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अदालत ने आईएसआईएस का सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत दी

By भाषा | Updated: August 13, 2021 19:12 IST

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मुंबई, 13 अगस्त बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को प्रतिबंधित आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 28 वर्षीय युवक को जमानत दे दी।

न्यायमूर्ति एस एस शिंदे और न्यायमूर्ति एन जे जमादार की खंडपीठ ने इकबाल अहमद कबीर अहमद की अपील पर उसे जमानत प्रदान की। अहमद ने उसकी जमानत खारिज करने के विशेष अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।

पीठ ने कहा, '' विशेष अदालत द्वारा पारित आदेश को रद्द किया जाता है। याचिकाकर्ता (अहमद) को एक लाख रुपये के मुचलके और इतनी ही राशि के एक या दो जमानतदारों को पेश करने के बाद जमानत पर रिहा किया जाएगा।''

पीठ ने कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत जमानत देने पर रोक है, लेकिन मामले में जल्द ही सुनवाई के पूरी होने की कोई संभावना नहीं है और उसे निरंतर कैद में रखना जीवन और स्वतंत्रता के उसके संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा। अहमद पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं।

अदालत ने अहमद को पहले महीने में सप्ताह में दो बार और इसके बाद अगले दो महीने सप्ताह में एक बार राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।

पीठ ने कहा, '' याचिकाकर्ता को सुनवाई की हर तारीख पर पेश होना होगा और वह मामले में गवाहों को प्रभावित करने या उनसे संपर्क करने का प्रयास नहीं करेगा।''

उल्लेखनीय है कि अहमद को सात अगस्त 2016 को गिरफ्तार किया गया था और आईएसआईएस का सदस्य होने के आरोप में उसके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन के मुताबिक, अहमद आईएसआईएस के ''परभणी मॉड्यूल'' का हिस्सा था जो परभणी के पुलिस अधीक्षक कार्यालय पर कथित तौर पर हमले की साजिश रच रहे थे। मामले में अभियोजन एजेंसी एनआईए ने अदालत को बताया है कि अहमद और उसके दोस्त दुनियाभर में ‘इस्लाम पर अत्याचार’ पर चर्चा करने के लिए शाम में एक-साथ बैठते थे और ऐसे जुल्मों का बदला लेने के बारे में विचार करते थे।

पीठ ने अहमद के वकील मिहिर देसाई की दलीलों का संज्ञान लिया जिन्होंने कहा कि सिर्फ चर्चा करना अपराध करना नहीं हो जाता है। देसाई ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं और मामले में सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है और 150 से अधिक गवाहों का परीक्षण किया जाना है।

अदालत ने कहा कि इस चरण में यह इंगित करने के लिए कोई प्रथम दृष्टया सामग्री नहीं है कि आरोपी ने अपराध या विद्रोह को उकसाया, या उसने हिंसक प्रतिक्रियाओं की वकालत की।

उच्च न्यायालय ने अहमद को जमानत देने से इनकार करने वाले विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में जमानत देने से इनकार करना प्रक्रिया को न केवल अनुचित बल्कि अविवेकपूर्ण भी बना देगा।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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