Bihar: बिहार सरकार ने बंद चीनी मिलों को चलाने के साथ ही नई चीनी मिलों की स्थापना करने का निर्णय लिया है। इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति लगातार कार्य कर रही है। इसमें मुख्य रूप से चनपटिया, बारा चकिया, मोतिहारी, सासामूसा, मढ़ौरा, मोतीपुर, समस्तीपुर, सकरी और रैयाम मिलें शामिल हैं। इसके साथ ही, 25 नए चीनी मिलें लगाने की भी तैयारी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बंद पड़ी चीनी मिलों को चरणबद्ध तरीके से शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इसमें गोपालगंज की सासामूसा चीनी मिल को प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जा रहा है।
बताया जाता है कि बिहार में 25 नए चीनी मिलें लगाने के लिए जिलाधिकारियों को भूमि तलाशने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही 66 हजार एकड़ जलजमाव वाली जमीन को मुक्त कराकर गन्ने की खेती के लिए तैयार किया जा रहा है। गन्ना किसानों को बेहतर बाज़ार देना, स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा करना और राज्य के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना। यह निर्णय बिहार के गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी सौगात है, जिससे वर्षों से बंद पड़ी मिलों के कारण हो रही परेशानी दूर होगी। विधानसभा में एनडीए के घोषणा पत्र में 25 संकल्प लिया गया था। अब उसको जमीन पर उतारने की कवायद भी शुरू हो गई है।
बता दें कि बिहार में बिट्रिश काल में चीनी मिलें खूब फली-फूली। चीनी मिल बिहार में लगाने के पीछे बड़ा कारण गन्ना उत्पादन के लिए गंगेटिक इलाके में उपयुक्त जमीन होना था, जिसे बिट्रिश शासन ने पहचाना। बिहार में एक समय नील की खेती बहुत होती थी लेकिन उसके खिलाफ विरोध शुरू हो गया और ब्रिटिश को नील की खेती की जगह गन्ना की खेती के लिये मंजूरी देनी पड़ी।
जानकारों के अनुसार बिहार में चीनी मिल शुरू होने की भी कहानी है। उत्तर बिहार के बड़े इलाके में 1972 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक प्रतिनिधिमंडल भेज कर रिपोर्ट तैयार करवाया था। लुटियन जेपी टशन ने अपनी रिपोर्ट में बिहार की जमीन गन्ना उत्पादन के लिए उपयुक्त बताया था। गन्ना का उत्पादन होने से ब्रिटिश को दो फायदे हुए चीनी मिल की स्थापना के बाद एक तो बिहार से चीनी का विदेश निर्यात होने लगा और नील की खेती का जो विरोध हो रहा था, वह भी समाप्त हो गया।
1947 तक बिहार में 33 चीनी मिलें थीं, जो देश के कुल उत्पादन का 40 फीसदी योगदान देती थीं। प्रमुख मिलें 1914-1930 के बीच स्थापित हुईं। आज बिहार चीनी उत्पादन में देश का 5 फीसदी से भी कम योगदान देता है। अभी गन्ना के कुल उत्पादन के 70 फीसदी चीनी मिलों को बेचा जाता है। 20 फीसदी एथेनॉल फैक्ट्री में उपयोग होता है। 10 फीसदी गन्ना गुड और अन्य उत्पादों में खपत होता है। देश में 2024-25 में 250 लाख टन के करीब चीनी का उत्पादन हुआ है। उत्तर प्रदेश 87.50 लाख टन, महाराष्ट्र 80.06 लाख टन, कर्नाटक 39.5 लाख टन और बिहार का उत्पादन 7 लाख टन के आसपास है। बिहार में 9 चीनी मील अभी काम कर रही हैं, जो चंपारण, गोपालगंज और समस्तीपुर इलाके में हैं। बिहार सरकार के नए फैसले से जिसे चीनी क्षेत्र में नहीं उम्मीद जगी है।
बिहार के गन्ना उद्योग मंत्री संजय कुमार ने कहा कि नीतीश सरकार ने पहली कैबिनेट में चीनी मिल खोलने और पुरानी चीनी मिल को फिर से शुरू करने का फैसला लिया है। उसको लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है। उन्होंने कहा कि कमेटी की रिपोर्ट मिलने के बाद हम लोग उसपर तेजी से काम करेंगे। हम लोगों का संकल्प ही है कि बिहार में एक करोड़ नौकरी रोजगार देने का। चीनी मिल उसमें बड़ी भूमिका निभाएगी। बिहार जो एक समय चीनी मिल और चीनी उत्पादन के लिए पूरे देश में सबसे आगे था, एक बार फिर से हम लोग इसे प्रमुख स्थान दिलाएंगे।
वहीं, बीआईए के पूर्व अध्यक्ष केपीएस केसरी का कहना है कि बिहार में गन्ना उत्पादन के लिए उपयुक्त जमीन होना और केन्या से चीनी मिल की मशीन ब्रिटिश शासन में लाई गई थी। इसके कारण आसानी से कई चीनी मिल की स्थापना हुई। लेकिन बाद में बिहार की चीनी मिल बंद होने लगे। आज तो 5 फीसदी के आसपास ही बिहार का देश के चीनी उत्पादन में योगदान है, लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं है। यदि सरकार ने फैसला लिया है तो पुरानी चीनी मिलों को खोला जा सकता है। उन्होंने कहा कि कई पुरानी चीनी मिलों का जमीन बियाडा को दे दिया गया है और उनकी मशीन भी पुरानी हो चुकी है। अब नई मशीन लगानी पड़ेगी और जहां तक नई चीनी मिलों की बात है तो उसे लगाया जा सकता है। अब चीनी मिल सिर्फ चीनी का उत्पादन नहीं करती है, बल्कि ऊर्जा और अल्कोहल जैसे प्रोडक्ट का भी उत्पादन होता है जिसकी बहुत मांग है।
वहीं, विभाग के अपर मुख्य सचिव के सेंथिल कुमार ने कहा कि पहले बिहार में रिकार्ड चीनी का उत्पादन होता था, लेकिन धीरे धीरे कम हो गया। बिहार के उस गौरव को वापस लाने के लिए सबका सहयोग आवश्यक है। बिहार में बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का स्पष्ट आदेश है कि बंद मिलों को खोलना है और नई मिले लगानी है। इसमें सभी को मिलकर टीम भावना से कार्य करना होगा तभी हम लोग लक्ष्य हासिल करेंगे। इसलिए गन्ना की खेती को विस्तार करना है, ताकि चीनी मिलों को भरपूर गन्ना मिल सके। किसानों की समस्याओं को सुनने के बाद अपर मुख्य सचिव ने कहा कि जो किसान पात्र होंगे उन्हें योजनाओं का लाभ मिलेगा। वहीं, ईख आयुक्त अनिल कुमार झा ने कहा कि किसान अपनी क्षमता को पहचाने और नई ऊर्जा के साथ बेहतर कार्य करें, ताकि राज्य सरकार के मंशा के अनुरूप कार्य हो सके। चीनी उत्पादन के क्षेत्र में बिहार को देश के अग्रणी राज्यों में ले जाना है। इसके लिए सभी को प्रयास करना पड़ेगा। उन्होंने राज्य सरकार के सभी योजनाओं को घरातल पर उतारने की अपील की
बिहार में जिन बंद चीनी मिलों को फिर से चालू करने की योजना है उसमें से ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन की बंद चीनी मिलें भी हैं। पूर्वी चंपारण चकिया के बारा कावनपुर शुगर मिल को खोलना है, जो 1994-95 में बंद हो गई थी। 1994-95 में बंद पश्चिम चंपारण के चनपटिया कावनपुर शुगर मिल और 1997- 98 में बंद सारण के मढ़ौरा के कावनपुर शुगर मिल को भी तत्काल खोला जाएगा। इसके साथ ही बिहार चीनी निगम की बंद मिलों को भी खोलने की योजना है, इसके तहत चार मिले हैं। 1993- 94 में बंद हुई दरभंगा रैयाम चीनी मिल, 1996- 97 में बंद दरभंगा सकरी चीनी मिल, 1996 -97 में बंद समस्तीपुर चीनी मिल और 1996 -97 में बंद हुई मुजफ्फरपुर मोतीपुर चीनी मिल को भी फिर से सरकार चालू करेगी। इसके साथ ही निजी क्षेत्र की दो चीनी मिलों को भी चालू किया जाएगा। 2013-14 में बंद श्री हनुमान शुगर मिल और 2021-22 में बंद हुई सासामुसा शुगर मिल को भी पुनर्जीवित किया जाएगा।