नई दिल्लीः वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने रविवार को कहा कि भारत को अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुएं खरीदने में कोई परेशानी नहीं होगी। उन्होंने इसे एक अत्यंत रूढ़िवादी आंकड़ा बताते हुए कहा कि यह संख्या उस देश के लिए बहुत कम है, जो 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखता है। गोयल ने कहा, "मेरा मानना है कि तेल, एलएनजी, एलपीजी और कच्चे तेल के अलावा हमें केवल विमानन क्षेत्र के लिए ही कम से कम 100 अरब डॉलर से अधिक की आवश्यकता है।"
द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के ढांचे पर दोनों पक्षों द्वारा शनिवार को जारी एक संयुक्त बयान के अनुसार, भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 अरब अमेरिकी डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान और विमान के पुर्जे, कीमती धातुएं, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला खरीदने इच्छा व्यक्त की है।
चीन पर 35 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया
वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने कहा कि भारतीय वस्तुओं पर 18 प्रतिशत आयात शुल्क होने के बावजूद, ये अमेरिका के बाजारों में चीन और अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के उत्पादों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ बनाए रखेंगी, जो उच्च शुल्कों का सामना कर रहे हैं। चीन पर 35 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया है, जबकि एशिया के अन्य देशों पर 19 प्रतिशत या उससे अधिक शुल्क लागू हैं।
अगले पांच वर्षों में यह बढ़कर दो लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने वाला
उन्होंने कहा कि इस वक्त भारत अमेरिका से लगभग 300 अरब डॉलर के उन सामानों का आयात कर सकता है, जो वह फिलहाल दूसरे देशों से खरीद रहा है। उन्होंने कहा, ''हम आज भी 300 अरब डॉलर के उन सामानों का आयात कर रहे हैं जिन्हें अमेरिका से मंगाया जा सकता है। हम पूरी दुनिया से आयात कर रहे हैं। अगले पांच वर्षों में यह बढ़कर दो लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने वाला है।
मैंने अपने समकक्षों से कहा कि देखिए, मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि भारत में मांग है, लेकिन आपको प्रतिस्पर्धी होना होगा।'' गोयल ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि होने के कारण, सेमीकंडक्टर चिप, उच्च स्तरीय मशीनरी और डेटा सेंटर उपकरण से लेकर विमान, विमान के पुर्जे और ऊर्जा उत्पादों तक विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की मांग भी बढ़ रही है।
भारत हर साल अमेरिका से लगभग 40-50 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का सामान आयात कर रहा
उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारत हर साल अमेरिका से लगभग 40-50 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का सामान आयात कर रहा है। वाणिज्य मंत्री ने कहा कि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों ने भारत में बड़े निवेश की घोषणा की है और इसलिए, ''मेरा मानना है कि हम देश में 10 गीगावाट के डेटा सेंटर देखेंगे'' और इसके लिए भारत को उपकरणों की आवश्यकता होगी, जिसकी आपूर्ति अमेरिका कर सकता है।
लगभग 80-90 अरब डॉलर के ऑर्डर
हमें विमानों की आवश्यकता होगी। हमें विमानों के लिए इंजनों की आवश्यकता होगी। हमें अतिरिक्त पुर्जों की आवश्यकता होगी। अकेले बोइंग से ही हमारे पास विमानों के लिए 50 अरब अमेरिकी डॉलर के ऑर्डर हैं। हमारे पास इंजनों के भी ऑर्डर हैं। अगले पांच वर्षों के लिए लगभग 80-90 अरब डॉलर के ऑर्डर पहले ही दिए जा चुके हैं।
हमें वास्तव में इससे भी अधिक की आवश्यकता होगी। मैंने पिछले दिनों पढ़ा कि टाटा कुछ और ऑर्डर देने की योजना बना रहा है। गोयल ने कहा,"इसके अलावा, देश को इस्पात उद्योगों के लिए कोकिंग कोयले की आवश्यकता है।'' गोयल ने कहा, ''इसके अलावा, हमने बजट में कहा कि हम डेटा सेंटर को बढ़ावा देना चाहते हैं।
क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए एआई मशीनरी की आवश्यकता
हम एआई मिशन को बढ़ावा देना चाहते हैं, और हम भारत में महत्वपूर्ण विनिर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण को बढ़ावा देना चाहते हैं। इन सबके लिए उच्च गुणवत्ता वाली मशीनरी, आईसीटी उत्पादों और एनवीडिया चिप्स के साथ ही क्वांटम कंप्यूटिंग के लिए एआई मशीनरी की आवश्यकता होगी। यह सब कहां से आने वाला है?''
उन्होंने कहा कि सबसे शक्तिशाली प्रौद्योगिकी प्रदाता अमेरिका है। गोयल ने अंत में कहा, ''इसलिए, सालाना 100 अरब डॉलर बहुत मामूली है। मुझे लगता है कि यह उस देश के लिए बहुत ही कम है, जो 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, जैसा कि भारत का इरादा है।''
क्या अमेरिका से 500 अरब अमेरिकी डॉलर की खरीद योजना
जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका से 500 अरब अमेरिकी डॉलर की खरीद योजनाओं में भारत द्वारा बोइंग विमानों के लिए पहले से दिए गए ऑर्डर शामिल हैं, तो उन्होंने कहा: "हम जिस बारे में बात कर रहे हैं वह निरंतरता में है और इसमें वह भी शामिल है जो हम पहले से खरीद रहे हैं।" उन्होंने कहा कि भारत पर लगाए जाने वाले पारस्परिक शुल्क अब उसके प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में सबसे कम हैं।
इन देशों में चीन (35 प्रतिशत), थाईलैंड (19 प्रतिशत), म्यांमा (40 प्रतिशत), कंबोडिया (19 प्रतिशत), बांग्लादेश (20 प्रतिशत), इंडोनेशिया (19 प्रतिशत), ब्राजील (50 प्रतिशत) और वियतनाम (20 प्रतिशत) शामिल हैं। कम शुल्क के कारण भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्र, जैसे कपड़ा, चमड़ा और जूते, हस्तशिल्प, रसायन, और आभूषण, अमेरिकी बाजार में इन देशों की तुलना में सस्ते और प्रतिस्पर्धात्मक होंगे।
चीन के 35 प्रतिशत के मुकाबले हमारा 18 प्रतिशत
गोयल ने कहा, "हमें अपनी प्रतिस्पर्धात्मक ताकत को देखना होगा। हमारे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत के शुल्क सबसे कम हैं। चीन के 35 प्रतिशत के मुकाबले हमारा 18 प्रतिशत है।" उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिस्पर्धात्मक लाभ हमेशा किसी देश को वैश्विक बाजार में बढ़त देता है।
मंत्री ने कहा, "महत्वपूर्ण बात प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है। जब हम अमेरिका के लिए अपने शुल्क कम करते हैं, तो यह भी इसी लाभ का हिस्सा है।" वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत द्वारा 18 प्रतिशत शुल्क स्वीकार करने और अमेरिकी सामानों पर छूट देने के निर्णय को लेकर उठ रही आलोचनाओं का कोई आधार नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नहीं समझते और सिर्फ लोगों को गुमराह करने की कोशिश
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि यह कोई गंभीर मुद्दा है। जो लोग इसे बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं, वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नहीं समझते और सिर्फ लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।" उन्होंने कहा कि व्यवसाय, निर्यातक और उद्योग संघ इन मुद्दों को समझते हैं और इस समझौते का स्वागत कर रहे हैं।
व्यवसायियों को समझ है कि इससे भारत को बड़ा व्यापारिक लाभ मिलेगा और सीधा फायदा हमारे किसानों को होगा। आज हम कृषि उत्पादों के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक हैं। हम हर साल 55 अरब डॉलर यानी पांच लाख करोड़ रुपये के कृषि और मछली उत्पाद निर्यात करते हैं। यह सब किसानों की आय में शामिल होता है। इससे उनके उत्पादों का मूल्य बढ़ेगा और किसानों की आमदनी में भी बढ़ोतरी होगी।