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105 मिनट की यात्रा और कई सवाल!

By विजय दर्डा | Updated: January 26, 2026 06:07 IST

पाठकों को सहज शब्दों में इन सारी परिस्थितियों से अवगत कराते रहना मेरी जिम्मेदारी है. मैं विषयों को देशी और विदेशी में नहीं बांटता.

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ठळक मुद्देमैं जो कुछ भी लिखता हूं, समसामयिक लिखता हूं ताकि पाठक सजग रहें. उनके मन में जो सवाल उठ रहे हों, उनके जवाब तलाशे जाएं. किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की यह अत्यंत छोटी यात्रा थी.

सबसे पहले गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं...जय हिंद!

पिछले दिनों यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जो नियमित रूप से मेरा कॉलम पढ़ते हैं. उनका एक अहम सवाल था कि देश और प्रदेश में इतनी गतिविधियां हो रही हैं. इतने सारे प्रश्न खड़े हो रहे हैं, फिर मैंने इन दिनों अपने कॉलम में विदेशी मसलों को प्राथमिकता क्यों दी है? मैं पाठकों को बताना चाहूंगा कि दुनिया एक-दूसरे से इतनी करीब है कि हर मसले से भारत जुड़ा हुआ है. अपने पाठकों को सहज शब्दों में इन सारी परिस्थितियों से अवगत कराते रहना मेरी जिम्मेदारी है. मैं विषयों को देशी और विदेशी में नहीं बांटता.

मैं जो कुछ भी लिखता हूं, समसामयिक लिखता हूं ताकि पाठक सजग रहें. उनके मन में जो सवाल उठ रहे हों, उनके जवाब तलाशे जाएं. तो फिलहाल चर्चा का विषय यह है कि पिछले सप्ताह यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान केवल 105 मिनट के लिए भारत आए. किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की यह अत्यंत छोटी यात्रा थी.

प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए अगवानी के लिए मोदी जी एयरपोर्ट गए. वहां से दोनों एक ही कार में पीएम निवास पहुंचे. गुफ्तगू हुई. कुछ डील साइन हुए और नाहयान फिर यूएई निकल गए. स्वाभाविक रूप से हर किसी के मन में यह सवाल उठा कि इस यात्रा का मकसद क्या था? विदेश मंत्रालय ने हमें साइन हुए डील की कुछ जानकारियां दीं लेकिन क्या इस संक्षिप्त यात्रा का मकसद केवल इतना ही था?

यह सवाल उठना लाजिमी है क्योंकि यूएई हाल के वर्षों में कूटनीति का धुरंधर खिलाड़ी बन कर उभरा है. और दूसरी बात कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कूटनीति के चाणक्य हैं. मध्य पूर्व के सभी देशों से उन्होंने भारत के रिश्तों में गजब की मिठास घोली है. चाहे यूएई हो, सऊदी अरब हो, कतर हो, ईरान हो या फिर इजराइल. सभी भारत के दोस्त हैं.

यूएई तो इतना करीबी है कि उसने बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर बनाने की इजाजत दी. यह अच्छी बात है कि भारत और यूएई में डिफेंस, स्पेस और स्पेशल इन्वेस्टमेंट पर कई सहमतियां बनी हैं. डील साइन हुए हैं लेकिन बड़ी खबर यह है कि भारत को यूएई सालाना पांच लाख मीट्रिक टन लिक्विफाइड नेचुरल गैस की आपूर्ति करेगा.

यानी भारत को एलएनजी आपूर्ति करने वाला वह दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है. मगर ये सारे मुद्दे वो हैं जो सतह पर हैं. सोचने वाली बात यह है कि इस मुलाकात की गहराई में कौन से मुद्दे रहे होंगे. क्या नाहयान कोई ऐसा संदेश लेकर आए थे जो सिक्योर्ड लाइन पर भी साझा नहीं की जा सकती थी? या फिर विषय ऐसे थे कि जिस पर दोनों नेताओं का आमने-सामने बात करना ही उचित होता?

क्या इस बातचीत में ट्रम्प का बोर्ड ऑफ पीस भी शामिल था? ट्रम्प ने यह बोर्ड दुनिया में शांति के लिए बनाया है जिसका सबसे पहला प्रोजेक्ट गाजा का विकास होगा. 60 देशों को इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया है जिसमें भारत भी है. वैसे आपको जानकर हैरत होगी कि जिसे स्थायी सदस्यता चाहिए, उसे एक बिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा. बाकी बातें अभी स्पष्ट नहीं हैं.

आपको बता दें कि चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और कई अन्य बड़े देशों ने बोर्ड की साइनिंग सेरेमनी में भाग नहीं लिया. इसे  बहिष्कार कहा जा रहा है. जर्मनी, इटली, रूस और तुर्किए जैसे कई देशों ने कुछ भी नहीं कहा है. भारत ने भी चुप्पी साध रखी है लेकिन यूएई ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है. तो क्या दोनों नेताओं के बीच बातचीत में यह मामला भी आया होगा?

क्या वे कोई संदेश लेकर आए थे? यह सवाल इसलिए कि मध्य पूर्व की राजनीति या फिर किसी भी उथल-पुथल का सीधा असर भारत पर भी पड़ता है और दूसरी बात है कि भारत एक तरफ इजराइल से बेहतरीन संबंध रखता है और दोनों का व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर फिलिस्तीन के समर्थन का स्टैंड भी कायम रखा है.

निश्चित रूप से ट्रम्प चाह रहे होंगे कि भारत बोर्ड में शामिल हो. सवाल है कि दुनिया में शांति के लिए यूनाइटेड नेशन है तो ऐसे बोर्ड की क्या जरूरत? लोगों की एक जिज्ञासा यह भी है कि यूएई के राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के बीच चर्चा में क्या मध्य पूर्व के अन्य मामले भी रहे होंगे? ऐसा इसलिए कि सऊदी अरब और पाकिस्तान में स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ है.

इसका मतलब है कि एक पर हमला दूसरे पर भी हमला माना जाएगा. इस गठबंधन में तुर्किए भी शामिल होने ही वाला है. खबर तो यह भी आ रही है कि इस गठबंधन में मिस्र और सोमालिया भी शामिल होने को उतावले हैं. इधर सऊदी अरब और यूएई में यमन, सोमालीलैंड और सूडान में संघर्ष को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है.

यूएई कतई नहीं चाहेगा कि सऊदी अरब की स्थिति मजबूत हो. यदि सऊदी के साथ कोई संघर्ष होगा तो कौन उसका साथ देगा? अमेरिका तो सऊदी से भी और यूएई से भी दोस्ती की बात करता है. इसलिए वह किसी के पक्ष में खुलकर नहीं आएगा. इसलिए यूएई का भारत की ओर देखना आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

इजराइल, यूएई और भारत के डिफेंस पैक्ट की चर्चा जोर पकड़ रही है. सवाल लाजमी है कि क्या मुलाकात में इस विषय पर भी बात हुई होगी? और क्या चर्चा में ईरान का मुद्दा भी था? मगर फिलहाल इंतजार कीजिए. वक्त सारे सवालों के जवाब जरूर देता है.

टॅग्स :गणतंत्र दिवसUAEनरेंद्र मोदीदिल्ली
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