पटनाः बिहार के मुख्यमंत्री एवं जद यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा तेज होने से पटना में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्यसभा की 5 सीटों के चुनाव के लिए नामांकन के आखिरी दिन से पहले होली के माहौल में अचानक यह खबर फैली कि नीतीश कुमार को कुर्सी छोड़ने के लिए मनाया जा रहा है, ताकि बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बनाया जा सके। बता दें कि बिहार में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर 19 साल से भी अधिक समय से मुख्यमंत्री पद पर टिके नीतीश कुमार का “दिल्ली प्लान” लगभग तैयार हो चुका है।
हालांकि आधिकारिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं है, लेकिन संकेतों की राजनीति अपने चरम पर है। इधर भाजपा भी चुप्पी साधे हुए है। पार्टी ने हाल ही में नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर जिस तरह अंतिम क्षण में सबको चौंका दिया था, उसने यह साफ कर दिया कि बड़े फैसले अचानक भी हो सकते हैं।
चर्चा के मुताबिक नीतीश अगर दिल्ली जाने को राजी हो जाते हैं तो गुरुवार को वो नामांकन दाखिल करेंगे और अप्रैल में पुराने सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने के बाद नए सदस्यों संग शपथ से पहले बिहार में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ करेंगे। भाजपा और जदयू के अलावा सहयोगी दल चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी( रामविलास), जीतनराम मांझी की हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के विधायकों की निगाह भी बदल रहे राजनीतिक समीकरण और मौसम पर है।
क्योंकि नीतीश कुमार अगर मुख्यमंत्री नहीं रहते हैं तो भाजपा का मुख्यमंत्री बनने पर कैबिनेट में भी भारी बदलाव होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति अक्सर अंतिम क्षण तक गोपनीय रहती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में नए चेहरों को आगे लाकर पार्टी ने पहले भी “सरप्राइज फैक्टर” दिखाया है।
उल्लेखनीय है कि बिहार में भी जातीय समीकरण, संगठन की पकड़ और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति को ध्यान में रखकर फैसला लिया जा सकता है। ऐसे में यह तय है कि यदि बदलाव हुआ, तो वह साधारण नहीं होगा। फिलहाल मुख्यमंत्री पद पर कोई औपचारिक हलचल नहीं है। सरकार काम कर रही है। लेकिन राजनीति में सन्नाटा अक्सर बड़े फैसले का संकेत होता है।
अब सवाल हवा में तैर रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार सचमुच दिल्ली की राह पकड़ेंगे? क्या भाजपा का “छुपा हुआ नाम” अंतिम मुहर का इंतजार कर रहा है? जानकारों की मानें तो एनडीए सरकार में कुछ समय से जदयू से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनते रहे हैं तो दो उपमुख्यमंत्री का पद भाजपा को मिलता रहा है। बड़े मंत्रालयों के साथ-साथ भाजपा को मंत्रिमंडल में जदयू से ज्यादा संख्या में मंत्री पद भी मिलता रहा है।
सूत्रों का कहना है कि भाजपा के किसी मुख्यमंत्री के अंदर बनने वाले मंत्रिमंडल में समीकरण उलट जाएगा। अर्थात अगर भाजपा का मुख्यमंत्री होगा तो उस कैबिनेट में जदयू के मंत्रियों की संख्या भाजपा के मंत्रियों से ज्यादा होगा। उपमुख्यमंत्री के जो 2 पद अब तक भाजपा लेती रही है, उन 2 पदों पर जदयू के नेता उपमुख्यमंत्री बनेंगे।
एक उपमुख्यमंत्री पद के लिए जदयू कोटा से नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का नाम तय माना जा रहा है, जिनका नाम हरिवंश नारायण सिंह की जगह पर राज्यसभा जाने वालों में लिया जा रहा था। सूत्रों का कहना है कि भाजपा के किसी मुख्यमंत्री के अंदर बनने वाले मंत्रिमंडल में समीकरण उलट जाएगा। संख्या भाजपा के मंत्रियों से ज्यादा होगा।
भाजपा को कई बड़े मंत्रालय जदयू के मंत्रियों के लिए छोड़ने होंगे, जो अभी तक नीतीश कुमार कैबिनेट में भाजपा नेताओं के पास हुआ करते थे। लोजपा, हम और रालोमो कोटा के मंत्रियों पर विभाग बंटवारे में असर दिख सकता है, लेकिन संख्या यथावत बनी रहने की संभावना है। वहीं जब मुख्यमंत्री बदलेंगे तो निगम, बोर्ड से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक बड़े बदलाव समय के साथ दिखने लगेंगे।
भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री के दावेदारों में केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा का नाम तैर रहा है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भाजपा का मुख्यमंत्री ओबीसी या अति पिछड़ी जाति से ही होगा। कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रह चुके नित्यानंद राय राज्य में पहला भगवा मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
सम्राट चौधरी के लगातार प्रोमोशन से उनका दावा भी मजबूत है। लेकिन दिल्ली में रेखा गुप्ता, ओडिशा में मोहन चरण मांझी और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरीखे चर्चा और रेस से बाहर के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा चौंकाती रही है।
नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को साथ रखते हुए बिहार में भाजपा को मजबूत करने वाले नेता की तलाश किस पर जाकर रुकेगी, ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के अध्यक्ष नितिन नबीन के अलावा कोई नहीं बता सकता। कुल मिलाकर सियासी गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं।