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सियासतः पश्चिम बंगाल में सियासी ऊँट किस करवट बैठेगा, कोई नहीं जानता!

By प्रदीप द्विवेदी | Updated: June 13, 2019 00:06 IST

पश्चिम बंगाल में अभी विधानसभा चुनाव में समय है, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जहां उत्साहित बीजेपी जल्दी से जल्दी प्रदेश की सत्ता हांसिल करना चाहती है

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पश्चिम बंगाल में अभी विधानसभा चुनाव में समय है, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जहां उत्साहित बीजेपी जल्दी से जल्दी प्रदेश की सत्ता हांसिल करना चाहती है और इसके लिए सारे राजनीतिक उपाय आजमा रही है, वहीं सत्तारूढ़ टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी इन नए राजनीतिक हालातों पर काबू पाने की कोशिश कर रही हैं. 

ममता बनर्जी ज्यादा परेशान इसलिए हैं कि पश्चिम बंगाल में आक्रामक राजनीति ज्यादा पसंद की जाती है, वे स्वयं भी ऐसे सियासी तेवर के साथ ही सत्ता में आई थी. यही नहीं, लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी ने लेफ्ट का वोट बैंक अपने कब्जे में कर लिया है, अगर कुछ समर्थन और जुटाने में बीजेपी कामयाब हो गई तो प्रदेश की सत्ता ममता बनर्जी के हाथ से निकल भी सकती है.

उधर, पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है और इसके कारण लगातार कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती जा रही है. ममता बनर्जी को लगता है कि इसकी आड़ में उन्हें समय से पहले सत्ता से हटाया जा सकता है और इसीलिए वे अपनी सुरक्षा दीवार मजबूत करने में जुटी हुई हैं. इधर, पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार का कहना है कि- लोकसभा चुनावों के बाद भी हिंसा राज्य सरकार की नाकामी लगती है. इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल की ममता सरकार को एडवाइजरी जारी करते हुए गृह मंत्रालय ने उससे कानून व्यवस्था, शांति और सार्वजनिक अमन बनाए रखने को कहा है. एडवाइजरी में यह भी कहा गया कि पिछले कुछ सप्ताहों में जारी हिंसा राज्य में कानून व्यवस्था बनाये रखने और जनता में विश्वास कायम करने में राज्य के कानून प्रवर्तन तंत्र की नाकामी लगती है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल को लेकर बीजेपी की उम्मीदे और ममता बनर्जी की आशंकाएं हवा में नहीं हैं. लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है. लोकसभा चुनाव 2014 के सापेक्ष 2019 के परिणाम बदलती राजनीतिक तस्वीर की ओर इशारा कर रहे हैं, जब ममता बनर्जी को 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है, तो कांग्रेस को 2 और लेफ्ट को 2 सीटों का घाटा हुआ है, जबकि बीजेपी को 16 सीटों का फायदा हुआ है. 

बड़ा बदलाव वोटों की हिस्सेदारी को लेकर है, जहां लोकसभा चुनाव 2014 के सापेक्ष 2019 में ममता बनर्जी को केवल 3.48 प्रतिशत वोटों का फायदा हुआ है, जबकि बीजेपी को 23.25 प्रतिशत का लाभ हुआ है, मतलब- अब बीजेपी (40.25 प्रतिशत) और टीएमसी (43.28 प्रतिशत) के वोटों में ज्यादा फर्क नहीं बचा है.विधानसभा के नजरिए से तो यह बदलाव टीएमसी के लिए खतरे की घंटी है. लोकसभा चुनाव 2014 के सापेक्ष 2019 के नतीजों को विधानसभा सीटों के आधार पर देखें तो जहां पहले टीएमसी को 214 सीटें मिल रही थीं, अब 164 सीटें ही मिल रही हैं, जबकि बीजेपी को पहले केवल 24 सीटें मिल रही थी, वहीं अब 121 सीटें मिलने की संभावना है, अर्थात- यदि बीजेपी अपनी बढ़त बनाए रखने में कामयाब होती है तो प्रदेश की सत्ता पर कब्जा जमा सकती है.बहरहाल, पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहा है, ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि अगले विधानसभा चुनाव में सियासी ऊँट किस करवट बैठेगा?

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