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अनुच्छेद 370 के हटने के बाद अब कश्मीरियों को सता रहा है 'दरबार मूव' का डर, जानें क्या है ये जिसपर लग सकती है रोक

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: October 15, 2019 15:55 IST

जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव की शुरूआत महाराजा रणवीर सिंह ने 1872 में बेहतर शासन के लिए की थी। कश्मीर, जम्मू से करीब तीन सौ किलोमीटर दूरी पर था, ऐसे में डोगरा शासक ने यह व्यवस्था बनाई कि दरबार गर्मियों में कश्मीर व सर्दियों में जम्मू में रहेगा।

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ठळक मुद्देकश्मीरियों को अब ‘दरबार मूव’ की प्रक्रिया के थम जाने का एक डर सता रहा है‘दरबर मूव’ अर्थात राजधानी बदले जाने की प्रक्रिया है जिसके तहत गर्मियों में राजधानी श्रीनगर चली जाती है

अनुच्छेद 370 के तहत मिले अधिकारों को गंवाने वाले कश्मीरियों को अब एक नया डर सता रहा है। यह डर ‘दरबार मूव’ की प्रक्रिया के थम जाने का है। ‘दरबर मूव’ अर्थात राजधानी बदले जाने की प्रक्रिया है जिसके तहत गर्मियों में राजधानी श्रीनगर चली जाती है और सर्दियों में यह जम्मू में आ जाती है। इसमें राज्यपाल के आफिस के साथ ही सचिवालय के सभी कार्यालय भी मूव कर जाते हैं। और यह डर इसलिए है क्योंकि 31 अक्तूबर को राज्य के केंद्र शासित प्रदेश में बदल जाने के बाद फिलहाल इसमें एक या दो राजधानी का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।

फिलहाल ‘दरबार’ अर्थात राज्यपाल के आफिस समेत सचिवालय के सभी कार्यालय श्रीनगर में ही हैं जो 25 अक्तूबर को बंद होकर 4 नवंबर को जम्मू में खुलेंगें। हालांकि 5 अगस्त को धारा 370 को हटाए जाने के बाद से ही ‘दरबार मूव’ को लेकर भिन्न प्रकार की अफवाहें उड़ने लगी थीं। जम्मू वाले इस बात को लेकर खुश थे कि अब ‘दरबार मूव’ से मुक्ति मिल जाएगी। दरअसल कहा यह जा रहा था कि जम्मू व श्रीनगर में दो नागरिक सचिवालय बना दिए जाएंगें। पर बड़ी रोचक बात यह है कि केंद्र शासित प्रदेश में राजधानी का कोई प्रावधान नहीं होने के कारण ‘दरबार मूव’ अर्थात राजधानी स्थानांतरण के प्रावधान को कैसे लिया जाए।

तब राज्य सरकार ने यह आदेश जारी किया था कि ‘दरबार’ जम्मू में स्थानांतरित होगा और पहले की तरह सचिवालय जम्मू में कार्य करेगा। लेकिन अभी तक यह घोषणा नहीं हो पाई है कि क्या यह दरबार वापस श्रीनगर लौटेगा। और अगर सच में यह लौटेगा तो यह उन लोगों के सीने पर सांप के लौटने जैसा होगा जो धारा 370 और 35-ए के विरोधी थे और 1872 से चली आ रही परंपरा को न रोक पाने का दर्द उनको हमेशा सालता रहेगा।

दरअसल आतंकवाद का सामना कर रहे जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव की प्रक्रिया को कामयाब बनाना भी एक बहुत बड़ी चुनौती रही है। इस दौरान कड़ी व्यवस्था के बीच सचिवालय के अपने 35 विभागों, सचिवालय के बाहर के करीब इतने ही मूव कायालयों के करीब पंद्रह हजार कर्मचारी जम्मू व श्रीनगर रवाना होते रहते हैं। उनके साथ खासी संख्या में पुलिस कर्मी भी मूव करते हैं।

तंगहाली के दौर से गुजर रहे जम्मू कश्मीर में दरबार मूव पर सालाना खर्च  होने वाला 300 करोड़ रूपये वित्तीय मुश्किलों को बढ़ाता है। सुरक्षा खर्च मिलाकर यह 700-800 करोड़ से अधिक हो जाता है। दरबार मूव के लिए दोनों राजधानियों में स्थायी व्यवस्था करने पर भी अब तक अरबों रूपये खर्च हो चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर में दरबार मूव की शुरूआत महाराजा रणवीर सिंह ने 1872 में बेहतर शासन के लिए की थी। कश्मीर, जम्मू से करीब तीन सौ किलोमीटर दूरी पर था, ऐसे में डोगरा शासक ने यह व्यवस्था बनाई कि दरबार गर्मियों में कश्मीर व सर्दियों में जम्मू में रहेगा। उन्नीसवीं शताब्दी में दरबार को तीन सौ किलोमीटर दूर ले जाना एक जटिल प्रक्रिया थी व यातायात के कम साधन होने के कारण इसमें काफी समय लगता था। अप्रैल महीने में जम्मू में गर्मी शुरू होते ही महाराजा का काफिला श्रीनगर के लिए निकल पड़ता था। महाराजा का दरबार अक्टूबर महीने तक कश्मीर में ही रहता था। जम्मू से कश्मीर की दूरी को देखते हुए डोगरा शासकों ने शासन को ही कश्मीर तक ले जाने की व्यवस्था को वर्ष 1947 तक बदस्तूर जारी रखा।

जब 26 अक्तूबर 1947 को राज्य का देश के साथ विलय हुआ तो राज्य सरकार ने कई पुरानी व्यवस्थाएं बदल ले लेकिन दरबार मूव जारी रखा।  राज्य में 146 साल पुरानी यह व्यवस्था फिलहाल आज भी जारी है। दरबार को अपने आधार क्षेत्र में ले जाना कश्मीर केंद्रित सरकारों को सूट करता था, इस लिए इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं लाया गया है। लेकिन अब कश्मीरी इसकी वापसी को लेकर आशंकित हो उठे हैं।

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