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नाग कुआंः नागलोक का रास्ता है यह कुआं, नागपंचमी के दिन ही होते हैं दर्शन

By गुणातीत ओझा | Updated: July 25, 2020 13:00 IST

नाग कुआं सिर्फ एक दिन नाग पंचमी पर्व पर ही दर्शन के लिए खोला जाता है। इस दिन यहां नाग पूजा की जाती है। मान्यता है कि जो भी नाग पंचमी के दिन यहां पूजा अर्चना कर नाग कुआं का दर्शन करता है, उसकी जन्मकुन्डली के सर्प दोष का निवारण हो जाता है।

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ठळक मुद्देनाग कुआं सिर्फ एक दिन नाग पंचमी पर्व पर ही दर्शन के लिए खोला जाता है।मान्यता है कि जो भी नाग पंचमी के दिन यहां पूजा अर्चना कर नाग कुआं का दर्शन करता है, उसकी जन्मकुन्डली के सर्प दोष का निवारण हो जाता है।

Nag Panchami 2020: धर्म नगरी काशी के नवापुरा क्षेत्र में एक ऐसा कुआं है जिसके बारे में मान्‍यता है कि इसकी अथाह गहराई नागलोक तक जाती है। कारकोटक नाग तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध इस कुएं की गहराई कितनी है इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं। धर्मशास्‍त्रों के अनुसार इस कूप के दर्शन मात्र से ही नागदंश के भय से मुक्‍ति मिल जाती है।

करकोटक नाग तीर्थ के नाम से विख्‍यात इसी पवित्र स्‍थान पर शेषावतार (नागवंश) के महर्षि पतंजलि ने व्याकरणाचार्य पाणिनी के महाभाष्य की रचना की थी। मान्यता यह भी है की इस कूप का रास्ता सीधे नाग लोक को जाता है। इस कूप की सबसे बड़ी महत्ता ये हैं की इस कूप में स्नान व पूजा मात्र से ही सारे पापों का नाश हो जाता है। कूप में स्नान मात्र से ही नाग दोष से मुक्ति मिल जाती है, ऐसी मान्‍यता है। 

विश्व के तीन महा कुंड में सबसे प्रसिद्ध कुंड है नाग कुआं

पूरे विश्व में काल सर्प दोष की सिर्फ तीन जगह ही पूजा होती हैं उसमे से ये कुंड प्रधान कुंड हैं। कहा जाता है कि जैतपुरा का कुंड ही मुख्य नागकुंड है। जिसका निर्माण महर्षि पतंजलि ने अपने तप से किया था। मान्यताओं के अनुसार, महर्षि पतंजलि ने एक शिवलिंग की भी स्थापना की थी। बताया जाता है कि नागपंचमी से पहले कुंड की सफाई कर जल निकाला जाता है और फिर शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। 

गहराई का आज तक नहीं चल सका पता

इस जाने-माने स्थान को करकोटक नाग तीर्थ के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि अभी तक नागकुंड की गहराई की सही जानकारी नहीं हो सकी है। कहा जाता है कालसर्प दोष से मुक्ति पाने का यह प्रथम स्थान है, जबकि दुनिया में ऐसे तीन स्थान हैं।

भगवान शिव के इस रूप की पूजा

यहां भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि भगवान शिव की पूजा यहां नागेश के रूप में होती है। भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा के कारण इस मंदिर को करकोटक नागेश्वर के नाम से जाना जाता है।

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