Most Dangerous Rivers: विलुप्त होने के कगार पर 32 नदियां, गंभीर संकट में 60 नदी?, खड़ी सौरा, दुहवा, सिर्मनिया, किऊल, हरोहर, बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर और चंद्रभागा बेहाल

By एस पी सिन्हा | Updated: January 1, 2026 16:13 IST2026-01-01T16:12:11+5:302026-01-01T16:13:08+5:30

Most Dangerous Rivers: विलुप्त होने के कगार पर खड़ी सौरा, दुहवा, सिर्मनिया, किऊल, हरोहर, बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर और चंद्रभागा जैसी नदियां सूख चुकी हैं या नाले में तब्दील हो गई हैं।

Most Dangerous Rivers 32 verge extinction 60 rivers serious danger Khadi Saura, Duhwa, Sirmania, Kiul, Harohar, Badua, Chandan, Odhani, Chir Chandrabhaga bad shape | Most Dangerous Rivers: विलुप्त होने के कगार पर 32 नदियां, गंभीर संकट में 60 नदी?, खड़ी सौरा, दुहवा, सिर्मनिया, किऊल, हरोहर, बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर और चंद्रभागा बेहाल

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Highlightsगाद जमाव, गिरता भूजल स्तर और नदी तल पर अवैध कब्जे इसके मुख्य कारण हैं।नदी सूखने के मुख्य कारण मिट्टी कटाव और भूमि अधिग्रहण है। अतिक्रमण कर जमीन बेच रहे है और बढ़ती आबादी नदियों के कगार तक आ कर बस गई।

पटनाः बिहार में नदियां लगातार अपना अस्तित्व खो रही हैं। हाल यह है कि राज्य की पांच दर्जन से अधिक नदियों का अस्तित्व गंभीर खतरे में है। जीवनदायिनी कही जाने वाली ये नदियां अब विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। लगभग 32 पूरी तरह विलुप्त होने के कगार पर हैं। दरअसल, अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण, समुचित प्रबंधन के अभाव और सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण कई नदियां अंतिम सांसें ले रही हैं। विलुप्त होने के कगार पर खड़ी सौरा, दुहवा, सिर्मनिया, किऊल, हरोहर, बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर और चंद्रभागा जैसी नदियां सूख चुकी हैं या नाले में तब्दील हो गई हैं।

जानकारों गाद जमाव, गिरता भूजल स्तर और नदी तल पर अवैध कब्जे इसके मुख्य कारण हैं। इसके साथ ही नदी सूखने के मुख्य कारण मिट्टी कटाव और भूमि अधिग्रहण है। बड़े बड़े भूमि कारोबारी नदी के आसपास अतिक्रमण कर जमीन बेच रहे है और बढ़ती आबादी नदियों के कगार तक आ कर बस गई।

आज हर जगह घर, मार्कट कॉम्पलेक्स बन रहे है जिनके आगे नदियों का सरंक्षण जरूरी मुद्दा नहीं रह जाता। इनमें मिट्टी की खपत भी बड़े मात्रा में होती है सभी जगह मिट्टी नदियों से ही ली जाती है। नदियों के सूखने से स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी पर भी फर्क पड़ रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी उन गांवों के लिए है जो नदी के आसपास बसे हैं।

ग्रामीण नदी से ही सिंचाई का काम करते हैं। ऐसे में इस सुखाड़ के किसानों के लिए कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। वहीं, मछुआरे तो यहां से पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। उनकी रोजी रोटी का जरिया मछलियां ही होती हैं। कुछ नदियां जो अपने वजूद के लिए लड़ रही है,या यूं कह लीजये की छोटी धारा के रूप में आज उसका अस्तित्व मात्र बचा है।

लेकिन कुछ का अस्तित्व मात्र भी अब शेष नहीं गया है। बिहार में विलुप्त होती नदियों में लखीसराय जिले में स्थित किऊल और हरोहर नदी अतिक्रमण की चपेट में हैं और इनका अस्तित्व खतरे में है। जबकि कटिहार जिले में सौरा नदी कोसी धारा में गाद जमा होने के कारण लगभग विलुप्त हो गई है। उसी तरह जमुई जिले में दुहवा और सिर्मनिया नदी अपना अस्तित्व खो चुकी हैं और अब सिर्फ बरसात में पानी रहता है। वहीं, बांका जिले में बदुआ, चांदन, ओढ़नी, चीर नदी अंतिम सांसें ले रही हैं, जिससे सिंचाई पर असर पड़ा है।

उसी तरह बेगूसराय जिले की चंद्रभागा नदी पौराणिक नदी अब 14 किमी की लंबाई में सूख कर घर और व्यवसायिक स्थल बन गई है। नालंदा जिले में पंचाने नदी चांदी मऊ में 200 से अधिक कंक्रीट संरचनाओं ने नदी को नाले में बदल दिया है। जबकि मुजफ्फरपुर जमुआरी नदी चार दशक पहले जीवन रेखा थी, लेकिन अब सूख चुकी है।

जानकारों की मानें तो नदियों के विलुप्त होने के प्रमुख कारण में अतिक्रमण के चलते नदी के बहाव क्षेत्र में अवैध निर्माण और खेती। जबकि गाद का जमाव के कारण नदियों की गहराई कम होने से वे उथली और संकरी हो गई हैं। इसके साथ ही भूजल का अत्यधिक दोहन के कारण भूजल स्तर नीचे गिरने से नदियों का रिचार्ज स्रोत सूख गया है।

वहीं, जल स्रोतों की सफाई का अभाव के कारण गंदगी के कारण पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अधिकांश नदियां अब सिर्फ बरसात के मौसम में ही बहती नजर आती हैं। यह संकट बिहार के किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में नदियों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में बहने वाली एक दर्जन से अधिक नदियों के वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। सहरसा जिले में कोसी की सहायक नदियां तिलावे और सुरसर लगभग समाप्ति की ओर हैं। सिमरी बख्तियारपुर के धनुपुरा इलाके में कमला बलान, सिमरटोका नदी, दह कोसी उपधारा और आगर नदी पूरी तरह सूख चुकी हैं।

वहीं अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड से गुजरने वाली कारी कोसी नदी भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कटिहार जिले में कोसी धारा में अत्यधिक गाद जमा होने के कारण नदी लगभग विलुप्त हो चुकी है। कभी उन्मुक्त बहाव के लिए पहचानी जाने वाली सौरा नदी अब लगातार अतिक्रमण के चलते नाले का रूप लेती जा रही है।

जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड के सबलपुर जंगली क्षेत्र से बहने वाली दुहवा और सिर्मनिया नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। इन नदियों में पहाड़ों से लगभग पांच किलोमीटर तक पानी का बहाव होता था, लेकिन अब केवल बरसात के दिनों में ही इनमें पानी दिखाई देता है। स्थिति यह है कि कई नदियों के बहाव क्षेत्र में अब किसान खेती करने लगे हैं।

मानसून गुजरते ही नदी के बीच बड़े-बड़े मैदान बन जाते हैं, जो बच्चों के खेल मैदान या मेलों का स्थल बन जाते हैं। नदी सूखने के बाद अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है, जिससे इनके पुनर्जीवन की संभावनाएं भी कमजोर होती जा रही हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बिहार की कई नदियां केवल नाम मात्र की रह जाएंगी।

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