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अगर महागठबंधन ने मोदी के सामने उतारी ये दलित महिला पीएम कैंडिडेट तो 2019 में बीजेपी के लिए होगी मुश्किल!

By खबरीलाल जनार्दन | Updated: July 9, 2018 13:23 IST

पिछले सप्ताह दो लोगों को संयुक्त विपक्ष का पीएम कैंडिडेट घोषित करने की मांगें उठीं।

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नई दिल्ली, 9 जुलाईः लोकसभा चुनाव 2019 में संयुक्त विपक्ष अथवा महागठबंधन का प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन होगा? इस पर महागठबंधन ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक नजर गड़ाए हैं। हाल ही में पीएम मोदी ने कहा कि बहुत से ऐसे लोग जो प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं वे एकजुट होकर मोदी के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। जबकि अमित शाह कहते हैं कि संयुक्त विपक्ष राहुल गांधी को अपना पीएम कैंडिडेट नहीं मानता। दूसरी ओर कांग्रेस 224 सीटों वाले कर्नाटक में 37 सीट जीतने वाली जनता दल सेक्यूलर के मुखिया एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाकर यह संदेश दे चुकी है कि वह बीजेपी को रोकने के लिए कुछ भी कर सकती है।

ऐसे में 2019 में संयुक्त विपक्ष का पीएम कैंडिडेट को लेकर सबकी उत्सुकता बढ़ी हुई है। लेकिन पिछले सप्ताह पीएम कैंडिडेट को लेकर दो मांगे उठी हैं। पहली, हरियाणा बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारती ने उठाई। उन्होंने कहा पार्टी सुप्रीमो मायावती ही देश की अगली प्रधानमंत्री होंगी।

यह मांग यूं ही नहीं उठाई गई है। असल में बीते लोकसभा चुनाव में 1 सीट भी ना जीत पाने वाली बीएसपी अपने नेता मायावती की तेज-तर्रार राजनीति की वजह से अचानक बेहद मजबूती से उभर गई है। इसकी नींव उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर और केशव प्रसाद मौर्या की फूलपुर सीट के उपचुनावों के दौरान पड़ी जब 25 साल की कट्टर दुश्मनी भूलकर उन्होंने समाजवादी पार्टी को समर्थन दे दिया। समर्थन के बाद मिली जीत से पार्टी को नई ऊर्जा मिल गई। अखिलेश यादव इस तरह के बयान देने लगे कि 2019 के लोकसभा चुनावों में अगर बीएसपी के लिए उन्हें कुछ सीटों की कुर्बानी देनी पड़ी तो वे तैयार हैं।

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इतना ही नहीं मायावती ने कर्नाटक में जेडीएस के साथ गठबंधन कर के फिर से एक सफल राजनीति उदाहरण पेश किया। क्योंकि कर्नाटक में बीएसपी महज एक सीट पर जीत दर्ज कर पाई और पर वह इकलौता विधायक मंत्री का दर्जा पाने में सफल रहा जबकि कई दिग्गज कांग्रेसी विधायक यह काम नहीं कर पाए। ऐसा कहा जाता है कि कर्नाटक में एक मंच पर सयुंक्त विपक्ष को जुटाने में मायावती का बड़ा हाथ है। क्योंकि‌ उन्होंने ने ही सोनिया गांधी को फोन कर के जेडीएस को समर्थन के लिए तैयार किया था।

लेकिन सब बातों के ऊपर एक बड़ा तथ्य यह है कि भारत को अब तक महज एक महिला पीएम मिली है, इंदिरा गांधी। उनके बाद अभी तक भारत में कोई महिला प्रधानमंत्री नहीं मिली। दूसरा तथ्य कि देश को एक दलित महिला पीएम अगर मिले तो यह महज भारत के लिए नहीं दुनिया के लिए नजीर होगी। क्योंकि भारत की पहली दलित महिला पीएम यह तथ्य ही अपने आप में बड़ा प्रभाव छोड़ता है। मायावती एक कुशल राजनेत्री हैं, उनको अभी भी दलित और पिछड़ा वर्ग का बिना शर्त समर्थन प्राप्त है। बहुत ध्यान से देखें तो संयुक्त विपक्ष के पास नेता के तौर पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव, एम करुणानिधि, तेजस्वी यादव, एचडी देवगौड़ा सरीखे चेहरे ही हैं। मायावती इन सब पर भारी हैं।

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अगर संयुक्त विपक्ष मायावती को आगे करता है तो याद करिए आखिरी राष्ट्रपति चुनाव। कैसे दोनों पा‌र्टियों में दलित उम्मीदवार खड़ा करने की होड़ लगी थी। ऐसे में अगर दूसरी पार्टियां अगर मायावती को समर्थन देती हैं तो दलित-पिछड़ा बनाम सवर्ण की साफ लड़ाई होगी। अगर आप भारत की जनसंख्या देखेंगे तो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 41%, अनुसूचित जाति (SC) 16.8% और अनुसूचित जनजाति (ST) 8.6% हैं। यानी करीब 66%। ऐसे में सवर्ण महज 34% फीसदी ही बचते हैं। लड़ाई में बीजेपी आधी लड़ाई तो यही हार जाती है। क्योंकि चार साल की लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी इस जनाधार को अपने पक्ष में नहीं ला सकी है। आप ध्यान से 2014 के बाद हुए तमाम राज्यों में बीजेपी की जीत को देखेंगे तो पाएंगे कि दूसरी पार्टियों को कई बार बीजेपी से ज्यादा वोट मिले लेकिन अमित शाह की चुनावी रणनीतियों के चलते बीजेपी को सीटें ज्यादा मिलीं। लेकिन लोकसभा चुनाव में यह कारगर नहीं होगा।

ऐसे में अगर बीजेपी के नरेंद्र मोदी के सम्मुख संयुक्त विपक्ष का समर्थन प्राप्त मायावती खड़ी हो गईं तो ‌2019 बीजेपी के लिए कठिन साबित होगा। बल्कि बीते कुछ चुनावों को देखते हुए ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यह करीब-करीब बीजेपी के लिए सबसे बड़ी बाधा बन सकती है।

पीएम कैंडिडेट को लेकर दूसरी मांग सपा के पूर्व प्रदेश महामंत्री और समाजवाद बचाओ मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. सीपी राय ने उठाई। उनका कहना है कि अखिलेश यादव को सपा की तरफ से मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर देना चाहिए। लेकिन यह मांग जज्बात में बह कर अधिक और तथ्यों के आधार पर कम मालूम पड़ती है। क्योंकि खुद अखिलेश अब इस पक्ष में नजर नहीं आते।

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