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Shab-E-Barat 2019: भारत में शब-ए-बारात आज, जानिये इसे क्यों कहा जाता है माफी की रात

By उस्मान | Updated: April 20, 2019 11:16 IST

शब-ए-बारात 2019 (Shab-E-Barat 2019) यह रमज़ान के पवित्र महीने के शुरू होने से लगभग 15 दिन पहले मनाया जाता है। इस पवित्र रात में अगले साल के लिए सभी मनुष्यों की किस्मत तय की जाती है। इस रात को अल्लाह सभी पापियों को माफ कर देते हैं।

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शब-ए-बारात 2019 (Shab-E-Barat 2019) भारत में 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। शब-ए-बारात को मध्य-शाबान (रमजान से पहले आने वाला 8वां अरबी महीना) और लैलात-उल-बारा कहा जाता है। मध्य पूर्व देश में इसे निस्फ शाबान Nisf (u) Sha'ban या लैलात-उल-बारा Laylat al-Bara'at के नाम से जाना जाता है। यह रमज़ान के पवित्र महीने के शुरू होने से लगभग 15 दिन पहले मनाया जाता है। इस साल रमजान की शुरुआत 5 मई (रविवार) से होगी। चलिए जानते हैं कि शब-ए-बारात क्या है और इसके क्या महत्व हैं और यह दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा क्यों मनाया जाता है?

 शब-ए-बारात पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और ईरान सहित इस्लामी देशों में व्यापक रूप से मनाया जाता है। इन इस्लामिक देशों में आज के दिन अवकाश रहता है। ऐसा माना जाता है कि इस पवित्र रात में अगले साल के लिए सभी मनुष्यों की किस्मत तय की जाती है। इस रात को अल्लाह सभी पापियों को माफ कर देते हैं।

भारत में शब-ए-बारात 2019 कब मनाया जाएगा (When Shab-e-Barat 2019 will be celebrated in India)

भारत में शब-ए-बारात 20 अप्रैल, शनिवार या शाबान माह के 15 वें दिन मनाया जाएगा। इस्लामिक चांद कैलेंडर के अनुसार, तिथि में परिवर्तन सूर्यास्त के बाद होता है। इसलिए, इस शनिवार (20 अप्रैल, 2019) को सूर्यास्त के बाद 15 वें शाबान की शुरुआत होगी और यह त्योहार अगले सूर्यास्त तक, यानी रविवार, 21 अप्रैल, 2019 की शाम तक चलेगा।

शब-ए-बारात का मतलब क्या है (What is the meaning of Shab-e-Barat)

उर्दू में शब शब्द का मतलब रात है और बारात एक अरबी शब्द है जिसका अंग्रेजी में अर्थ है मासूमियत या मुक्ति है। शब-ए-बारात का सही अर्थ वह रात है जिसमें अल्लाह इस रात को अपने बंदों को माफ कर देता है। यही वजह है कि इसे मोक्ष की रात कहा जाता है।

शबे-ए-बारात​​​​​​​ 2019 - इतिहास (Shabe-e-Barat 2019 – History)

इस्लाम के संस्थापक पैगंबर मोहम्मद का जन्म और पालन-पोषण मक्का में हुआ था। बाद में, उन्हें इस पवित्र शहर को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था क्योंकि वह इस्लामी उपदेशक थे। वह कभी भी लोगों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर नहीं करते थे लेकिन उनके कामों से लोग शांति और धर्म के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाते थे। जैसे-जैसे दिन गुजरते गए, वह काफी प्रसिद्ध हो गए। उनकी शिक्षाओं ने पूरे अरब प्रायद्वीप को प्रेरित किया। 

मक्का के व्यापारी से हर दिन की धमकी के बावजूद, पैगंबर मोहम्मद को पड़ोसी शहर मदीना में कुछ अच्छे अनुयायी मिले, जो बाद में मोहम्मद के साथ रहने लगे। जब मक्का के अधिकारीयों को  मोहम्मद की बढ़ती लोकप्रियता के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे सबक देने की योजना बनाई। उन्होंने मोहम्मद साहब को पवित्र शहर मक्का छोड़ने के लिए मजबूर किया और वो 622 वीं शताब्दी में मदीना चले गए।

हालांकि, मोहम्मद अपने सहयोगियों के साथ 630 वीं शताब्दी में मक्का लौट आए और इसे जीत लिया। दुनिया भर में रहने वाले मुसलमानों का मानना है कि मोहम्मद ने खून खराबे से परहेज किया और कई लोगों को माफी दे दी। मोहम्मद के मक्का लौटने की यह विशेष रात मुसलमानों द्वारा शब ए बारात, माफी की रात के रूप में मनाई जाती है।

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