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ब्लॉग: महंगाई पर काबू पाने की दिशा में सरकार का ठोस कदम

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: August 10, 2023 10:19 IST

खाद्य तेलों तथा खाद्यान्नों एवं दलहनों के दामों में भारी उछाल के कारण पिछले वर्ष महंगाई भी तेजी से बढ़ी. सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप खुदरा महंगाई दिसंबर 2022 में 5.72 और इस वर्ष जून में 4.8 प्रतिशत पर आ गई.

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ठळक मुद्देपहले कोविड-19 और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया में महंगाई को बढ़ाने में निर्णायक भूमिका अदा की है.भारत सहित बड़ी तथा मध्यम स्तर की अर्थव्यवस्थाएं महंगाई की चपेट में हैं.ऐसा लग रहा था कि भारत भी इस युद्ध से प्रभावित होगा लेकिन शुरुआती झटकों के बाद भारत संभल गया.

अर्थव्यवस्था के विकास को रफ्तार देने के मार्ग में महंगाई एक बड़ा अवरोध है. सरकार इस तथ्य को अच्छी तरह से समझती है और महंगाई पर काबू पाने के लिए उसने ठोस कदम उठाने शुरू कर दिए हैं. पिछले साल के मुकाबले महंगाई की दर इस वर्ष कम है लेकिन सब्जियों खासकर टमाटर के अलावा गेहूं और चावल की कीमतों में जबर्दस्त उछाल से महंगाई को लेकर फिर चिंता पैदा हो गई है. 

आम आदमी महंगाई को लेकर बेहद परेशान है. केंद्र सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाने से हिचक नहीं रही है. पिछले महीने उसने गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया. महंगाई पर लगाम कसने के लिए सरकार ने खुले बाजार में बिक्री योजना के तहत कुछ माह पहले 15 लाख टन गेहूं और पांच लाख टन चावल की बिक्री की थी. 

इसके बावजूद चावल और गेहूं की कीमतें खुले बाजार में अपेक्षा के मुताबिक नीचे नहीं आईं. बुधवार को सरकार ने खुले बाजार में बिक्री योजना के अंतर्गत 50 लाख टन गेहूं और 25 लाख टन चावल बेचने का फैसला किया है. इससे अनाज की कीमतों को कम करने में निश्चित रूप से मदद मिलेगी. पहले कोविड-19 और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया में महंगाई को बढ़ाने में निर्णायक भूमिका अदा की है. 

भारत सहित बड़ी तथा मध्यम स्तर की अर्थव्यवस्थाएं महंगाई की चपेट में हैं. इन देशों के मुकाबले भारत में सरकार के असरदार कदमों की वजह से मुद्रास्फीति की दर कम है. यूरोपीय देशों सहित कई देशों में महंगाई पर काबू पाने में रूस-यूक्रेन युद्ध सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है क्योंकि वे अनाज खासकर गेहूं के लिए रूस व यूक्रेन पर ही निर्भर हैं.

ऐसा लग रहा था कि भारत भी इस युद्ध से प्रभावित होगा लेकिन शुरुआती झटकों के बाद भारत संभल गया. भारत में पिछले साल खुदरा आधारित महंगाई 7.4 प्रतिशत थी. 

खाद्य तेलों तथा खाद्यान्नों एवं दलहनों के दामों में भारी उछाल के कारण पिछले वर्ष महंगाई भी तेजी से बढ़ी. सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप खुदरा महंगाई दिसंबर 2022 में 5.72 और इस वर्ष जून में 4.8 प्रतिशत पर आ गई.

सरकार के कदमों के फलस्वरूप खाद्य तेलों तथा दालों की कीमतों में कमी आई लेकिन सब्जियों तथा गेहूं-चावल के दामों में अचानक तेजी से महंगाई फिर चिंता का विषय बन गई है. दस अगस्त को रिजर्व बैंक के आंकड़ों से महंगाई का वास्तविक चित्र सामने आ जाएगा. 

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कौशिक दास के नेतृत्व में प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भारत में महंगाई को लेकर एक रिपोर्ट दो-तीन दिन पहले जारी की है. इसमें कहा गया है कि चावल, गेहूं और सब्जियों के अलावा जुलाई में 22 खाद्य पदार्थों के दाम बहुत तेजी से बढ़े. खाद्य पदार्थों की कीमतें जून 2023 में जहां 2.4 प्रतिशत की दर से बढ़ीं, वहीं जुलाई में यह दर बढ़कर 12.3 प्रतिशत हो गई. 

महंगाई भारत के लिए कोई नई समस्या नहीं है और आम आदमी इस पर कई बार तीखी प्रतिक्रिया भी देता है. 25 साल पहले दिल्ली विधानसभा के चुनाव नतीजों को प्याज की कीमतों ने प्रभावित किया था. 2014 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार के साथ-साथ महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा था. हाल ही में कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ महंगाई भी प्रमुख हथियार रही. भारत को आजाद हुए 76 वर्ष हो रहे हैं. 

76 वर्षों में सिर्फ दो मौके ऐसे आए जब महंगाई ने कल्पना से ज्यादा उड़ान भरी. 1956-57 में महंगाई की दर 13.8 प्रतिशत तक पहुंची थी और कच्चे तेल की कीमतों में अभूतपूर्व तेजी के कारण 1973-74 में भारत में महंगाई की दर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. 

इन 76 वर्षों में भारत ने चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध झेले, भीषण सूखा और अकाल का भी सामना किया तथा ताजा-ताजा कोविड-19 महामारी का आघात सहन किया मगर केंद्र में जो भी सरकार रही, उसने महंगाई पर जल्दी ही काबू पाने में सफलता हासिल कर ली.

महंगाई का ताजा दौर अर्थव्यवस्था के विकास की रफ्तार को प्रभावित कर रहा है, आम आदमी का बजट भी गड़बड़ा रहा है. मगर सरकार कीमतों पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रही है. अगले कुछ हफ्तों में महंगाई के मोर्चे पर निश्चित रूप से अच्छी खबर आएगी.

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