अहमदाबादः पतंग उड़ाकर 'उत्तरायण' मनाने की तैयारी में अहमदाबाद के जुटने के बीच पुराने शहर में एक जानी-पहचानी परंपरा भी धीरे धीरे गति पकड़ लेती है और वह है छतों को विविध रंगों में सजाने और उन्हें किराए पर देने की परंपरा। हर साल, जैसे ही सर्दियों में आसमान पतंगों से भर जाता है, पुराने शहर की छतें उत्तरायण के उत्सव के लिए सजधज के साथ तैयार हो जाती हैं। उत्तरायण का उत्सव मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है, जो 14 जनवरी को पड़ता है। इस संक्रांति पर सूर्य उत्तर दिशा की ओर से यात्रा आरंभ करता है और यह ग्रीष्म ऋतु की ओर संक्रमण का प्रतीक है।
शहर के केंद्र में, 'पोल' कहे जाने वाले पुराने शहर के मोहल्लों-- खाडिया, रायपुर, सारंगपुर और अस्तोदिया की संकरी गलियों में ‘काई पो चे (मैंने पतंग काट दी)’ के उल्लासपूर्ण नारे गूंजने लगते हैं। यहां, छतें महज़ वास्तुशिल्पीय विशेषताएं नहीं रह जाती हैं। वे ऐसे मंच बन जाती हैं जहां यादें रची जाती हैं। अहमदाबाद के पुराने शहर में उत्तरायण के दौरान छतों को किराए पर लेना एक पुरानी परंपरा है।
एक दिन के लिए, ये छतें एक साझा स्थान में बदल जाती हैं, जहां मेजबान और मेहमान त्योहार को उसके सबसे प्रामाणिक रूप में मनाने के लिए एक साथ आते हैं। इस अवसर को यादगार बनाने के लिए, छतों को सावधानीपूर्वक रंगा जाता है, उन्हें रंग-बिरंगे गुब्बारों, बारीक डोरी के काम और देशभक्ति से प्रेरित तिरंगे रंग की छतरियों से सजाया जाता है। आसमान रंगों और चहल-पहल से जीवंत हो उठता है।
उत्तरायण के दौरान छत किराए पर देने वाले ट्रैवल एजेंट अजय मोदी ने बताया,‘‘अहमदाबाद के लोग पॉश इलाकों में करोड़ों रुपये के अपार्टमेंट में रहते हैं और पुरानी परंपराओं और विरासत के साथ त्यौहार मनाने के लिए खुशी-खुशी भुगतान करते हैं।’’ उन्होंने बताया कि उत्तरायण के लिए छत किराए पर लेने की लागत 10,000 रुपये से लेकर 80,000 रुपये (प्रति दिन) तक होती है, जो छत के आकार और उसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या पर निर्भर करती है। मोदी कहते हैं, ‘‘ अप्रवासी भारतीयों के बीच अपने गृह नगर में उत्तरायण का त्यौहार मनाने की अलग ही खुशी होती है।
इसके जरिए वे अपनी जड़ों से भी जुड़ना चाहते हैं।’’ लेकिन वह कहते हैं कि अमेरिका में कड़ी नीतियों के चलते एनआरआई लोग इस बार ज्यादा नहीं हैं। हालांकि गुजरात के विभिन्न हिस्सों और देशभर से लोग यहां पहुंच रहे हैं। खाड़िया में चेतन सोनी की छत पर उत्तरायण त्यौहार मनाने के लिए हर साल मुंबई से कुछ परिवार आते हैं। सोनी ने बताया, ‘‘ पिछले तीन सालों से 15 लोगों का एक परिवार यहां आता रहा है।’’ स्थानीय लोगों का कहना है कि उत्तरायण यहां केवल एक त्यौहार नहीं है बल्कि यह पुराने शहर की अर्थव्यवस्था और जीवन-रेखा भी है।