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वैश्विक स्तर पर नए कोयला आधारित संयंत्रो के घटने का क्रम जारी, लेकिन भारत सरकार अब भी दे रही है नए संयंत्रो को मंज़ूरी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 28, 2019 13:25 IST

अमरीका में ट्रम्प के लगातार कोयला आधारित ऊर्जा की वकालत करने के बावजूद वहां कोयला प्लांट को कम किया जा रहा है। वहीं भारत सरकार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को दरकिनार करते हुए थर्मल पावर प्लांट को मंजूरी दे रही है।

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एक नयी रिपोर्ट के अनुसार लगातार तीसरे साल 2018 में भी निर्माणाधीन कोयला आधारित पावर प्लांट के विकास में कमी आयी है। इस रिपोर्ट को ग्रीनपीस इंडिया, सीएरा क्लब और ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर ने मिलकर तैयार किया है।यह रिपोर्ट ‘बूम एंड बस्ट: ट्रैकिंग ग्लोबल कोल प्लांट पाइपलाइन’ निर्माणाधीन पावर प्लांट के सर्वे का पाँचवा संस्करण है।

इस रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले साल नए बने कोल पावर प्लांट में 20% (53% पीछले तीन साल में) गिरावट आयी है, वहीं नए बनने वाले प्लांट में 39% (पीछले तीन साल में 84%) कमी हुई है और निर्माण से पहले वाले प्लांट में 24% (69% पीछले तीन साल में) की गिरावट दर्ज की गयी है। वहीं अमरीका में ट्रम्प के लगातार कोयला आधारित ऊर्जा की वकालत करने के बावजूद वहां कोयला प्लांट को कम किया जा रहा है।

भारत और चीन में, जहाँ 2005 से अबतक 85% नए प्लांट लगे हैं में भी नए कोल प्लांट में रिकोर्ड कमी हुई है लेकिन फिर भी नए प्लांट प्रस्तावित हैं और उनकी मंज़ूरी दी जा रही है।साल 2018 में, भारत ने कोल पावर से अधिक अक्षय ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाया है।17।6 गिगावाट ऊर्जा उत्पादन क्षमता में से 74%  अक्षय ऊर्जा तकनीक से उत्पादित किया गया है। इसमें ज़्यादातर हिस्सा सोलर ऊर्जा  है जो लगातार महँगे होते जा रहे कोयला आधारित बिजली से सस्ता है। सोलर पर आयात कर और जीएसटी के बावजूद यह तेजी से बढ़ रहा है। ग्रीनपीस इंडिया के विश्लेषण में सामने आया है कि 65% कोयला आधारित बिजली अक्षय ऊर्जा से ज़्यादा महँगा हो गया है।

भारत सरकार के अनुसार, 40 गिगावट कोयला प्लांट आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन चुके हैं। साल 2018 में सिर्फ़ तीन गिगावाट नयी क्षमता वाले कोल प्लांट को मंज़ूरी दी गयी जबकि 2010 में यह 39 गिगावट था। अधिक्षमता और अक्षय ऊर्जा के सस्ते होते जाने के कारण कोयला आधारित संयंत्रों में निवेश घाटे का सौदा बन चुका है।

ग्रीनपीस इंडिया की पुजारिनी सेन ने कहा कि “थर्मल प्लांटों के अनुकूल बाज़ार न होने के बावजूद सरकारें नए थर्मल प्लाटों में पैसे खर्च रही हैं।” सेन ने आगे कहा, "इसी वर्ष फरवरी में आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी द्वारा खुर्ज़ा (यूपी) और बक्सर (बिहार) में दो पॉवर प्लांटों के लिए 11,089 करोड़ और 10,439 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। जब समूचा थर्मल ऊर्जा क्षेत्र गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, नए प्लांट बनाने की घोषणाएं जनता के पैसों की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं है"।

उत्तर प्रदेश की पर्यावरण संस्था क्लाइमेट एजेंडा से जुड़े रवि शेखर कहते हैं, "यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य में प्रदूषण से हो रही गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को दरकिनार करते हुए सरकार थर्मल पावर प्लांट को मंजूरी दे रही है। खुर्जा थर्मल पॉवर प्लांट या कोई भी अन्य थर्मल पावर प्लांट लगाने में आने वाला खर्च अक्षय ऊर्जा संसाधनों की तुलना में दो गुना अधिक होगा। इसीलिए यह बेहतर होगा  कि सरकार अक्षय ऊर्जा संसाधनों पर ज्यादा ध्यान दे और देशभर में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना लागू करवाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाए।"

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