गिग-वर्कर्स: डिजिटल सुविधा की चकाचौंध में पसीने का अंधेरा

By ललित गर्ग | Updated: January 3, 2026 07:52 IST2026-01-03T07:51:07+5:302026-01-03T07:52:50+5:30

मुनाफे की अंधी दौड़ में लगी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को यह समझना होगा कि श्रम केवल लागत नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा है;

Gig-workers darkness of sweat in glare of digital convenience | गिग-वर्कर्स: डिजिटल सुविधा की चकाचौंध में पसीने का अंधेरा

गिग-वर्कर्स: डिजिटल सुविधा की चकाचौंध में पसीने का अंधेरा

ऑनलाइन बाजार और त्वरित सेवाओं के इस दौर में गिग-वर्कर्स शहरी जीवन-व्यवस्था की वह अदृश्य रीढ़ बन चुके हैं, जिनके बिना ‘दस मिनट में डिलीवरी’ और ‘एक क्लिक पर सुविधा’ की कल्पना भी नहीं की जा सकती. बाजार आने-जाने के झंझट से लोगों को मुक्त करने वाले ये युवा हर मौसम, हर समय और हर जोखिम में घर-घर सामान पहुंचाते हैं.  लेकिन विडंबना यह है कि जिनके श्रम पर डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊंची इमारत खड़ी है, वही श्रमिक सबसे अधिक असुरक्षा, शोषण और उपेक्षा झेल रहे हैं.

नए साल की पूर्व संध्या पर गिग-वर्कर्स द्वारा की गई हड़ताल ने भले ही देशव्यापी आपूर्ति-श्रृंखला को ठप न किया हो, लेकिन इसने उनकी बदहाल कार्य-परिस्थितियों की ओर देश का ध्यान अवश्य खींचा है. यह हड़ताल किसी राजनीतिक उकसावे का परिणाम नहीं, बल्कि लगातार बढ़ते काम के दबाव, घटते मेहनताने, नौकरी की अनिश्चितता और सम्मान के अभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी.

अपना व परिवार का पोषण करने वाले इन युवा गिग-वर्कर्स को अक्सर सरपट दौड़ती मोटरसाइकिलों पर, भारी थैलों के साथ ऊंची इमारतों की सीढ़ियां चढ़ते देखा जा सकता है. समय सीमा का दबाव इतना तीव्र होता है कि जरा-सी देरी पर आर्थिक दंड झेलना पड़ता है. दुर्घटना, बीमारी या तकनीकी गड़बड़ी-किसी भी स्थिति में उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है.  

निस्संदेह, गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार सृजन की अपनी क्षमता दिखाई है. आज भारत में गिग-वर्कर्स की संख्या सवा करोड़ से अधिक है और अनुमान है कि 2030 तक यह संख्या दो करोड़ पैंतीस लाख तक पहुंच सकती है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बेरोजगारी के बढ़ते दौर में पढ़े-लिखे युवा इस व्यवस्था में ‘विकल्प’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘मजबूरी’ में प्रवेश कर रहे हैं.  

जिस देश को युवाओं का देश कहा जाता है, वहां शिक्षित युवाओं का अस्थायी, असुरक्षित और सम्मानहीन श्रम-व्यवस्था में फंसना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है. यह स्थिति बताती है कि हमारी विकास-नीतियां रोजगार की गुणवत्ता पर नहीं, केवल संख्या पर केंद्रित हैं. गिग-वर्कर्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कंपनियां उनसे पूरा काम लेती हैं, लेकिन उन्हें पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के दायरे में स्वीकार नहीं करतीं. उन्हें ‘स्वतंत्र कामगार’ कहकर नियुक्ति, स्थायित्व, बीमा और न्यूनतम वेतन जैसी जिम्मेदारियों से बचा जाता है.

तेजी से फैलती ऑनलाइन सेवाओं की दुनिया में गिग-वर्कर्स की कार्य-सेवाओं को अब अनौपचारिक नहीं, बल्कि नियोजित, मान्यताप्राप्त और सम्मानजनक श्रम के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. उनकी मेहनत का उचित और सुनिश्चित भुगतान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां और सामाजिक सुरक्षा कोई दया नहीं, बल्कि उनका अधिकार है, जिसमें सरकार को निर्णायक हस्तक्षेप करना ही होगा. मुनाफे की अंधी दौड़ में लगी बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को यह समझना होगा कि श्रम केवल लागत नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा है; शोषण की मानसिकता छोड़कर संवेदनशीलता और जवाबदेही अपनाए बिना कोई भी डिजिटल विकास टिकाऊ नहीं हो सकता.  

Web Title: Gig-workers darkness of sweat in glare of digital convenience

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