पटनाः राज्यसभा चुनाव में बिहार की पांचों सीटों पर एनडीए को मिली जबर्दस्त जीत के बाद महागठबंधन में खींचतान साफ दिख रही है। एक और राजद के कार्यकारी अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव धोखा बता रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस विधायक उन्हें ही आईना दिखा रहे हैं। इसके साथ ही कांग्रेस अपने अध्यक्ष और समाज की अनदेखी बता रही है। इस बीच अब तस्वीर साफ है कि यह हार सिर्फ चार वोटों की नहीं थी, बल्कि अंदरूनी असहमति की भी थी। वहीं चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद अब महागठबंधन अब अपने ‘लापता’ और नाराज विधायकों पर कार्रवाई या सुलह की रणनीति बनाने में जुटा है।
तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर कुछ लोगों ने धोखा नहीं दिया होता तो आज हमारी जीत तय थी। कार्रवाई बाद में तय करेंगे। हालांकि,राजद विधायक के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई उनके लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता है। सियासी जानकारों का कहना है कि अगर तेजस्वी यादव ने अपनी पार्टी के विधायक फैजल रहमान पर एक्शन लिया तो उनका नेता प्रतिपक्ष का पद खतरे में पड़ जाएगा।
क्योंकि इसके लिए जरूरी विधायकों की संख्या 25 होनी चाहिए। दूसरी ओर अगर राहुल गांधी ने अपने तीन विधायकों पर कोई कार्रवाई की तो फिर बिहार कांग्रेस के पास केवल 3 विधायक बचेंगे। वहीं, चुनाव में वोट नहीं डलने वाले विधायकों द्वारा अब अलग अलग तर्क गढ़ा जा रहा है कि वे किन वजहों से वोटिंग से अनुपस्थित रहे।
कोई कह रहा है कि राजद उम्मीदवार एडी सिंह भूमिहार थे, इसलिए वोट नहीं दिया तो कोई कह रहा है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने कहा था कि आप स्वतंत्र हैं। जबकि राजद विधायक फैसल रहमान ने कहा कि “मां से बढ़कर कुछ भी नहीं है।” दरअसल, महागठबंधन के सिर्फ 37 विधायकों ने ही वोटिंग किया।
इस चुनाव में कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास, कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा, कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह और राजद विधायक फैसल रहमान वोटिंग के लिए नहीं पहुंचे। ऐसे में इस चुनाव में एक बार फिर से साबित कर दिया कि तेजस्वी यादव में वो कूटनीतिक क्षमता नहीं है, जो उनके पिता लालू प्रसाद यादव में थी।
हालांकि, तेजस्वी यादव को एआईएमआईएम के पांचों और बसपा के एक विधायक का वोट हासिल करने में सफलता जरूर मिली। महागठबंधन से बाहर के दलों का समर्थन हासिल करके तेजस्वी यादव ने जरूरी संख्या बल जुटा लिया था, लेकिन आखिरी वक्त में उनके अपने ही धोखा दे गए। मतदान के दिन विपक्ष के चार विधायकों की गैरहाजिरी ने पूरा समीकरण बदल दिया।
इस बीच वाल्मीकि नगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि एक सीट का मौका महागठबंधन के पास था। दीपक यादव या मुकेश सहनी से बेहतर उम्मीदवार कौन हो सकता था? लेकिन ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया गया जिसका जनाधार महागठबंधन के खिलाफ है। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि एनडीए का साथ नहीं दे सकते थे।
राजद ने गलत उम्मीदवार चुना तो वोट नहीं देना बेहतर समझा। वहीं, कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा के मीडिया प्रभारी विनय यादव ने भी बताया कि वे महागठबंधन द्वारा घोषित उम्मीदवार से नाराज थे। उनका मानना था कि राजद नेता और बगहा चीनी मिल के मालिक दीपक यादव को उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए था।
बता दें कि सुरेंद्र कुशवाहा पहले उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के टिकट पर वाल्मीकि नगर से चुनाव लड़ चुके हैं। जबकि मनिहारी से कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि महागठबंधन की ओर से दलित, अल्पसंख्यक या ओबीसी वर्ग से उम्मीदवार नहीं बनाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन वर्गों की अनदेखी कर अन्य कोटे से प्रत्याशी उतारा गया, जिसके विरोध में उन्होंने मतदान का बहिष्कार किया।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कांग्रेस में ही बने रहेंगे। उधर, फारबिसगंज से कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास ने कहा कि जब पार्टी के विधायकों को ही सम्मान नहीं मिलेगा तो वोट देने का कोई मतलब नहीं रह जाता। मनोज विश्वास ने कहा कि पूरे चुनाव के दौरान उनके अध्यक्ष राजेश राम की अनदेखी की गई।
उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस के प्रति निष्ठावान हैं और पार्टी में ही बने रहेंगे। हालांकि, उन्होंने यह बी कहा कि कई मुद्दे ऐसे हैं जिन्हें समय आने पर सामने लाया जाएगा। जबकि ढाका से राजद विधायक फैसल रहमान के पारिवारिक सूत्रों के अनुसार वे अपनी बीमार मां रुखसाना खातून के इलाज के लिए दिल्ली में हैं।
उनकी मां पिछले करीब एक महीने से बीमार हैं और इसी पारिवारिक वजह के चलते वे राज्यसभा चुनाव के मतदान में शामिल नहीं हो सके। लेकिन, असली बात कांग्रेस के विधायकों के पलटवार को लेकर है। वहीं इस शर्मनाक हार पर भी सिर-फुटौव्वल भी शुरू हो गया है। पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का दायित्व था कि वो सबसे बात करें।
उन्होंने दावा किया कि तेजस्वी ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी से राज्यसभा चुनाव पर कोई बातचीत नहीं की थी। वहीं, कांग्रेस विधान पार्षद समीर सिंह ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष इतने बड़े गठबंधन के नेता हैं। जब वो हर विधायक और हर नेता से मिल रहे हैं तो अध्यक्ष जी (राजेश राम) से भी संपर्क जरूर किए होंगे, लेकिन फिर भी हार गए।
हम लोगों को इस पर ज्यादा चर्चा करनी चाहिए कि ये हमारी कमजोरी है कि कांग्रेस विधायकों को एकजुट नहीं रख पाए। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। दूसरे पर आरोप लगाने की जरूरत नहीं। इस बीच महागठबंधन की हार को लेकर केंद्रीय मंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के संरक्षक जीतनराम मांझी ने राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर तीखा तंज कसा।
कहा कि जब पैसा लेकर टिकट बेचिएगा तो माननीय विधायक फोन नहीं ऑफ करेगें तो क्या करेगें। “जय एनडीए, तय एनडीए” जीतन राम मांझी ने यह बात सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर कही। एक लाइन के संदेश में उन्होंने कांग्रेस और राजद पर जोरदार निशाना साधा।