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MP हाईकोर्ट पीठ ने शाजापुर कलेक्टर को लगाई फटकार, हलफनामा देने का आदेश

By नईम क़ुरैशी | Updated: March 27, 2026 10:08 IST

Madhya Pradesh High Court News: लेकिन कलेक्टर ने केवल कारण बताओ नोटिस के आधार पर ही सजा सुना दी।

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Madhya Pradesh High Court News: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए उनके एक दंडात्मक आदेश को स्थगित कर दिया है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कलेक्टर को फटकार लगाते हुए 15 दिन के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि बिना किसी विस्तृत विभागीय जांच के एक कर्मचारी को इतनी बड़ी सजा कैसे दी जा सकती है।

यह मामला राजस्व विभाग में 30 वर्षों से कार्यरत सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी जयंत बघेरवाल से जुड़ा है, जिन्होंने अधिवक्ता यश नागर के माध्यम से कलेक्टर और संभागायुक्त के आदेशों को चुनौती दी थी।

पूरे विवाद की जड़ दिसंबर 2024 में शुरू हुई, जब एक ठेकेदार ने बघेरवाल के खिलाफ रिश्वत की शिकायत दर्ज कराई थी। दिलचस्प तथ्य यह है कि बघेरवाल ने ही पूर्व में उस ठेकेदार के विरुद्ध एफआईआर और वसूली की सिफारिश की थी। नियमों के अनुसार किसी कर्मचारी की वेतनवृद्धि रोकने जैसी बड़ी सजा के लिए नियम 14 के तहत आरोप-पत्र और पूर्ण विभागीय जांच अनिवार्य होती है, लेकिन कलेक्टर ने केवल कारण बताओ नोटिस के आधार पर ही सजा सुना दी।

जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में रिश्वत के आरोपों को सिद्ध नहीं पाया था, फिर भी कलेक्टर ने संचयी प्रभाव से दो वेतनवृद्धियां रोकने का आदेश जारी कर दिया। इसके अलावा, 30 साल की सेवा के बावजूद बघेरवाल को उनके हक के तृतीय समयमान वेतन लाभ से भी वंचित रखा गया, जबकि उनके जूनियर कर्मचारियों को इसका लाभ दे दिया गया।

कुछ भी आदेश पारित कर देती हैं शाजापुर कलेक्टर

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पिल्लई ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे शाजापुर कलेक्टर कानून की परवाह किए बिना कुछ भी आदेश पारित कर रही हैं। कोर्ट ने उल्लेख किया कि इससे पहले 16 मार्च 2026 को भी आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही के मामले में कलेक्टर को इसी तरह की कानूनी चूक के लिए फटकार लग चुकी है। हाई कोर्ट ने अब कलेक्टर और संभागायुक्त के पिछले आदेशों पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया है कि क्षेत्राधिकार का उल्लंघन और बिना विवेक का इस्तेमाल किए दंड देना न्यायसंगत नहीं है। इस कार्यवाही ने प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर विभागीय जांच की अनिवार्य प्रक्रियाओं और निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी है।

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