तेहरान: अमेरिका के साथ घंटों चली शांति वार्ता विफल होने पर ईरान के नागरिकों ने रविवार को निराशा और बगावती तेवर की मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ईरान द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने की प्रतिबद्धता से इनकार करने के कारण वार्ता विफल हो गई।
हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने समझौते तक पहुंचने में विफल रहने के लिए अमेरिका को दोषी ठहराया, लेकिन यह नहीं बताया कि किन बिंदुओं पर गतिरोध कायम रहा। पाकिस्तान में 21 घंटे तक चली अहम वार्ता के विफल होने के बाद 22 अप्रैल को समाप्त होने वाले दो सप्ताह के नाजुक युद्धविराम के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
ईरान की राजधानी तेहरान में अखबारों की दुकान के बाहर खड़े फरहाद सिमिया ने ‘एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया कि उन्हें सफल वार्ता और लड़ाई के अंत की उम्मीद थी, लेकिन वार्ता की विफलता के बावजूद वह ईरान के साथ खड़े हैं। सिमिया (43) ने कहा, ‘‘मैं युद्ध के खिलाफ हूं। मुझे लगता है कि बातचीत बेहतर रास्ता है।’’
उन्होंने समझौते तक न पहुंच पाने के लिए अमेरिका की ‘‘अनुचित मांगों’’ को जिम्मेदार ठहराया। मेहदी हुसैनी (43) ने भी सिमिया से सहमति जताते हुए कहा, ‘‘युद्ध के मैदान में ईरान को जो बढ़त मिलती दिख रही थी, उसे देखते हुए यह वास्तविक चिंता थी कि हम बातचीत में उन सभी उपलब्धियों को खो सकते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘बातचीत सफल होती है या नहीं, यह एक अलग बात है, लेकिन यह तथ्य कि ईरानी वार्ता टीम ने पीछे हटने और आत्मसमर्पण करने से इनकार करते हुए युद्ध में हासिल की गई बढ़त को बरकरार रखने में कामयाबी हासिल की, जो आशा का कारण देता है।’’ तेहरान की सड़कों पर बड़े-बड़े ईरानी झंडे और देश के नेताओं और सैन्य उपलब्धियों का गुणगान करने वाले विशाल बोर्ड लगे हुए हैं।
एक बड़े चित्र में वर्दी पहने ईरानी पुरुष समुद्र से मछली पकड़ने का जाल उठाते हुए दिखाए गए हैं, जिसमें छोटे आकार के अमेरिकी सैन्य विमान और युद्धपोत फंसे हुए थे। बिलबोर्ड पर लिखा है, ‘‘जलडमरूमध्य बंद रहेगा’’। हामिद हाघी (55) ने कहा कि वार्ता की विफलता का कारण ‘‘अमेरिका का अतिवादी रवैया’’ था।
उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य में आना चाहता है, जो हमारे पूर्वजों की विरासत है। हम स्वयं इसकी निगरानी कर सकते हैं।’’ कई ईरानियों की तरह, 60-वर्षीय मोहम्मद बागेर का मानना है कि ईरान को अमेरिका के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए, क्योंकि उसी (अमेरिका) ने युद्ध की शुरुआत की है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब तक हमारे हितों का सम्मान किया जाता है, हम संवाद और बातचीत करने वाला राष्ट्र हैं। हमने कभी युद्ध नहीं चाहा। हम अंत तक दृढ़ रहेंगे, हम अपने प्राणों का बलिदान देने को तैयार हैं, और उन्हें अपनी एक इंच भी जमीन नहीं देंगे।’’