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कुल कर्ज बढ़कर 9.32 लाख करोड़ रुपए?, असंतुलित वित्तीय प्रबंधन से लड़खड़ाती राज्य सरकार

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 16, 2026 05:31 IST

माना जा रहा है कि यह बुनियादी सामाजिक क्षेत्रों की अनदेखी कर लोकलुभावन योजनाओं में अधिक खर्च का परिणाम है, जिसमें से प्रमुख ‘लाड़ली बहन योजना’ है.

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ठळक मुद्देवित्तीय स्थिति के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. 8.39 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले करीब 18.3 प्रतिशत अधिक है.2025-26 के बजट में विभिन्न विभागों के लिए बड़े पैमाने पर प्रावधान किए गए थे,

वित्तीय वर्ष के समापन पर एक खबर चौंका रही है कि बीते वित्त वर्ष में बजट प्रावधानों का केवल 47 प्रतिशत ही उपयोग में लाया जा सका है. साथ ही आने वाले समय में अधिक राशि मिलने की भी संभावना कम है. जिसका कारण राज्य की आय में अपेक्षित वृद्धि न होना है. आशंका यह भी है कि बजटीय प्रावधानों के वास्तविक वितरण पर 15 से 25 प्रतिशत तक कटौती न हो जाए. यह स्थिति अचानक ही उत्पन्न नहीं हुई है. माना जा रहा है कि यह बुनियादी सामाजिक क्षेत्रों की अनदेखी कर लोकलुभावन योजनाओं में अधिक खर्च का परिणाम है, जिसमें से प्रमुख ‘लाड़ली बहन योजना’ है.

एक ओर राज्य पर कर्ज लगातार बढ़ रहा है, जो आने वाले वर्षों में राज्य की वित्तीय स्थिति के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. वित्त वर्ष 2025-26 तक राज्य का कुल कर्ज बढ़कर 9.32 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच रहा है, जो पिछले वर्ष 2024-25 के 8.39 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले करीब 18.3 प्रतिशत अधिक है.

राज्य पर वर्ष 2014 में 2 लाख 50 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था, जो वित्त वर्ष 2019-20 में 4.51 लाख करोड़ रुपए हुआ और वित्त वर्ष 2023-24 में कर्ज बढ़कर 7,18,507 करोड़ रुपए हो गया. यह स्पष्ट करता है कि राज्य का कर्ज हर साल तेजी से बढ़ रहा है. दूसरी ओर राज्य के वर्ष 2025-26 के बजट में विभिन्न विभागों के लिए बड़े पैमाने पर प्रावधान किए गए थे,

लेकिन आर्थिक वर्ष के अंत तक निधि का खर्च अपेक्षा से कम है, जिसके पीछे कारण बीते वित्त वर्ष में राजस्व आय में अपेक्षित वृद्धि न होना तथा कुछ बड़ी योजनाओं पर अधिक खर्च है. इसी का प्रभाव विभागों के लिए आवंटित निधि के वितरण पर पड़ा है. दावा किया जा रहा है कि स्कूली शिक्षा, सामाजिक न्याय और आदिवासी विकास जैसे विभागों के बजट में मिलाकर करीब 9871 करोड़ रुपए की कटौती दर्ज की गई है,

जो लगभग आठ प्रतिशत के आस-पास है. यह साबित करता है कि लगातार बढ़ते कर्ज के कारण राज्य सरकार वित्तीय दबाव में है, जिससे विकास योजनाएं और आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है. इस स्थिति में बजटीय संतुलन बनाए रखना और खर्चों की प्राथमिकता तय करना बहुत आवश्यक है.

इसके लिए राज्य को आर्थिक नीतियों में सुधार और कर्ज प्रबंधन के लिए मजबूत कदम उठाने होंगे. अन्यथा आवंटित राशि की खोज में नेताओं को तो भटकना ही पड़ेगा, दूसरी ओर सीधे तौर पर निधि की प्रतीक्षा कर रहे विभागों को परेशान होना पड़ेगा. इस स्थिति में यदि कुछ योजनाएं बजट बिगाड़ रही हैं तो उनकी समीक्षा कर वित्तीय प्रबंधन में सुधार करना आवश्यक है.

उनके कारण विकास कार्यों का रुकना चिंताजनक है. फिलहाल वित्त वर्ष के अंत में आधे से अधिक जरूरतों के लिए निधि का अभाव गंभीर स्थिति है. संभव है कि परिस्थितियों का आकलन कर राज्य सरकार वित्तीय प्रबंधन को सुदृढ़ बनाएगी, जिससे घोषणाओं को वास्तविकता में बदलते देखा जा सकेगा. 

टॅग्स :भारतीय रुपयामहाराष्ट्रदेवेंद्र फड़नवीस
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