराब हों तो बच्चों के बचपन को कौन संभालेगा. बच्चे परेशान न करें इसलिए माता-पिता छोटे-छोेटे बच्चों को भी मोबाइल दे देते हैं. बच्चे मोबाइल में तल्लीन हो जाते हैं.

क्या इस बात पर नजर रखना माता पिता की जिम्मेदारी नहीं है कि मोबाइल पर बच्चे क्या देख रहे हैं या फिर कौन सा गेम खेल रहे हैं? निश्चित रूप से माता-पिता या अभिभावक की यह जिम्मेदारी है. मगर दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर परिवार इन दिनों बच्चों पर अकेलापन थोप रहे हैं. आप भी जरूर सोचिएगा कि आपका बच्चा भी तो कहीं अकेलेपन का शिकार नहीं हो रहा है.

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