पटनाः बिहार की नीतीश सरकार इन दिनों उपयोगिता प्रमाण पत्र(यूसी) बिल को लेकर कटघरे में खडा हो गई है। दरअसल, 70,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को लेकर उठा है, जिसके खर्च का अब तक कोई उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) सरकार द्वारा नहीं सौंपा गया है। बता दें कि पिछले वर्ष जुलाई में कैग ने विधानसभा को सौंपी अपनी रिपोर्ट में 49649 मामलों में लंबित यूसी का उल्लेख किया था। इसके बाद किशोर कुमार इस मामले को लेकर हाई कोर्ट पहुंचे हैं। याचिकाकर्ता ने इस मामले की जांच सीबीआई या किसी अन्य सक्षम एजेंसी से कराने का आग्रह किया है। एक विकल्प यह भी है कि हाई कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक टीम गठित की जाए, जो इस मामले की जांच करे।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू और न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह की खंडपीठ सुनवाई कर रही। महाधिवक्ता पीके शाही ने यथाशीघ्र यूसी सौंप दिए जाने के लिए खंडपीठ को आश्वस्त किया है। हालांकि विस्तृत रिपोर्ट के लिए सरकार को दो माह की मोहलत मिल गई है।
उल्लेखनीय है कि यूसी बिल को लेकर सीएजी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में राज्य की विकास दर 14.47 फीसदी रही, जो राष्ट्रीय औसत से ऊपर है। सीएजी को अभी तक 70877.61 करोड़ रुपये के खर्च का पूरा ब्योरा नहीं मिला है।
2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2024 तक 70,877 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) और 9,205 करोड़ रुपये के एसी/डीसी बिल जमा नहीं किए गए हैं। यह भारी अनियमितता राज्य के विभागों द्वारा समय पर खर्च का हिसाब न देने को दर्शाता है, जिससे वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठे हैं।
बकाया राशि में 49,649 मामलों में 70,877.61 करोड़ रुपये के यूसी जमा नहीं किए गए हैं। लंबित एसी/डीसी बिल के तहत 9,205.76 करोड़ के डीसी (डिटेल्स कंटींजेंट) बिल जमा नहीं हुए हैं। सबसे ज्यादा लंबित मामलों में पंचायती राज, शिक्षा, शहरी विकास और ग्रामीण विकास विभाग शामिल हैं। इसमें से 14,452 करोड़ रुपये से अधिक की राशि 2016-17 से पहले की है।
बिना यूसी और डीसी बिल के, धन का गबन, दुरुपयोग या गलत इस्तेमाल होने का बड़ा खतरा है। एसी बिल (एडवांस कंटिंजेंट) के विरुद्ध आमतौर पर 6 महीने के भीतर डीसी बिल जमा करना होता है, लेकिन यहां वर्षों से मामले लंबित हैं। विभिन्न विभागों द्वारा यह खर्च वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2022-22 के बीच हुआ है।
नियमानुसार, उतने ही अनुदान का भुगतान होना चाहिए, जितना कि वर्ष के भीतर खर्च होने की संभावना हो। सहायता अनुदान के खर्च का हिसाब 18 माह के भीतर उपलब्ध करा दिया जाना चाहिए, लेकिन इस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। विपक्ष ने इसे घोटाला बताते हुए धज्जियां उड़ा देने की सौगंध खाई, सरकार ने पाई-पाई का हिसाब देने की प्रतिबद्धता जताई।
मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया, तब जाकर कहीं 18687.98 करोड़ रुपये के यूसी उपलब्ध कराए गए। फिर भी 52189.63 करोड़ का हिसाब-किताब बाकी रह जाता है। जो यूसी सौंपे गए हैं, उनसे संबंधित खर्च की गुणवत्ता का अब आकलन भी बेमानी हो जाएगा, क्योंकि काफी समय निकल चुका है।
राजद के प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन का कहना है कि इस बीच चालू वित्तीय वर्ष के खातों की क्लोजिंग भी करनी होगी। उन्होंने कहा कि अपनी ही सुस्ती के कारण विभागों पर लेखा-जोखा का दबाव बढ़ेगा। आशंका है कि पुराने हिसाब-किताब में व्यस्तता के बहाने वे चालू वित्तीय वर्ष का हिसाब दबा लें।
गगन ने कहा कि सरकार में यही कार्य-संस्कृति बन गई है। इसका खामियाजा अंतत: नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है। चाहें गबन हो या खर्च का गुणवत्ता-हीन होना, दोनों ही स्थिति में विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समय से यूसी नहीं दिए जाने का यही निहितार्थ है।