सुनील सोनी
14वीं सदी से फारस के हर घर में अनिवार्य रूप से जो किताबें हुआ करती हैं, उनमें से एक है ‘दीवान-ए-हाफिज’ यानी सूफी कवि हाफिज शिराजी की शायरी. फारसी साहित्य के सिरमौर हाफिज दरअसल ईरान के कबीर हैं. वे सूफी हैं, सो अज्ञेयवादी और निर्गुण ईश्वर के इश्क में मुब्तिला माशूक हैं और धार्मिक पाखंड के खिलाफ लिखते हैं. उनके शिष्य उनके काव्य को जोड़ ‘दीवान’ बनाते हैं. भक्तिकाल की यह निर्गुण धारा उनके बाद जन्मे कबीर की याद दिलाती ही है.फारस ही नहीं, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान में भी लोकप्रिय दीवान-ए-हाफिज में 500 गजलें, 42 रुबाइयां और सैकड़ों कसीदे हैं.
इनमें से कुछ कविताएं उनकी माशूका शाख-ए-नबात की शान में हैं, जो पाखंड का मखौल उड़ाते-उड़ाते दर्शन में बदल जाती हैं. जब भी कोई सीख देनी हो या भविष्यवाणी करनी हो, ईरानी हाफिज की कविता का इस्तेमाल करते हैं. वैसे ही, जैसे हिंदू रामचरित मानस की ‘प्रश्नावली’ का. हाफिज गुजरे, तो कट्टरपंथी सुपुर्दे खाक करने के खिलाफ हो गए, तो शिराज की जनता पक्ष में उतर आई.
फिर ‘फाल ए हाफिज’ के 79वें छंद से निकले हल के मुताबिक वे दफन हुए. शिराज में रुकनाबाद नदी के तट पर मुसल्ला गार्डन में उनका मकबरा ‘हाफिजिया’ है, जहां हर वक्त मेला लगा रहता है और शाम ढलते-ढलते हसीन-रंगीन हो जाता है.
भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, यूरोप-अमेरिका में भी शिराजी को खूब पढ़ा गया है. नीत्शे, गोयथ, एमरसन, एडवर्ड फिट्जगेराल्ड, गरटूड बेल, ए.जे. अरबेरी ने उनके काव्य की प्रशंसा में लिखा है. सर ऑर्थर कॉनन डॉयल तो इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उनकी तुलना ईसा पूर्व जन्मे रोमन साहित्यकार होरेस से कर दी, जिन्होंने लैटिन में आर्स पोयटिका (काव्य की कला) लिखा था.
1891 में लिखे गए कहानी संग्रह ‘द एडवेंचर्स ऑफ शरलक होम्स’ की लघु कहानी ‘ए केस ऑफ आइडेंटिटी’ में भी वे दिल की बात कहलवा लेते हैं. डॉ. वाॅटसन से शरलक कहता है, ‘‘हाफिज में होरेस जैसी समझदारी और दुनियादारी का ज्ञान है.’’
हाफिज के अज्ञेयवाद से प्रभावित डाॅयल आखिरी दशकों में आध्यात्मिक हो गए थे और 1926 में ‘द हिस्ट्री ऑफ स्पिरिचुअलिज्म’ लिखी. महान जादूगर दोस्त हुडिनी ने मायाजाल का भ्रम समझाया, तब भी. डॉयल विशेषज्ञ चिकित्सक थे और डॉ. वॉटसन का नाम भले ही अपने सहयोगी से लिया, पर वह उनका ही अक्स है. दिलचस्प है कि वे पहला जासूसी उपन्यास लिखनेवाले एडगर एलन पो से प्रभावित थे, परंतु ‘ए स्टडी इन स्कॉरलेट’ में वे शरलक होम्स के मुंह से उनका मजाक उड़वाते हैं.
होम्स का किरदार डॉयल के एडिनबरा मेडिकल कॉलेज के सर्जन जोसेफ बेल से मेल खाता है, जिनकी तर्कशक्ति, अनुमान व अवलोकन अमोघ थे. लेकिन, शरलक होम्स उनके भीतर ही था, क्योंकि वे हमेशा इंसाफ के पक्षधर रहे, जिसके चलते उन्होंने अपील में जांच करके भारतीय पारसी एडलजी समेत दो सजायाफ्ता को बरी करवाया था.
धनवर्षा के वायस बने होम्स से डॉयल फिर इतना ऊबे कि मां की मनाही के बावजूद उसे 1893 में मार डाला, पर पाठकों ने आंदोलन के चलते होम्स को फिर जिंदा करना पड़ा, जैसे हैरी पॉटर को जे.के. रोलिंग ने किया.यूं उनका शरलक किंवदंती बन गया, जिसे लोग जिंदा समझते रहे और डॉयल के घर के सामने उसकी प्रतिमा भी लगी. लेकिन, उनकी ‘द व्हाइट कंपनी’, ‘वाटरलू’, ‘द हाउस ऑफ टेम्परली’ उनकी ज्यादा साहित्यिक व गंभीर कृतियां हैं. हालांकि, उनकी डायनासोर वाली किताब ‘द लास्ट वर्ल्ड’ इतनी चर्चित है कि उस पर कई फिल्में और टीवी शो बने और अब तक बन रहे हैं, जैसे कि शरलक होम्स पर.
बहुआयामी प्रतिमा के धनी डॉयल राजनीतिज्ञ, आर्किटेक्ट, खिलाड़ी भी थे, जो फुटबॉल, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, गोल्फ में माहिर थे. डॉयल ने 1899 से 1907 के बीच मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (एमसीसी) के लिए 10 प्रथम श्रेणी मैच खेले. पी.जी. वुडहाउस जैसे ब्रिटिश लेखकों की शौकिया टीमों ‘जे.एम.बैरीज’ और ‘ऑथर्स इलेवन’ के लिए खेलते हुए उन्होंने लंदन काउंटी के खिलाफ 43 रन बनाए. प्रथम श्रेणी में डब्ल्यू. जी. ग्रेस का विकेट उनके नाम है, जिस पर उन्होंने कविता तक लिख दी थी. 1899 से 1912 तक वे ‘ऑथर्स इलेवन’ के कप्तान रहे और डायरी में क्रिकेट स्कोर लिखना उनका शौक था.
1903 में उन्होंने ‘क्राइम्स क्लब’ बनाया, जिसमें वुडहाउस समेत मशहूर लेखक भी सदस्य बने. यहां अपराध, अपराधियों, अपराध विज्ञान और जासूसी पर चर्चा चलती थी. अब भी ‘अवर सोसाइटी’ नाम से लंदन के इम्पीरियल होटल से चलनेवाले इस क्लब में सिर्फ 100 सदस्य हैं, जिनकी साल में चार बैठकें होती हैं. वे इतने रोमानी रहे कि 1930 में दिल का दौरा पड़ने से गुजरने से ठीक पहले पत्नी से सीना पकड़े हुए कहा, ‘‘तुम गजब हो मेरी जान.’’