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Ishq Mubarak Review: आधुनिक युग में प्रेम के रंग दिखाने के साथ कई सीख देकर जाती है किताब 'इश्क मुबारक'

By अनुराग आनंद | Updated: February 14, 2020 12:11 IST

कुलदीप राघव के इश्क़ मुबारक किताब में ऐसे ही प्यार की एक कहानी है, जिसे पढ़ते हुए आप कहानी के पात्रों के साथ एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। प्यार और सपने ये दो ऐसी चीज है, जिसके बारे में हर युवा कुछ न कुछ सोचता है।

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ठळक मुद्देकहानी में प्यार और सपने एक दूसरे से ऐसे घुले हैं, जैसे पानी में नमक आसानी से घुल जाता है।सरल हिंदी में लिखे होने की वजह से इश्क़ मुबारक को आसानी से एक से दो दिन में कुछ घंटे का समय निकालकर पढ़ा जा सकता है।

आज के समय में प्रेम पर खूब कहानियां लिखी जा रही हैं। लेकिन, बहूत कम कहानी ऐसी होती है, जिसमें इतनी ताकत हो कि पाठक उस कहानी को पढ़ते हुए अहसासों में डूब जाए। कुलदीप राघव के इश्क़ मुबारक किताब में ऐसे ही प्यार की एक कहानी है, जिसे पढ़ते हुए आप कहानी के पात्रों के साथ एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। प्यार और सपने ये दो ऐसी चीज है, जिसके बारे में हर युवा कुछ न कुछ सोचता है।

ये दोनों ही चीजें जवान दिलों को बेचैन करती है। इनमे एक जादू होता है, एक तड़प होती है जिसे हर युवा जीना चाहता है। इश्क़ मुबारक को लिखते समय बड़ी सावधानी से लेखक ने पात्र के प्यार और सपने दोनों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया है। कहानी में प्यार और सपने एक दूसरे से ऐसे घुले हैं, जैसे पानी में नमक आसानी से घुल जाता है। आइए पहले कहानी और फिर कहानी के बारे में जानते हैं।

क्या है कहानी-इस कहानी को कम शब्दों में समझने के लिए आपको कबीर की दो पंक्ति समझनी होगी। कबीर की वो पंक्ति है-प्रेम ना बारी उपजै प्रेम ना हाट बिकायराजा प्रजा जेहि रुचै,शीश देयी ले जाय।

इसका अर्थ है कि प्रेम ना तो खेत में पैदा होता है और न ही बाजार में बिकता है। राजा या प्रजा जो भी प्रेम का इच्छुक हो वह अपना सर्वस्व त्याग कर प्रेम प्राप्त कर सकता है। साफ़ है कि इश्क़ मुबारक कहानी में भी 'वंदना' नाम की लड़की जो लखनऊ के विधायक परिवार की बेटी है, वो दिल्ली में चाय बेचने वाले मेरठ के 'मीर' नाम के एक लड़के से प्यार कर बैठती है।

इस प्यार में वह अपने घर समाज सबसे टकराने के लिए तैयार हो जाती है। सब कुछ सही हो जाता है, तभी कुछ ऐसा होता है कि वंदना और मीर एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। लेकिन, ये सब कहानी के अंत में होता है, कहानी में इसके पहले क्या होता है जानने के लिए आगे पढ़ें।दरअसल, मीर वंदना के अलावा साहिबा नाम की एक महिला से प्यार करने लगा था।

इस किताब में मीर, साहिबा और वंदना के किरदारों को उकेरा गया है और नीमराना से लेकर मुरथल जैसी जगह को जोड़ा गया है वो सब इसे जीवन्तता प्रदान करती हैं और एक बार कहीं भी नहीं लगता कि लेखक कुलदीप राघव ने कल्पनाओं के आधार पर पात्रों को गढ़ा है।

कहानी की बात करें तो इश्‍क़ मुबारक, मेरठ के करीब एक छोटे से गांव के रहने वाले और गरीबी में पले-बढ़े मीर की ज़िन्दगी की कहानी है। बचपन में पिता का निधन और फ‍िर जवानी में माँ का साया उठ जाने के बाद, तमाम पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक समस्‍याओं को पार कर मीर रॉकस्‍टार बनने के सपने को पूरा करता है।

कहानी कैसी लगी?कहानी सरल भाषा में लिखी गयी है। सरल हिंदी में लिखे होने की वजह से  कहानी को आसानी से एक से दो दिन में कुछ घंटे का समय निकालकर पढ़ा जा सकता है। कहानी में मेरठ का लड़का है ऐसे में थोड़ा-बहूत यदि मेरठ की स्थानीय भाषा भी कहानी में होती तो पाठक को पढ़ने में और भी आनंद मिल सकता था।

कहानी बेहद सपाट है, कुछ नया और आश्चर्य से भरा पड़ाव नहीं आता है कि आप दिल थामकर आगे कहानी पढ़ें। कई जगह कहानी उबाऊ होती है, लेकिन अगले चैप्टर में कहानी को संभाल लिया जाता है। आप एक पेज पढ़कर अगली पेज में क्या होगा अनुमान लगा सकते हैं।इसके अलावा में कहानी में कई पंक्तियां बेहद शानदार है जैसे- बेटा चाहे कितना भी बड़ा हो जाय हर भारतीय मां उसे बच्चा ही समझती है।

इसी तरह कहानी में एक अन्य जगह पर वंदना को पत्र में मीर लिखता है कि- मुझे चाय पसंद है, तुझे बिल्कुल भी नहीं। इसके बावजूद हम एक टेबल पर होते हैं, तुम चाय पीती हो और मैं कॉफ़ी।

जिस तरह गंगा और यमुना के पानी का रंग और प्रवाह अलग होकर भी संगम में एक हो जाता है, ठीक वैसे हम दोनों दोस्तों ने अलग-अलग होकर भी साथ चलने का वायदा किया है। यदि आपको प्यार की कहानी पढ़ने में मन लगता है तो आप इस कहानी को एक बार पढ़ सकते हैं।

 

टॅग्स :पुस्तक समीक्षावैलेंटाइन डेइंडियाकला एवं संस्कृति
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