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बिहार विधानसभा चुनावः महागठबंधन की सबसे कमज़ोर कड़ी कांग्रेस, 70 सीट पर चुनाव लड़े और जीते 19, उपचुनाव में कई राज्य हारे

By शीलेष शर्मा | Updated: November 12, 2020 11:17 IST

आरजेडी शुरू से ही इस पक्ष में नहीं थी कि कांग्रेस को 70 सीटें दी जाएँ लेकिन भारी दवाब और लालू के हस्तक्षेप के बाद तेजस्वी 70 सीट देने पर राज़ी हुए। 70 सीटों में मात्र 19 सीटें जीतने वाली कांग्रेस स्ट्राइक रेट में भी काफी पिछड़ गयी। 

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ठळक मुद्देअखिलेश प्रताप सिंह यह मानते हैं कि कांग्रेस को जितनी ताक़त चुनाव में लगानी चाहिए, वह उतनी ताक़त लगाने में कामयाब नहीं हो सके।काँग्रेसी नेता  शुरू से आरोप लगाते रहे हैं कि उम्मीदवारों का चयन करते समय चुनाव परिणामों को ध्यान में नहीं रखा गया। टिकट वितरण तक ज़िम्मेदारी संभालने वाले शक्ति सिंह गोहिल चुनाव आते आते पूरे सीन से गायब हो गए।

नई दिल्लीः बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महागठबंधन की सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुई है। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता मान रहे हैं कि कांग्रेस के कारण ही महागठबंधन का जीत के नज़दीक पहुंच कर भी पराजय का मुँह देखना पड़ा। 

आरजेडी शुरू से ही इस पक्ष में नहीं थी कि कांग्रेस को 70 सीटें दी जाएँ लेकिन भारी दवाब और लालू के हस्तक्षेप के बाद तेजस्वी 70 सीट देने पर राज़ी हुए। 70 सीटों में मात्र 19 सीटें जीतने वाली कांग्रेस स्ट्राइक रेट में भी काफी पिछड़ गयी। पार्टी के नेता तरीक़ अनवर, शकील अहमद, सांसद अखिलेश प्रताप सिंह यह मानते हैं कि कांग्रेस को जितनी ताक़त चुनाव में लगानी चाहिए, वह उतनी ताक़त लगाने में कामयाब नहीं हो सके।

उम्मीदवारों का चयन करते समय चुनाव परिणामों को ध्यान में नहीं रखा गया

बिहार के तमाम स्थानीय काँग्रेसी नेता  शुरू से आरोप लगाते रहे हैं कि उम्मीदवारों का चयन करते समय चुनाव परिणामों को ध्यान में नहीं रखा गया। टिकट वितरण तक ज़िम्मेदारी संभालने वाले शक्ति सिंह गोहिल चुनाव आते आते पूरे सीन से गायब हो गए अथवा उन्हें किनारे कर दिया गया और पूरा चुनाव रणदीप सुरजेवाला के हवाले कर दिया गया। 

अविनाश पांडे की भी भूमिका महज एक स्टेपनी बन कर रह गयी। शक्ति सिंह गोहिल कहते हैं कि उन्हें जो ज़िम्मेदारी दी गयी वह उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी से निभायी, लेकिन स्थानीय नेता लगातार टिकटों को बेचने का आरोप लगाते रहे। इन नेताओं का मानना था कि  70 में से 20 सीटें ऐसी थीं जिन पर कांग्रेस ने हारने वाले उम्मीदवारों पर दांव  लगाया।

चुनाव की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर थी जो बिहार की राजनीति को जानते ही नहीं थे

चुनाव की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर थी जो बिहार की राजनीति को जानते ही नहीं थे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कड़ी टिप्पणी की कि चुनाव की जो तैयारी एक साल पहले की जानी थी, कांग्रेस ने चुनाव से दो महीने पहले उसकी शुरुआत की। प्रचार अभियान भी लचर था। राज्य के वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया गया और प्रदेश अध्यक्ष  मदन मोहन झा, जिनको स्थानीय नेताओं का कोई समर्थन नहीं हैं राज्य में पार्टी चला रहे थे जबकि सदानंद सिंह, अखिलेश प्रताप सिंह, तारिक़ अनवर, शकील अहमद और युवा नेताओं को चुनाव के दौरान विश्वास में ही नहीं लिया गया।  

यह केवल बिहार की बात नहीं, 31 राज्यों में हुए उप-चुनावों में कांग्रेस मध्य प्रदेश को छोड़कर खाता तक नहीं खोल सकी, जबकि भाजपा ने 59 सीटों में से 41 सीटों पर जीत हासिल की। गुजरात हो, उत्तर प्रदेश हो, कर्नाटक हो या फिर मणिपुर हो, कांग्रेस शून्य पर चली गयी।

उत्तर प्रदेश में सपा को मिली 1 सीट को छोड़ कर सभी सीटें भाजपा ने जीत ली

 गुजरात की 8 सीटें, मणिपुर की 4 सीटों, मध्य प्रदेश में 19 सीटें और उत्तर प्रदेश में सपा को मिली 1 सीट को छोड़ कर सभी सीटें भाजपा ने जीत ली। इन तमाम पराजय के बाद भी कांग्रेस आत्मचिंतन नहीं कर रही है।  जिन नेताओं ने पिछले दिनो बगावत का स्वर मुखर किया था, वे खामोश ज़रूर हैं लेकिन एक चिंगारी उनमें अभी भी सुलग रही है।

स्वर मुखर करने वाले एक नेता ने टिप्पणी की कि कांग्रेस को उस चंगुल से बाहर निकालना पड़ेगा जिसने राहुल के चारों ओर  जाल बिछा रखा है।  इस नेता का इशारा रणदीप सुरजेवाला, के सी वेणुगोपाल सरीखे नेताओं की ओर था लेकिन इस आक्रोश के बावजूद सचिन पायलट, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे तमाम नेता खुल कर फिलहाल कुछ नहीं बोल रहे हैं, उन्हें कांग्रेस महा अधिवेशन का इंतज़ार है जहाँ खुली बहस के साथ ने अध्यक्ष का चुनाव होगा। माना जा रहा है कि इस महाअधिवेशन में बगावत की सुलगती आग धधकेगी।  

 

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