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बोले तेजस्वी- SC/ST के साथ बीजेपी ने किया विश्वासघात, वर्ण व्यवस्था करना चाहती कायम 

By एस पी सिन्हा | Updated: September 12, 2018 19:52 IST

राजद को मालूम है कि मंडल की राजनीति के उत्तरार्ध वाला नीतीश काल वोट बैंक के मामले में लालू युग के समीकरण को ध्वस्त कर चुका है। तेजस्वी काल का राजद 17 फीसदी अनुसूचित जातियों के वोट बैंक के प्रति खुद ही आश्वस्त नहीं है। दूसरी ओर 15 प्रतिशत यादव राजद का कोर वोट बैंक हैं। 

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पटना, 12 सितंबरःबिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने पटना में पार्टी की एक बैठक के बाद कहा है कि भाजपा ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ विश्वासघात किया है। उनके अनुसार केंद्र की एनडीए सरकार चाहती तो इसे नौंवी अनुसूची में रख सकती थी जिससे इस पर भविष्य में कोई विवाद न हो। 

तेजस्वी के अनुसार भाजपा संविधान को खत्म कर एक बार फिर वर्ण व्यवस्था कायम करना चाहती है। दरअसल, जैसे ही लगा कि अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न विधेयक पर भाजपा को कटघरे में खड़ा कर राजनीतिक फायदा उठाने की रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है, सामाजिक न्याय का दंभ भरने वाली पार्टियां सकते में आ गईं। खासकर राजद जैसी पार्टी जिसका राजनीतिक वजूद ही एमवाय (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर टिका हुआ है। 

राजद को मालूम है कि मंडल की राजनीति के उत्तरार्ध वाला नीतीश काल वोट बैंक के मामले में लालू युग के समीकरण को ध्वस्त कर चुका है। तेजस्वी काल का राजद 17 फीसदी अनुसूचित जातियों के वोट बैंक के प्रति खुद ही आश्वस्त नहीं है। दूसरी ओर 15 प्रतिशत यादव राजद का कोर वोट बैंक हैं। 

नब्बे के दशक में लालू यादव ने हाशिए पर खड़ी जमात में जागरूकता की जो क्रांति पैदा की उससे अनुसूचित जातियों से ज्यादा सशक्तिकरण यादवों का हुआ। ऐसा हुआ कि ये 2018 तक राजद के साथ हैं। 2014 को मोदी लहर का विलगाव काल मान सकते हैं। ये 2019 में भी प्रधानमंत्री चुनने के लिए कमल दबाएं और मुख्यमंत्री के लिए लालटेन थाम लें तो कोई आश्चर्य नहीं।

ऐसे में बिहार की राजनीति में तेजस्वी के द्वारा जातीयता की दीवार ध्वस्त किया जाना दिखाई नही देता है। सर्वजन के मुद्दे उठाते हुए जातीय कोर वोट बैंक को साधना मजबूरी है। एससी-एसटी एक्ट पर 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से लेकर अब तक जारी राजनीतिक समर में पहली बार तेजस्वी यादव ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार 'दलितों और पिछड़ा वर्ग को लड़ाना चाहती है'। 

तेजस्वी को शायद आभास हुआ होगा कि एससी-एसटी एक्ट के बेजा इस्तेमाल की जब बात होती है तो इसकी गैर जमानती धारा सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं, बल्कि अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) में शामिल जातियों पर भी लागू होती है और यादव इसमें शामिल हैं। साफतौर पर तेजस्वी 2019 के चुनाव से पहले ये रिस्क नहीं ही लेना चाहेंगे कि द्वारका के यदुवंशियों की बात करने वाला देश का नेता एक बार फिर उनके कोर वोट बैंक में सेंध लगा जाए। 

उनकी कोशिश होगी कि एससी-एसटी एक्ट पर आरजेडी से ज्यादा जीतनराम मांझी बोलें। तेजस्वी के लिए एससी-एसटी एक्ट से ज्यादा कारगर हथियार है, आरक्षण पर अपने पिता की रणनीति पर टिके रहना। उन्होंने इसका आभास भी करा दिया। 

तेजस्वी ने आरएसएस और भाजपा को आरक्षणविरोधी बताया और इसे खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाया। ये जुमला 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू आजमा चुके हैं और फल पा चुके हैं। इसलिए आने वाले समय में एससी-एसटी एक्ट पर तेजस्वी कम बोलें और आरक्षण के रटे-रटाए राग को अलापें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कम से कम वो जय सवर्ण-जय ओबीसी के नारे को दोबारा सुनना पसंद नहीं करेंगे। ऐसे में राजद के इस स्टैंड के बाद निश्चित रूप से दलित समुदाय और दलित नेता राहत की सांस ले रहे होंगे। 

पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने राजद से अपना नजरिया साफ करने की अपील की थी। तेजस्वी यादव ने अपने संवाददाता सम्मेलन में कई बार दोहराया कि हम लोग और मजबूती से एससी-एसटी एक्ट के साथ खडा रहेंगे और उनके अधिकार की लडाई में साथ रहेंगे। इस कथन से साफ है कि फिलहाल पार्टी अगडी जातियों की सहानुभूति के चक्कर में दलित वोटों को खोना नहीं चाहती।

टॅग्स :तेजस्वी यादवएससी-एसटी एक्टआरजेडीबिहारभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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