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हुर्रियत कांफ्रेंस की भी अजब कहानी, चुनाव बहिष्कार के मुद्दे पर ही हैं बंटे हुए 

By सुरेश डुग्गर | Updated: March 26, 2019 06:00 IST

बहिष्कार करने और नहीं करने के विचारों पर हुर्रियत के दोनों गुटों में भी एका नहीं है जिसके लिए दोनों गुटों की अलग-अलग बैठकें तो हुई लेकिन नतीजा शून्य ही निकला।

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चुनाव बहिष्कार के मुद्दे ने कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को बांट कर रख दिया है। इस मुद्दे पर ये नेता तीन हिस्सों में बंटे हुए हैं। एक पक्ष का मानना है कि चुनाव बहिष्कार की घोषणा को वापस लेकर केंद्र के साथ बातचीत आरंभ की जाए तो एक पक्ष चुनाव बहिष्कार का आह्वान करने के लिए सड़कों पर उतरना चाहता है। जबकि तीसरा पक्ष चाहता है कि चुनाव बहिष्कार की राजनीति सिर्फ बंद कमरों से चलाई जाए क्योंकि अगर वे सड़कों पर उतरते हैं तो सुरक्षाबल उन्हें पकड़ कर जेलों मे ठूंस देंगें। वैसे ही 100 के करीब अलगाववादी नेता जेलों में हैं।

मजेदार बात है कि बहिष्कार करने और नहीं करने के विचारों पर हुर्रियत के दोनों गुटों में भी एका नहीं है जिसके लिए दोनों गुटों की अलग-अलग बैठकें तो हुई लेकिन नतीजा शून्य ही निकला। वैसे एक रोचक तथ्य यह है कि अलगाववादी नेताओं का एक धड़ा चुनाव बहिष्कार के कार्यक्रम के लिए इस नीति को न अपनाने के पक्ष में है। इस धड़े के मुताबिक, जो बंद कमरों से ही चुनाव बहिष्कार की राजनीति का संचालन करने का इच्छुक है, जुलूसों और प्रदर्शनों के पथ पर चलना अत्याचारों को बुलावा देना होगा।

यह धड़ा कहता है कि पहले से ही कई अलगाववादी नेता विभिन्न मामलों में जेलों के भीतर हैं। और राज्य सरकार भी इस अवसर की तलाश में रहती है कि बाकी को भी विभिन्न मामलों में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जाए। ‘और अगर हम इस कदम को उठाते हैं तो सरकार के लिए यह सुनहरी अवसर होगा और वे लोगों पर भी अत्याचार ढहाएंगें,’ एक उस अलगाववादी नेता का मत था जो बंद कमरों से ही बहिष्कार का आह्वान करने का पक्षधर था।

बहिष्कार की घोषणा को वापस लेने की बात सार्वजनिक तौर पर तो नहीं की गई है लेकिन इसे सांकेतिक रूप से अवश्य कहा गया हैै।  हुर्रियत कांफ्रेंस के मीरवायज के गुट के एक नेता ने बहिष्कार के मुद्दे पर तो कुछ भी नहीं बोला परंतु उसने केंद्र सरकार के साथ कश्मीर समस्या के हल की खातिर बिना शर्त बातचीत करने की वकालत की थी। वैसे उन्होंने चुनाव बहिष्कार के प्रति अपने रोष को भी दर्ज करवाते हुए यह संकेत दिया था कि वे इसके खिलाफ हैं जबकि उन्होंने इतना भी कह डाला था कि अगर केंद्र सरकार के साथ बातचीत का परिणाम चुनाव होंगे तो उन्हें वे भी मंजूर होंगें।

नतीजतन एक धड़ा इन्हीं विचारों का पक्षधर है जो यह चाहता है कि चुनाव बहिष्कार न कर केंद्र से बातचीत की गाड़ी को आगे बढ़ाया जाए क्योंकि वे जानते हैं कि अगर समय हाथ से निकल गया तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा।

लेकिन हुर्रियत कांफ्रेंस गिलानी गुट के अध्यक्ष सईद अली शाह गिलानी मीरवायज मौलवी उमर फारूक के गुट के इन विचारों से सहमत नहीं हैं जो पहले से ही चुनाव बहिष्कार का प्रस्ताव पारित कर चुके हैं और अब चाहते हैं कि लोगों से चुनाव बहिष्कार का आह्वान करने की खातिर सड़कों पर निकला जाए अर्थात इसके प्रति लोगों को जागृत करने की खातिर वे जनसभाओं, जुलूसों व प्रदर्शनों का आयोजन करना चाहते हैं।

टॅग्स :लोकसभा चुनावजम्मू कश्मीर
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