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लोकसभा चुनावः क्या BJP इस बार फिर कांग्रेस से छीन पाएगी ये सीट, उपचुनाव में देखना पड़ा था हार का मुंह

By रामदीप मिश्रा | Updated: January 28, 2019 16:44 IST

अगर बात राजस्थान की करें तो यहां सूबे की दो दिग्गज पार्टियां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस है। लेकिन, आज हम जिस सीट की बात करने जा रहे हैं वहां कांग्रेस का दबदबा रहा है।

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ठळक मुद्देअलवर लोकसभा सीट सामान्य है। यहां अभी कांग्रेस का कब्जा है।अलवर अरावली की पहाड़ियों से घिरा हुआ है और प्राकृतिक रूप से बहुत ही खूबसूरत है।अलवर लोकसभा सीट पर पहली बार 1951 में चुनाव हुआ था, जिसमें कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इस सीट पर बीजेपी अबतक केवल तीन बार जीत हासिल कर सकी है।

लोकसभा चुनाव-2019 के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है इसलिए पार्टियां अपनी तैयारी करने में जुट गई हैं। वह मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए रणनीति बनाने की कोशिश में हैं। अगर बात राजस्थान की करें तो यहां सूबे की दो दिग्गज पार्टियां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस है। लेकिन, आज हम जिस सीट की बात करने जा रहे हैं वहां कांग्रेस का दबदबा रहा है और बीजेपी हमेशा संघर्ष करती नजर आई है। कांग्रेस अपने इस गढ़ को बचाने के लिए इस बार भी पूरी कोशिश करेगी।

अलवर लोकसभा सीट

दरअसल, हम बात अलवर लोकसभा सीट की कर रहे हैं, जोकि सामान्य है। यहां अभी कांग्रेस का कब्जा है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से अलवर की दूरी करीब 160 किलो मीटर है और यह जिला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आता है। सबसे बड़ी बात है कि यह अरावली की पहाड़ियों से घिरा हुआ है और प्राकृतिक रूप से बहुत ही खूबसूरत है। साथ ही साथ ऐतिहासिक धरोहरों का खजाना है। बताया जाता है कि अलवर का प्राचीन नाम 'शाल्वपुर' था। पहाड़ी पर स्थित बाला किला इसकी विशिष्टता है। इस समय यह एक ओद्योगिक नगर है। वहीं, अलवर जिले में सिलिसेढ़, सरिस्का वन्य जीव उद्यान, किला और संग्रहालय भी देखने योग्य हैं। इसके अलावा अलवर कोर्ट की इमारत एक बहुत ही खूबसूरत पुराने महल में बनी हुई है। 

10 बार जीती कांग्रेस

अलवर लोकसभा सीट पर पहली बार 1951 में चुनाव हुआ था, जिसमें कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। यही नहीं उसने लगातार दो बार इस सीट पर कब्जा जमाया। इसके बाद फिर 1967, 1971, 1980, 1984, 1996, 1998, 2004, 2009 में कांग्रेस ने जीत हासिल की। हालांकि उसे 1962, 1977, 1989, 1991, 1999 और 2014 में हार का सामना करना पड़ा। इस सीट पर वह अब तक 10 बार जीत चुकी है। लेकिन, उसने 2018 में हुए उपचुनाव में इस सीट पर फिर से कब्जा जमा लिया।

बीजेपी ने पहली बार 1991 में खोला खाता

बताते चलें कि इस सीट पर बीजेपी अबतक केवल तीन बार जीत हासिल कर सकी है। उसने पहली बार 1991, दूसरी बार 1999 और तीसरी बार 2014 में विजय पायी थी। लेकिन, अलवर के बीजेपी सांसद महंत चंद नाथ का 17 सितंबर, 2018 को देहांत हो गया था। इसकी वजह से इस सीट पर उपचुनाव करवाया गया था, जिसमें कांग्रेस के उम्‍मीदवार करण सिंह यादव ने बीजेपी के जसवंत सिंह यादव को करीब 1 लाख, 56 हजार, 319 वोट से हरा दिया। इस हार से बीजेपी को बड़ा झटका लगा था और उसने मोदी लहर के बावजूद अपनी सीट गंवा दी। 

पढ़ें, चुनाव आयोग के आकड़े

साल 2014 के चुनावों के आंकड़े देखें तो अलवर सीट पर मतदाताओं की संख्या 34 लाख, 36 हजार, 25 थी। इनमें से 21 लाख, 86 हजार, 263 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। वहीं, वोटिंग 65.85 फीसदी हुई थी। बीजेपी के उम्मीदवार चांद नाथ को 6 लाख, 40 हजार, 481 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के उम्मीदवार भंवर जितेंद्र सिंह को 3 लाख, 57 हजार, 609 वोट मिले थे। बीजेपी प्रत्याशी चांद नाथ ने दो लाख, 83 हजार, 895 वोटों के अंतर से कांग्रेस को हराया था।  

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