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मैदान में उतरे बिहार के 50 बड़े नेता?, इन जिलों में करेंगे कैंप?, विधानसभा चुनाव 2025 में 'शानदार' प्रदर्शन करने वाली भाजपा पश्चिम बंगाल में 'चौंकाने' की तैयारी में जुटी?

By एस पी सिन्हा | Updated: March 18, 2026 15:04 IST

कोलकाता में ही हावड़ा, खिदिरपुर, बडाबाजार, अलीपुर, कचरापारा, नैहाटी, दमदम में गैर-बंगालियों की संख्या काफी ज्यादा है।

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ठळक मुद्देनेता-कार्यकर्ता पहले से ही वहां जीत सुनिश्चित करने के लिए डेरा डाले हुए हैं।पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी से अधिक गैर बंगाली बसे हुए हुए हैं।भाजपा ने बिहार एवं यूपी के नेताओं को रवाना कर दिया है।

पटनाः बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में 'शानदार' प्रदर्शन करने वाली भाजपा अब पश्चिम बंगाल में 'चौंकाने' की तैयारी में जुटी है। पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में बंपर जीत की तैयारी में जुटी भाजपा ने बिहार के अनुभवी नेताओं को चुनाव की जिम्मेवारी सौंपते हुए वहां कैंप करने के लिए रवाना कर दिया है। हालांकि विधानसभा चुनाव का ऐलान होने के पहले से ही बिहार के स्वास्थ्य मंत्री एवं पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रभारी मंगल पांडेय लगातार वहां डेरा डाले हुए हैं। उनके अलावे जमीनी स्तर के कई नेता-कार्यकर्ता पहले से ही वहां जीत सुनिश्चित करने के लिए डेरा डाले हुए हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की बिगुल बजते ही बिहार के अधिकतर विधायक एवं मंत्री वहां कूच करने की तैयारी में जुट गए हैं। सूत्रों के अनुसार अभी तक 50 से अधिक नेताओं को पश्चिम बंगाल भेजा जा चुका है। इन्हें उन इलाकों में कैंप करने का निर्देश दिया गया है, जहां हिंदी भाषी लोगों की संख्या ज्यादा है। जानकारों की मानें तो पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी से अधिक गैर बंगाली बसे हुए हुए हैं।

सबसे मजेदर बात तो यह है कि जिस विधानसभा क्षेत्र भवानीपुर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ने जा रही हैं, उस इलाके में सिख और हिंदी भाषियों की संख्या बहुतायत है। जानकारों के अनुसार पश्चिम बंगाल में हिंदी भाषी सहित अन्य गैर-बंगाली समुदायों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है, जो मुख्य रूप से कोलकाता, दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी, खड़गपुर, और दुर्गापुर-आसनसोल जैसे औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं। राज्य की लगभग 40 फीसदी आबादी गैर-बंगाली है। प्रमुख गैर-बंगाली भाषियों में हिंदी, संथाली, उर्दू और नेपाली शामिल हैं।

बताया जाता है कि राजधानी कोलकाता में हिंदी भाषी और अन्य समुदायों की बड़ी आबादी रहती है। जबकि दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में 60 फीसदी से अधिक नेपाली भाषी हैं। उसी तरह उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद आदि जिलों में उर्दू भाषियों की अधिकता है। उधर, पुरुलिया, बीरभूम, बांकुरा जिलों संथाली और आदिवासी समुदायों की संख्या अधिक है।

वहीं, आसनसोल, खड़गपुर आदि औद्योगिक क्षेत्रों में हिंदी भाषी और मारवाड़ी समुदाय बडे पैमाने पर रहते हैं। इसके साथ ही आसनसोल, वर्धमान, ब्रम्हपुर सहित कई जिलों में बिहार और यूपी के रहने वालों की संख्या बहुतायत है। कोलकाता में ही हावड़ा, खिदिरपुर, बडाबाजार, अलीपुर, कचरापारा, नैहाटी, दमदम में गैर-बंगालियों की संख्या काफी ज्यादा है।

बडा बाजार के बारे में बताया जाता है कि यहां हिंदी भाषी चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। इस तरह 23 में से अधिकांश जिलों में, विशेषकर शहरी और औद्योगिक बेल्ट में, मिश्रित गैर-बंगाली आबादी निवास करती है। ऐसे में इन्हें अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा ने बिहार एवं यूपी के नेताओं को रवाना कर दिया है।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक डॉ. मिथिलेश कुमार को पश्चिम बंगाल में चुनाव की  जिम्मेदारी दी गई है। वे वहां प्रवास कर विभिन्न जिलों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे और बूथ स्तर तक संगठन को सशक्त बनाने पर काम करने में जुटे हैं।

डॉ. मिथिलेश कुमार ने बताया कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनावी कार्य में जुट कर बूथ स्तर के पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं से गहन मंथन करने में जुट गए हैं। सियासत के जानकारों का मानना है कि बिहार समेत अन्य राज्यों के नेताओं को पश्चिम बंगाल में सक्रिय करना भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिससे संगठनात्मक अनुभव और चुनावी प्रबंधन का लाभ पार्टी को मिल सके।

बता दें कि 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के पास भारी बहुमत है, जबकि भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व स्तर पर भी चुनावी रणनीति पर लगातार मंथन किया जा रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लगातार पश्चिम बंगाल की गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर नितिन नबीन समेत कई वरिष्ठ नेताओं को चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रदेश संगठन में भी नए चेहरों को शामिल कर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की जा रही है।

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