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World Press Freedom Day: हर साल 3 मई को क्यों मनाया जाता है वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे, जानें इसका इतिहास

By स्वाति सिंह | Updated: May 2, 2020 12:49 IST

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन होता है। साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान देने वाली शख्सियतों को सम्मानित किया जाता है। वहीं, स्कूल, कॉलेज, सरकारी संस्थानों और अन्य शैक्षिक संस्थानों में प्रेस की आजादी पर वाद-विवाद, निबंध लेखन प्रतियोगिता और क्विज का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर यूनेस्को की ओर से भी पुरस्कार दिए जाते हैं।

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ठळक मुद्देहर साल 3 मई दुनिया भर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने पहली बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया।

हर साल 3 मई दुनिया भर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) मनाया जाता है। यूनेस्को महासम्मेलन की अनुशंसा के बाद दिसंबर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा की थी। तब से लेकर अब तक हर साल 3 मई को इसकी थीम अलग होती है। वहीं, हर साल अलग-अलग देश को मेजबानी मिलती है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने का मुख्य मकसद दुनिया भर की सरकारों को यह याद दिलाना होता है कि अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की रक्षा और सम्मान करना प्रेस का कर्तव्य है। मालूम हो कि लोकतंत्र के मूल्यों की सुरक्षा और उनको बहाल करने में मीडिया अहम भूमिका निभाता है। इसलिए सरकारों को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

1993 में पहली बार मनाया गया था World Press Freedom Day

बता दें कि 1991 में अफ्रीका के पत्रकारों ने प्रेस की आजादी के लिए एक पहल की थी। सबसे पहले 3 मई को उन्होंने प्रेस की आजादी के सिद्धांतों को लेकर एक बयान जारी किया था। इसे डिक्लेरेशन ऑफ विंडहोक (Declaration of Windhoek) के नाम से जाना जाता है। उसके बाद उसकी दूसरी जयंती पर 1993 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने पहली बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया। तब से हर साल 3 मई को यह दिन मनाया जाता है।

World Press Freedom Day क्यों मनाया जाता है?

कई देशों से पत्रकारों और मीडिया पर अत्याचार की खबर सामने आती है। मीडिया संगठन या पत्रकार अगर सरकार की मर्जी से नहीं चलते हैं तो उनको तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। साथ ही मीडिया संगठनों को बंद करने तक के लिए भी मजबूर किया जाता है। संपादकों, प्रकाशकों और पत्रकारों को डराया-धमकाया जाता है। इन चीजों को ध्यान में रखते हुए दुनिया भर में प्रेस की आजादी का दिन मनाया जाता है। इस मौके पर बताया जाता है कि कैसे प्रेस की आजादी को छीना जा रहा है। साथ ही सरकारों को भी जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित किया जाता है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन होता है। साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान देने वाली शख्सियतों को सम्मानित किया जाता है। वहीं, स्कूल, कॉलेज, सरकारी संस्थानों और अन्य शैक्षिक संस्थानों में प्रेस की आजादी पर वाद-विवाद, निबंध लेखन प्रतियोगिता और क्विज का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर यूनेस्को की ओर से भी पुरस्कार दिए जाते हैं।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस 2019

प्रेस की आजादी के मामले में पिछले तीन सालों भारत की रैकिंग गिरती जा रही है। पिछले दो सालों में ही भारत में 15 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2019 यानी ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2019’ में भारत 140वें स्थान पर था।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, साल 1990 से अब तक भारत में 80 पत्रकारों की हत्या के मामले सामने आए। लेकिन सिर्फ एक मामला ही अदालती कार्रवाई के स्तर तक पहुंच सका। वहीं, साल 2019 में जनवरी महीने में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में पंचकूला में सीबीआई की अदालत ने दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। कुछ मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई है। वहीं कुछ मामलों में आज तक किसी को कसूरवार तक नहीं ठहराया गया है।

पत्रकारों के हत्यारों को सजा दिलाने में भारत काफी पीछे

पत्रकारों के हत्यारों को सजा दिलाने के मामले में भारत काफी पीछे है। अमेरिका की एक गैर-लाभकारी संस्था 'कमिटी टु प्रॉटेक्ट जर्नलिस्ट' (CPJ) की एक वैश्विक सूची में यह जानकारी सामने आई है। 

इस लिस्ट में उन देशों को शामिल किया गया है जहां पत्रकारों की हत्या की गई और मामलों की जांच अब भी लटकी हुई है। भारत को इस सूची में 14वें स्थान पर रखा गया है। चिंता की बात है कि यह लगातार 11वां साल है जब भारत को इस सूची में रखा गया है। 

पत्रकारों की सुरक्षा पर निगरानी रखने वाली सीपीजे के अनुसार भारत में भ्रष्टाचार कवर करने वाले पत्रकारों की जान को खतरा हो सकता है।

2016 में आई सीपीजे की 42 पन्नों की इस विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पाती है। इसमें कहा गया, "1992 के बाद से भारत में 27 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जब पत्रकारों का उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया। लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी है"। रिपोर्ट के अनुसार इन 27 में 50% से ज़्यादा पत्रकार भ्रष्टाचार संबंधी मामलों पर खबरें करते थे।

भारतीय पत्रकारों के लिए बेहद खराब रहा 2017-18

साल 2017 पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में बेहद ही खराब साबित हुआ है। वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश और शांतनु भौमिक सहित नौ पत्रकारों को इस साल अपनी जान गंवानी पड़ी है।

2018 में भारत में कई पत्रकारों की हत्या हुई जिसमें 'राइजिंग कश्मीर' अखबार के संपादक शुजात बुखारी का नाम शामिल है। जून 2018 में जब बुखारी अपने श्रीनगर स्थित दफ्तर से निकले तो उन पर अज्ञात लोगों ने हमला किया था।

 

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