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एन. के. सिंह का ब्लॉग: उद्यमिता की जनभावना को प्रोत्साहन की दरकार

By एनके सिंह | Updated: June 13, 2020 05:54 IST

उद्यमिता के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा नहीं, अच्छी क्वॉलिटी का माल बनाना होगा और वह तब होगा जब बैंक और उद्योग विभाग का सिस्टम भ्रष्ट न हो, मददगार हो यानी कार्य-संस्कृति बदली जाए.

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उद्यमिता (आंत्रप्रेन्योरशिप) भावना नहीं, संस्कृति, कार्य-संस्कृति, राज्य और उसकी संस्थाओं के प्रति व्यक्ति के विश्वास, जिसे रोबर्ट पुटनम ने ‘सोशल कैपिटल’ की संज्ञा दी थी, से पैदा होती है. कोरोना संकट में अभावग्रस्त करोड़ों लोगों ने दिखा दिया कि उद्यमिता के सारे तत्व उनके भीतर हैं.

अगर गायब है तो राज्य की भूमिका, उस पर विश्वास और इस अविश्वास से उपजी उदासीनता. उद्यमिता के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा नहीं, अच्छी क्वॉलिटी का माल बनाना होगा और वह तब होगा जब बैंक और उद्योग विभाग का सिस्टम भ्रष्ट न हो, मददगार हो यानी कार्य-संस्कृति बदली जाए.          

आइए पहले जनता के भीतर मौजूद उद्यमिता को देखें. बैरागी और पोक्ला दिलेश सहित कुल 33 प्रवासी मछुआरे तमिलनाडु में लॉकडाउन में काम छूट जाने पर एक माह तक उम्मीद बनाए बैठे रहे. स्थिति और बिगड़ी तो सबने वापस अपने मूल राज्य ओडिशा जाने की ठानी.

गरीबी में भी उद्यमशीलता देखें. अपनी बचत से चंदा कर एक तीन इंजन वाली बड़ी नाव 1.83 लाख रुपए में खरीदी और समुद्र के रास्ते 514 नॉटिकल माइल्स (करीब 1000 किमी) गांव को चल पड़े. दो बार तूफान ने जीवन लीला खत्म कर दी होती लेकिन समुद्र का अनुभव काम आया. गांव पहुंचे. दो हफ्ते में ही समझ में आ गया कि यहां जीवन और दुष्कर है.

सोचा था अपनी सामूहिक नाव से मछली मारेंगे और बेहतर जीवन परिवार को देंगे लेकिन सरकार ने मछली को सुरक्षित रखने के लिए न तो शीतगृह बनाया, न बर्फ-प्लांट है और न ही समुद्र से बाजार के लिए कोई लिंक बनाया गया है. गांव में मजदूरी में केवल 200 रुपए मिलते हैं जिससे परिवार चलाना मुश्किल था.

मछली ज्यादा आए तो रखने की व्यवस्था न होने से व्यापारियों का शोषण और कम हो तो इंजन का डीजल भी मुश्किल. वे फिर वापस तमिलनाडु जाना चाहते हैं- दिहाड़ी पर मालिक के लिए मछली मारने. लेकिन मालिक ने काम बंद कर दिया है.    

दूसरा उदाहरण देखें. मात्र 15 वर्षीया ज्योति पासवान लॉकडाउन की त्रासदी में बेरोजगार होकर अपनी मजदूरी से हुई बचत से 2000 रुपए की पैडल-साइकिल खरीदती है और बीमार पिता को पीछे बैठा कर 1200 किमी दूर हरियाणा से दरभंगा की अकल्पनीय यात्रा पर निकलती है.

रोज 150 किमी साइकिल चलाती आठ दिन में वह गंतव्य पहुंचती है. तीसरा मामला देखें. उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बनपति गांव के बचपने से दोस्त मुहम्मद सैय्युब और अमृत कुमार गुजरात के सूरत में मजदूरी करते थे.

लॉकडाउन के अगले दिन बेरोजगार हुए. 48 दिन तक बचत से खाते रहे पर जब दुबारा काम मिलने की आशा बिल्कुल खत्म हो गई तो सड़क के रास्ते 1400 किलोमीटर दूर गांव की ओर चल पड़े. कभी पैदल, ट्रक पर बैठ कर आधा रास्ता तय कर शिवपुरी जिले के कोलरास (मध्य प्रदेश) कस्बे पहुंचे लेकिन सूरज की तपिश में अमृत की हालत बिगड़ गई. उसका बचना मुश्किल लगने लगा. जहां बाकी सभी मजदूरों ने घर पहुंचने के लिए साथ छोड़ दिया, सैय्युब उसे लेकर कोलरास सरकारी अस्पताल पहुंचा.

जब डॉक्टर ने उससे कहा, ‘तुम अपने गांव चले जाओ क्योंकि इसकी स्थिति बचने वाली नहीं है’ तो सैय्युब का जवाब था, ‘मैं इसके मां-बाप को क्या मुंह दिखाऊंगा.’ सैय्युब अंत में उसकी लाश लेकर ही गांव पहुंचा. इन तीनों घटनाओं में गरीबी में भी लोगों की अप्रतिम उद्यमिता का मुजाहिरा होता है. फिर कमी कहां थी?

मछुआरों को गांव के पास शीतगृह मिलता या बाजार की बेहतर शोषण-मुक्त व्यवस्था मिलती तो ये निर्यातक बन सकते थे. राज्य और उसके अभिकरणों ने अपनी भूमिका नहीं निभाई. दूसरे मामले में, जो बालिका पौराणिक श्रवण कुमार के पितृ-प्रेम को भी अपने अदम्य उत्साह से हल्का कर सकती है, जो कामुक-हिंसक समाज के बावजूद ‘भय-मुक्त’ होकर गंतव्य पहुंचती है, वह पढ़ भी सकती थी लेकिन गरीबी ने उसे पिता के साथ काम पर जाने पर मजबूर किया.

गृह-राज्य में कहने को शिक्षा मुफ्त है और पढ़ने के लिए साइकिल भी राज्य अभिकरण की सौगात है (जिसकी बदौलत सत्ता-दल कई बार चुनाव जीत चुका है) लेकिन रोजगार नहीं है. लिहाजा पिता बाहर जा कर कमाता है लेकिन कानून व्यवस्था कमजोर होने के कारण जवान होती लड़की को भी सामने ही रखना चाहता है.

बेटी मजदूरी करेगी तो कुछ कमाई बढ़ जाएगी. तीसरे मामले में, सैय्युब बीमार अमृत को नहीं छोड़ पाता जबकि डॉक्टर उसे कोरोना का भय भी दिखाता है. सैय्युब अपने दोस्त के मां-बाप के प्रति नैतिक जिम्मेदारी तक जानता है. लेकिन देश में पिछले कई वर्षों से सांप्रदायिक तनाव अपने शबाब पर है. किसने बिगाड़ा सैय्युबों की नैतिकता या बैरागियों की उद्यमिता के बोध को?

‘वाइब्रेंट गुजरात’ की तस्वीर एक अखबार में दो दिन पहले छपी. वहां देश के सबसे गरीब जिले डांग के कराडीअम्बा गांव की सरिता गायकवाड़ ने दो साल पहले एशियाई खेलों में दौड़ में देश के लिए गोल्ड जीता. इस ताजा तस्वीर में गांव की लड़कियों के साथ यह अंतरराष्ट्रीय धावक सिर पर मटका लिए एक किलोमीटर दूर कुएं तक जाती दिखी. शायद वह समय ट्रैक पर बिताती तो देश की ‘क्रीड़ा-उद्यमिता’ कुछ और होती. 

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