सुनील सोनी
सन 1919 में 15 साल के जॉर्जेस सीमेनॉन ने जब जापान के युवराज हिरोहितो का इंटरव्यू किया, तो फ्रांस से जापान तक धूम मच गई. अकिरा कुरोसावा 9 साल के रहे होंगे, जब उनके समुराई कुल से संबंध रखनेवाले अध्यापक पिता ने यह इंटरव्यू पढ़कर सुनाया होगा. इस घटना के कुछ साल बाद ही मशहूर लेखक बन गए सीमेनॉन का नाम शायद कुरोसावा की याद में रह गया और तब बाहर आया, जब उन्होंने 1946 में ‘नो रिग्रेट्स फॉर अवर यूथ’ बनाई. 1948 में इस फिल्म के दूसरे भाग ‘ड्रंकन एंजेल’ ने उन्हें निर्देशक के रूप में ख्यात कर दिया.
इस नियो-नोइर श्रृंखला का तीसरा भाग 1949 की ‘स्ट्रे डॉग’ है. शेक्सपियर के ‘हैमलेट’ पर आधारित 1960 की ‘द बैड स्लीप वैल’ इसका चौथा और 1963 की ‘हाई एंड लो’ आखिरी भाग है. कुरोसावा पर सीमेनॉन की छाया नहीं है, पर वे उन जैसा अपराध-संसार रचने में कामयाब रहते हैं.
बेल्जियाई लेखक सीमेनॉन की कृतियां संभवत: 20वीं सदी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताबें (तकरीबन 50 करोड़ प्रतियां) होंगी. इनमें 400 उपन्यास, 21 संस्मरण, 100 से अधिक लघुकथाएं शामिल हैं. उनके ननिहाल से जुड़ा 16वीं सदी का कुख्यात लुटेरा गैब्रियल ब्रहुल भी इन कथाओं में बेधड़क चला आता है.
उनका जासूसी किरदार जूल मैग्रे 75 उपन्यासों और 28 लघुकथाओं तक व्याप्त है. वह शरलॉक होम्स के सुराग या तर्क के बजाय मनोविज्ञान, इंद्रियज्ञान व हमदर्दी से केस सुलझाता है. फ्रांसीसी में लिखने वाले सीमेनॉन अपनी कथाओं में पेरिस का बखान यूं करते हैं कि यह शहर एक किरदार बन जाता है.
यह कहना मुफीद होगा कि कुरोसावा की शैली, सीमेनॉन के बजाय रयुनोसुके अकुतागावा से अधिक प्रभावित है. कुरोसावा ने उनकी दो जटिल मनोवैज्ञानिक लघुकथाओं ‘याबू नो नाका’ और ‘राशोमन’ पर 1950 की मास्टरपीस ‘राशोमन’ रची, जिसने यूरोप-अमेरिका में इतालवी सिनेमा को जापानी सिनेमा से विस्थापित कर दिया.
जापानी लघुकथाओं के जनक अकुतागावा अंग्रेजी साहित्य के अध्येता भी थे. साहित्य के विश्वबंधुत्व के उनके सपने को कुरोसावा ने सच किया. अचरज नहीं कि कुरोसावा के सिनेमा में पूर्वी-पश्चिमी प्रभाव साथ दिखता है.
‘राशोमन’ ने दुनिया को स्तब्ध कर दिया, क्योंकि उसमें फ्लैशबैक की अद्भुत शैली, इनसानी बरताव की विविधता, याददाश्त की अविश्वसनीयता, सच की सापेक्षता और व्यक्तिपरकता के मनोविज्ञान का बेजोड़ मेल है. कानूनी विश्व में इसने ‘राशोमन प्रभाव’ को जन्म दिया. कुरोसावा की कथाशैली, धूप-छाया का खेल, जंगल-खंडहर के रूपक, कैमरा मूवमेंट, ध्वनि व संगीत, लंबे दृश्य; और सबसे बढ़कर संपादन दर्शकों को ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जो सम्मोहित कर देते हैं.
कुरोसावा ने पटकथा लेखन तभी सीख लिया था, जब वे तोहो स्टूडियो में सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे थे. यह तब काम आया, जब ‘तोहो’ छोड़कर वे रंगमंच में एंतोन चेखव के नाटकों का मंचन करने लगे. फिर प्रिय लेखक फ्योदोर दोस्तोयवस्की के ‘द इडियट’ पर 4 घंटे 25 मिनट की फिल्म बनाई, तो वह फ्लाॅप हो गई. लियो तोलस्तॉय की ‘इवान इलिच की मौत’ के जापानी रूपांतरण ‘इकिरू’ को उन्होंने बर्तोल्त ब्रेख्त के व्यंग्यात्मक अंदाज में पेश करके करिश्मा कर दिया. इस करिश्मे को 1952 की ‘सेवेन समुराई’ ने व्यापक कर दिया. ‘ब्लड थ्रोन’ भले ही शेक्सपियर की ‘मैकबेथ’ से प्रेरित हो, पर है वह ‘सेवेन समुराई’ का दूसरा भाग.
भारत में चेतन आनंद ने जब मक्सिम गोर्की के 1902 में लिखे गए नाटक ‘द लोअर डेप्थ्स’ पर 1946 में ‘नीचा नगर’ बनाई, तो कान फिल्म समारोह में खूब सराही गई्. कुरोसावा ने 1957 में इसे अपनी शैली में बनाया. अगले ही साल ‘हिडन फोर्टेस’ ने कमाल किया, जिसकी छवि अमेरिकी निर्देशक जॉर्ज लुकास की ‘स्टार ऑपेरा’ और ‘स्टार वार्स’ में नजर आती है. व्लादीमीर आरसेनयेव की आत्मकथा ‘डेर्सू उजाला’ ने उन्हें 1975 में ऑस्कर दिलाया.
फ्रांसिस फोर्ड कपोला और स्टीवन स्पिलबर्ग के सहयोग के बावजूद हॉलीवुड ने उन्हें कई धोखे दिए, पर इंगमार बर्गमैन और सत्यजीत राय समेत दुनिया के तमाम दिग्गज फिल्मकारों ने कुरोसावा को सिनेविधा का नायाब फनकार करार दिया है, जिसने कई पीढ़ियों पर असर छोड़ा है. 1990 में ‘ड्रीम्स’ के बाद उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट ऑस्कर मिला, तो इस सर्वकालिक महान फिल्मकार ने कहा, ‘‘मैं अब भी सिनेमा को पूरी तरह समझ नहीं पाया हूं.’’ जापान के कामाकुरा में 700 साल पुराने बौद्ध विहार ‘अन्योइन’ में कुरोसावा की समाधि खास शिल्पाकृति है, जिसे देखने दुनियाभर से लोग पहुंचते हैं.