Indian Army to get 745000 Russian Kalashnikov AK-203 rifles | भारतीय सेना का असॉल्ट राइफलों के लिए इंतजार होगा खत्म, देश में निर्मित होंगी 7 लाख से ज्यादा रूसी AK-203 राइफलें
भारतीय सैनिकों को अगले साल 7 लाख से ज्यादा रूसी राइफलें मिलने की उम्मीद! (सांकेतिक तस्वीर)

Highlightsभारतीय सेना को इस साल फरवरी में SiG Sauer अमेरिकी राइफलें मिलींभारतीय सेना को जल्द मिलेंगी देश में निर्मित होने वाली 7 लाख रूसी राइफलें

पाकिस्तान और चीन की सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों को उनकी मांग के करीब 15 सालों बाद आखिरकार अब नई असॉल्ट राइफलें मिल रही हैं। 

अमेरिक में बनी लंबी रेंज मारक क्षमता की राइफलों को केवल फ्रंटलाइन सैनिकों को दिया जाएगा, जबकि 13 लाख सैनिकों को रूसी कलाशनिकोव राइफलें दी जाएंगी।  

इससे पहले बुधवार को आई रिपोर्ट्स में कहा गया था कि सेना को प्रमुख ऑपरेशन की जरूरतों के लिए फास्ट-ट्रैक प्रोक्योरमेंट (एफटीपी) के तहत अमेरिकी फर्म एसआईजी सेउर (SiG Sauer) को दिए गए 638 करोड़ रुपये की 72400 राइफलों में से 10 हजार राइफलें मिल गई हैं। 

इन 72 हजार राइफलों में से करीब 66 हजार थल सेना को जबकि 4 हजार एयरफोर्स को और 2 हजार नेवी को मिलनी हैं। 

7 लाख से ज्यादा रूसी राइफलें बढ़ाएंगी सेना की ताकत

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश स्थित कोरवा ऑर्डिनेंस फैक्ट्री रूस के साथ एक संयुक्त उपक्रम के तहत 7 लाख 45 हजार कलाशनिकोव AK-203 राइफलों का निर्माण करेगी, जिसकी कीमत 12 हजार करोड़ रुपये होगी और इन राइफलों से न सिर्फ सेना बल्कि पुलिस की भी जरूरतें पूरी हो सकेंगी। 

चर्चित AK-47 राइफलों की अगली पीढ़ी के तौर पर देखी जा रहीं 7.62x39मिमी कैलिबर वाली AK-203 राइफलों के पास 300 मीटर की प्रभावशाली रेंज है।

7 लाख से ज्यादा AK-203 राइफलें होंगी रूस के सहयोग से निर्मित!

भारतीय सेना को 7 लाख से ज्यादा कलाशनिकोव राइफलें मिलेंगी जबकि 29 हजार राइफलें एयरफोर्स और 13600 राइफलें नेवी को मिलेंगी। माना जा रहा कि इन राइफलों के निर्माण के लिए रूस के साथ अंतिम अनुबंध अगले साल की शुरुआत में हो जाएगा।

जनरल बिपिन रावत ने इससे पहले सार्वजनिक तौर पर कहा था कि बजट की बाध्यता की वजह से भारतीय सेना को आधुनिक राइफलों और अन्य हथियारों से लैस नहीं किया जा सकता है। 

सबसे पहले 2005 में भारतीय सेना की 382 पैदल सेना बटालियन (सभी में 850 सैनिक) के लिए नई असॉल्ट राइफलों और करीबी लड़ाई के लिए कार्बाइन की मांग की गई थी और पहले से मौजूद 5.56मिमी INSAS राइफलों को रिप्लेस करने को कहा गया था। लेकिन अवास्तविक तकनीकी मानदंडों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने कथित तौर पर खरीद की योजनाओं को पटरी से उतार दिया। 

लेकिन इन सीमित संख्या में राइफलों की खरीद पैदल सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी होगी, जिन्हें अक्सर बड़े हथियारों-लड़ाकू विमानों से लेकर पनडुब्बियों को शामिल करने की होड़ में भुला दिया जाता है। उदाहरण के लिए सेना को क्लोज क्वॉर्टर जंग के लिए करीब 4.55 लाख कार्बाइन की जरूरत है। 

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इंफ्रेट्री के लिए हथियारों की बड़ी संख्या में कमी को देसी कंपनियों की विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी के तहत मेक इन इंडिया के तहत हथियारों के निर्माण से पूरा किया जाएगा।

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